- लीलाओं में प्रेम, प्रतिरोध, प्रकृति, तर्क और जीवन के विरोधाभासों को आनंद से स्वीकार करने का दर्शन
अशोक झा/ सिलीगुड़ी: इस वर्ष कृष्ण जन्माष्टमी 4 सितंबर को मनाई जाएगी. उन्होंने बताया कि इस बार जन्माष्टमी पर लंबे अंतराल के बाद दुर्लभ संयोग बन रहा है। जन्माष्टमी के दिन रोहिणी नक्षत्र का संयोग रहेगा। धार्मिक मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। इसके साथ ही सर्वार्थ सिद्धि योग, अमृत योग और सिद्ध योग जैसे शुभ संयोग भी बन रहा है। ऐसे में भगवान श्रीकृष्ण की आराधना और विशेष उपाय करना बेहद शुभ माना जा सकता है। सिलीगुड़ी के इस्कॉन मंदिर, प्रणामी मंदिर, गौरिया मठ समेत अन्य मंदिरों में इसकी व्यापक तैयारी चल रही है। विहिप की ओर से आज ही के दिन अपना स्थापना दिवस भी मनाने की तैयारी चल रही है।
कहते है कि योगेश्वर से मुरलीधर तक कृष्ण के अनगिनत रूप हैं। वे देवत्व की ऊंचाइयों के साथ मनुष्यत्व की गहराइयों को भी जीते हैं। उनकी लीलाओं में प्रेम, प्रतिरोध, प्रकृति, तर्क और जीवन के विरोधाभासों को आनंद से स्वीकार करने का दर्शन दिखाई देता है। योगेश्वर, लीलाधर, सम्पूर्ण पुरुष, माखनचोर, चितचोर और… भगवान श्रीकृष्ण के भक्त उनके लिए ऐसे अनेक संबोधन का प्रयोग करते हैं। दूसरी ओर, दार्शनिक चर्चाओं में इस बात को अलग से और खास तौर पर रेखांकित किया जाता है कि समाजवादी चिंतक डॉ. राममनोहर लोहिया ने अपने लब्धप्रतिष्ठ निबंध 'राम, कृष्ण और शिव' में उन्हें राम-कृष्ण के साथ भारत में पूर्णता के तीन महान स्वप्नों में से एक बताया है। साथ ही कहा है कि भले ही ये तीनों स्वप्न एक-दूसरे के विपरीत व अलग-अलग दिखते हैं, इनमें इस देश के रंग, सपने और उदासी एक साथ झलकते हैं। उन्होंने आगे लिखा है कि 'राम ने निरंतर देव बनने की तो कृष्ण ने लगातार मनुष्य बनने की कोशिशें की और 'सम्पूर्ण पुरुष' बने। भगवान होते हुए भी वे हर पल एक साधारण और जीवंत मनुष्य की तरह पेश आए। विकट से विकट परिस्थितियों में भी उनके चेहरे पर मुस्कान व आनंद बने रहे। वे कभी जीवन से भागे नहीं और हर परिस्थिति का हंसते हुए अपनी खास तरह की कूटनीतिक दूरदर्शिता से सामना किया। इतना ही नहीं, जीवन के विरोधाभासों को भी आनंदपूर्वक नायकसुलभ गहराई से जिया।'
ऐसे में स्वाभाविक ही है कि उनके नायकत्व में आश्वस्त जनमानस उनके जीवन-दर्शन को उनकी लीलाएं माने और लीलाओं के अगणित व असीम होने के कारण उन्हें लीलाधर कहे।कवि रहीम तो अपने एक दोहे में यह तक कह गए हैं कि गिरिधर (यानी एक उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाने में समर्थ) होने के बावजूद कोई उन्हें कोमलगात समझे व मुरलीधर कहे तो भी वे 'कछु दुख मानत नाहिं।' इसलिए कि उनके निकट उनके जीवन को पूर्णता की ओर ले जाने में जितना योगदान उनके गिरिधर होने का है, उतना ही मुरलीधर होने का भी।
निस्संदेह, कई-कई युद्धों से आक्रांत व अशांत दुनिया के इन दिनों के हालात में उनको गिरिधर बनाने वाली गोवर्धनलीला की प्रेरणाएं हमारे ज्यादा काम की हैं, क्योंकि वे अन्यायी व दमनकारी सत्ताधीशों के साथ अंधविश्वासों के भी प्रतिरोध की सीख देती हैं। इस लीला में किया गया देवताओं के राजा इंद्र का प्रतिरोध हमारी परंपरा का अब तक का 'सबसे क्रांतिकारी कदम' बताया जाता है। अकारण नहीं कि अनेक कृष्ण-भक्त इस लीला को दमनकारी सत्ताओं और अंधविश्वासों के खिलाफ एक बहुत बड़ा वैचारिक और सामाजिक विद्रोह मानते हैं।
पुराणों के अनुसार, गोवर्धन लीला से पहले ब्रजमंडल, जिसमें मथुरा, वृंदावन, गोकुल, बरसाना, नंदगांव और गोवर्धन आदि शामिल हैं, के निवासी देवताओं के राजा इंद्र के कोप के डर के मारे उसकी पूजा किया करते थे। श्रीकृष्ण ने इस भय-आधारित पूजा को सीधी चुनौती दी और कहा कि पूजा तभी सच्ची पूजा कहलाती है, जब भयवश नहीं, बल्कि कृतज्ञता के भाव से की जाए। उन्होंने उनको समझाया कि उनका जीवन इंद्र के बजाय गोधन, वनों और गोवर्धन पर्वत पर निर्भर है। इसलिए उनको इंद्र की पूजा की परंपरा तोड़कर गोवर्धन की पूजा शुरू करनी चाहिए। गोवर्धन की यह पूजा वास्तव में प्रकृति व पर्यावरण की पूजा का पर्याय थी। लेकिन उसके कारण अपनी पूजा रुकने से कुपित इंद्र ने ब्रज को डुबोकर नष्ट कर देने के मंसूबे से उस पर प्रलयंकारी वर्षा शुरू कर दी तो हाहाकार मच गया और सवाल उठ खड़ा हुआ कि अब क्या हो?
इस कठिन घड़ी में श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को इंद्र के अत्याचार से हार मानकर उसके सामने झुक जाने के बजाय गोवर्धन को ऊपर उठाकर अपने सिर पर छतरी की तरह तानकर अपना कवच बना लेने की सीख दी। फिर इस असंभव दिख रहे कार्य को अपनी सबसे छोटी उंगली से संभव कर दिखाया और उन सबकी रक्षा की। फिर तो उनकी शक्ति में आश्वस्त ब्रजवासियों ने उनके साथ मिलकर इंद्र का अहंकार टूटने का उत्सव भी मनाया।इस लीला का सामाजिक संदेश यह है कि कोई अन्यायी राजा, वह कितना भी शक्तिशाली और देवता ही क्यों न हो, अपनी शक्तियों व अधिकारों का दुरुपयोग करके प्रजा पर अत्याचार करने लगे तो हर हाल में उसका प्रतिरोध करना चाहिए और बिना सोचे-समझे रूढ़ियों की राह पर चलते व उनकी लकीर पीटते रहने के बजाय तर्क व कल्याण का मार्ग चुनना चाहिए। इसी तरह रासलीला समेत उनकी दूसरी अनेक लीलाओं में कई गंभीर दार्शनिक संदेश हैं। महाभारत युद्ध के दौरान मोहग्रस्त होकर युद्धविरत हुए अर्जुन को भगवद्गीता के माध्यम से उन्होंने जो ज्ञान दिया, अपने जीवन व उपदेशों में कर्मयोग, भक्तियोग व ज्ञानयोग का जैसा अनूठा समन्वय प्रस्तुत किया और भोग व योग के बीच जैसा आदर्श संतुलन स्थापित करना सिखाया, उसने उनको सारे योगों का स्वामी यानी योगेश्वर बना दिया। उनके जन्म के संदर्भ में एक और बात बहुत दिलचस्प है। यह कि जिस भादों के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को वे इस संसार में आए, वह इस मायने में बहुत अभागा है कि उसके रहते आम तौर पर कोई भी शुभ कार्य नहीं होता। कारण यह कि सारे शुभ कार्यों के साक्षी माने जाने वाले भगवान विष्णु के बारे में मान्यता है कि भादों लगते ही वे शयन करने पाताल लोक चले जाते हैं। इसलिए जब कृष्ण पक्ष की अष्टमी आती है तो अपने सारे अभागेपन व उसके सारे अंधेरे के बावजूद वह खूब उल्लसित होती है, क्योंकि उसकी आंखों में भाई कंस के अत्याचार सहने को अभिशप्त और पति वसुदेव के साथ मथुरा के कारागार में बंद माता देवकी का आठवें शिशु के रूप में श्रीकृष्ण को जन्म देना सजीव हो उठता है। वसुदेव का उन्हें कंस की क्रूरता से बचाने के लिए उफनाई हुई यमुना को पार कर गोकुल पहुंचाना भी! हां, उसे यह याद करके भी गर्व होता है कि श्रीकृष्ण की आह्लादिनी राधा और बड़े भाई बलराम का जन्म भी उसी की धूप-छांव यानी भादों में ही हुआ है।प्रसंगवश, जैसे श्रीकृष्ण की लीलाएं अनंत हैं, वैसे उनके भक्तों की परंपरा अगाध। जाति-धर्म व ऊंच-नीच के बंधनों से परे उनके ऐसे भक्तों की संख्या भी बहुत बड़ी है, जो हिंदू धर्मावलंबी नहीं हैं। इनमें रसखान के नाम से तो शायद ही कोई कृष्ण भक्त अपरिचित हो।
स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी, उर्दू शायर और 'इंकलाब जिंदाबाद' नारे के रचयिता मौलाना हसरत मोहानी इंकलाबी तो थे ही, श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त भी थे। उनकी कृष्ण भक्ति उनकी गंगा-जमुनी तहजीब में भी झलकती थी, उदारवादी सोच में भी और अनोखी शायरी में भी। वे श्रीकृष्ण को 'हजरत कृष्ण अलैहिररहमा' कहते थे और हर जन्माष्टमी पर मथुरा व गोकुल जाकर पूरी रात उनकी भक्ति में लीन रहते थे। इतना ही नहीं, उनके प्रति गहरे प्रेम व समर्पण के प्रतीक के तौर पर एक बांसुरी हमेशा अपने पास रखते थे। उनको श्रीकृष्ण से आध्यात्मिक प्रेम भी था और व्यक्तिगत भी। अपनी कई रचनाओं में वे खुद को ऐसी 'गोपी' की तरह महसूस कर गए हैं, जो मुरलीवाले (कृष्ण) की एक झलक पाने के लिए व्याकुल रहती है। बंगला के महानतम कवियों में से एक काजी नजरुल इस्लाम भी श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त थे। अपनी दो अलग-अलग कविताओं में वे लिख गए हैं:'अगर तुम राधा होते श्याम, मेरी तरह बस आठो पहर तुम रटते श्याम का नाम।' 'आज बन उपवन में चंचल मेरे मन में मोहन मुरलीधारी कुंज-कुंज फिरे श्याम!' ये दोनों काव्यांश पढ़कर आपके मन-मस्तिष्क में भी कहीं कोई बांसुरी बजने लगे तो कतई चकित मत होइए। श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा है और लीलाएं तो ऐसी कि एक बार मन उनमें रम जाए तो 'वह सुख टरत न काहूं मन तैं।'
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