- अर्जुन की दुविधा आज के मनुष्य की दुविधा, कुरुक्षेत्र आज का है नैतिक संघर्ष
- कर्मयोग आज देश भर के युवाओं को जिम्मेदारी से काम करने की बन सकता है प्रेरणा
- सच्चा नेता हमेशा स्वयं आगे खड़ा होकर ही नेतृत्व नहीं करता
- कभी-कभी वह किसी दूसरे को सही दिशा दिखाकर उसके पीछे निभाता है सारथी की भूमिका
अशोक झा/ सिलीगुड़ी: आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी इस बार विशेष ज्योतिषीय संयोग लेकर आ रही है। शुक्रवार को भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के साथ रोहिणी नक्षत्र का संयोग बनेगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भी अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। इस कारण इस संयोग को बेहद शुभ माना जा रहा है। पंडित अभय झा के अनुसार अष्टमी तिथि चार सितंबर की मध्यरात्रि 2:24 बजे से शुरू होकर पांच सितंबर की मध्यरात्रि 12:14 बजे तक रहेगी, जबकि रोहिणी नक्षत्र 4 सितंबर की रात 11:13 बजे तक रहेगा। अष्टमी और रोहिणी के संयोग को जयंती योग कहा जाता है। इसके साथ ही 4 सितंबर को सूर्य और बुध के सिंह राशि में एक साथ रहने से बुधादित्य योग भी बनेगा। ज्योतिष में इसे बुद्धि, मान-सम्मान और समृद्धि से जोड़कर देखा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि ऐसे शुभ संयोग में श्रीकृष्ण का व्रत और पूजन करने से सुख-शांति, यश और वैभव की प्राप्ति होती है। आज का मनुष्य तकनीकी रूप से अत्यंत शक्तिशाली है, लेकिन मानसिक रूप से अनेक प्रकार के तनावों से घिरा हुआ है। सूचना की गति बढ़ी है, लेकिन निर्णय की स्पष्टता हमेशा नहीं बढ़ी। विकल्प बढ़े हैं, लेकिन संतोष कम हुआ है। संपर्क बढ़ा है, लेकिन संवाद कई बार कमजोर हुआ है। ऐसे समय में कृष्ण का दर्शन नए अर्थ ग्रहण करता है। अर्जुन की दुविधा आज के मनुष्य की दुविधा है। कुरुक्षेत्र आज का नैतिक संघर्ष है। कृष्ण का सारथी रूप आज विवेकपूर्ण नेतृत्व का प्रतीक हो सकता है। कर्मयोग आज जिम्मेदारी से काम करने की प्रेरणा बन सकता है। कृष्ण हमें यह भी सिखाते हैं कि जीवन केवल श्वेत और श्याम में विभाजित नहीं होता। वास्तविक जीवन में परिस्थितियां जटिल होती हैं और निर्णयों के लिए विवेक, धैर्य और दूरदृष्टि आवश्यक होती है।नेतृत्व के स्तर पर कृष्ण की सबसे बड़ी सीख शायद यही है कि सच्चा नेता हमेशा स्वयं आगे खड़ा होकर ही नेतृत्व नहीं करता; कभी-कभी वह किसी दूसरे को सही दिशा दिखाकर उसके पीछे सारथी की भूमिका भी निभाता है।
जन्माष्टमी का बदलता स्वरूप और चुनौतियां
समय के साथ जन्माष्टमी का स्वरूप भी बदल रहा है। धार्मिक अनुष्ठानों के साथ बड़े सार्वजनिक आयोजन, सजावट, सांस्कृतिक कार्यक्रम और बाजार आधारित गतिविधियां जुड़ गई हैं। इससे पर्व की व्यापकता बढ़ी है, लेकिन इसके साथ कुछ चुनौतियां भी सामने आई हैं। त्योहार का अत्यधिक व्यावसायीकरण उसकी आध्यात्मिक संवेदना को कमजोर कर सकता है। प्लास्टिक सजावट, अत्यधिक बिजली खपत और उत्सव के बाद पैदा होने वाला कचरा पर्यावरण पर बोझ डालता है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि आधुनिक जन्माष्टमी भव्य होने के साथ-साथ संवेदनशील भी हो। मिट्टी की मूर्तियां, प्राकृतिक सजावट, कम प्लास्टिक, सामुदायिक स्वच्छता और जरूरतमंदों की सहायता जैसे कार्य पर्व की आत्मा को अधिक सार्थक बना सकते हैं।
कृष्ण का वैश्विक विस्तार: कृष्ण की लोकप्रियता अब भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं है। भगवद्गीता, योग और भारतीय दर्शन के प्रसार के साथ कृष्ण संबंधी विचार भी विश्व के विभिन्न हिस्सों में पहुंचे हैं। कृष्ण का वैश्विक स्वरूप कई रूपों में सामने आता है कहीं वे दार्शनिक हैं, कहीं योग और ध्यान की परंपरा के संदर्भ में देखे जाते हैं, तो कहीं भक्ति आंदोलन के केंद्र में।यह वैश्विक विस्तार इस बात का प्रमाण है कि कृष्ण की कथा में ऐसे प्रश्न मौजूद हैं जो केवल भारतीय समाज के प्रश्न नहीं हैं कर्तव्य क्या है? जीवन का उद्देश्य क्या है? प्रेम क्या है? संकट में निर्णय कैसे लिया जाए? और मनुष्य अपने भीतर के भय को कैसे जीत सकता है? इन्हीं सार्वभौमिक प्रश्नों के कारण कृष्ण की प्रासंगिकता समय और भूगोल की सीमाओं से परे हो जाती है।
कृष्ण : भारतीय संस्कृति के अनेक रंगों को जोड़ने वाला सूत्र : कृष्ण की सबसे बड़ी विशेषता शायद उनकी बहुलता है। वे किसी एक छवि में बंधते ही नहीं। वे गोकुल के बालक हैं तो द्वारका के शासक भी। वे वृंदावन के मुरलीधर हैं तो कुरुक्षेत्र के सारथी भी। वे राधा के प्रियतम हैं तो अर्जुन के मार्गदर्शक भी। वे लोकगीत के नायक हैं तो दर्शन के गंभीर अध्येता भी। यही कारण है कि कृष्ण भारतीय संस्कृति में विविध परंपराओं को जोड़ते हैं। लोक और शास्त्र, भक्ति और दर्शन, प्रेम और कर्तव्य, कला और आध्यात्मिकता इन सभी के बीच कृष्ण एक अदृश्य सेतु की तरह उपस्थित हैं। आज भी ब्रज की गलियों से लेकर द्वारका के मंदिरों तक जन्माष्टमी के अवसर पर कृष्ण की यही बहुरंगी उपस्थिति दिखाई देती है। आधिकारिक पर्यटन स्रोत भी जन्माष्टमी को आस्था, संस्कृति और परंपरा के समन्वित उत्सव के रूप में रेखांकित करते हैं।
कृष्ण का जन्म एक तिथि नहीं, एक चेतना का उदय है:
श्रीकृष्ण का जन्म केवल एक धार्मिक आख्यान का उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की उस शाश्वत चेतना का प्रतीक है, जो अंधकार में प्रकाश, अन्याय के बीच न्याय और संकट में विवेक की तलाश करती है। उनका संदेश है कि जीवन के संघर्षों से बचना संभव नहीं, लेकिन कठिन परिस्थितियों में दृष्टि को स्पष्ट रखते हुए अपने कर्म को सार्थक बनाया जा सकता है। कृष्ण की बांसुरी प्रेम की भाषा सिखाती है, गीता विवेक और कर्म का मार्ग दिखाती है। उनका बाल रूप सहजता का प्रतीक है, तो सारथी रूप जिम्मेदारी और कर्तव्य का बोध कराता है। राधा-कृष्ण की कथा समर्पण और आत्मीयता का भाव जगाती है, वहीं कुरुक्षेत्र का कृष्ण धर्म के पक्ष में दृढ़ता से खड़े होने की प्रेरणा देता है।इसीलिए कृष्ण किसी एक मंदिर या परंपरा तक सीमित नहीं हैं। वे भारतीय लोकमानस में भक्ति, दर्शन, प्रेम, साहित्य, कला, संगीत और नैतिकता की विविध धाराओं के रूप में प्रवाहित होते हैं। जन्माष्टमी इसी विराट चेतना के उदय की स्मृति है। इसका शाश्वत संदेश है कि जब मनुष्य भय पर साहस, मोह पर कर्तव्य, घृणा पर प्रेम और अंधकार पर प्रकाश को चुनता है, तब उसके भीतर कृष्ण का जन्म होता है। जरूरी हैं?
- अर्जुन की दुविधा आज के मनुष्य की दुविधा, कुरुक्षेत्र आज का है नैतिक संघर्ष
- कर्मयोग आज देश भर के युवाओं को जिम्मेदारी से काम करने की बन सकता है प्रेरणा
- सच्चा नेता हमेशा स्वयं आगे खड़ा होकर ही नेतृत्व नहीं करता
- कभी-कभी वह किसी दूसरे को सही दिशा दिखाकर उसके पीछे निभाता है सारथी की भूमिका
अशोक झा/ सिलीगुड़ी: आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी इस बार विशेष ज्योतिषीय संयोग लेकर आ रही है। शुक्रवार को भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के साथ रोहिणी नक्षत्र का संयोग बनेगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भी अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। इस कारण इस संयोग को बेहद शुभ माना जा रहा है। पंडित अभय झा के अनुसार अष्टमी तिथि चार सितंबर की मध्यरात्रि 2:24 बजे से शुरू होकर पांच सितंबर की मध्यरात्रि 12:14 बजे तक रहेगी, जबकि रोहिणी नक्षत्र 4 सितंबर की रात 11:13 बजे तक रहेगा। अष्टमी और रोहिणी के संयोग को जयंती योग कहा जाता है। इसके साथ ही 4 सितंबर को सूर्य और बुध के सिंह राशि में एक साथ रहने से बुधादित्य योग भी बनेगा। ज्योतिष में इसे बुद्धि, मान-सम्मान और समृद्धि से जोड़कर देखा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि ऐसे शुभ संयोग में श्रीकृष्ण का व्रत और पूजन करने से सुख-शांति, यश और वैभव की प्राप्ति होती है। आज का मनुष्य तकनीकी रूप से अत्यंत शक्तिशाली है, लेकिन मानसिक रूप से अनेक प्रकार के तनावों से घिरा हुआ है। सूचना की गति बढ़ी है, लेकिन निर्णय की स्पष्टता हमेशा नहीं बढ़ी। विकल्प बढ़े हैं, लेकिन संतोष कम हुआ है। संपर्क बढ़ा है, लेकिन संवाद कई बार कमजोर हुआ है। ऐसे समय में कृष्ण का दर्शन नए अर्थ ग्रहण करता है। अर्जुन की दुविधा आज के मनुष्य की दुविधा है। कुरुक्षेत्र आज का नैतिक संघर्ष है। कृष्ण का सारथी रूप आज विवेकपूर्ण नेतृत्व का प्रतीक हो सकता है। कर्मयोग आज जिम्मेदारी से काम करने की प्रेरणा बन सकता है। कृष्ण हमें यह भी सिखाते हैं कि जीवन केवल श्वेत और श्याम में विभाजित नहीं होता। वास्तविक जीवन में परिस्थितियां जटिल होती हैं और निर्णयों के लिए विवेक, धैर्य और दूरदृष्टि आवश्यक होती है।नेतृत्व के स्तर पर कृष्ण की सबसे बड़ी सीख शायद यही है कि सच्चा नेता हमेशा स्वयं आगे खड़ा होकर ही नेतृत्व नहीं करता; कभी-कभी वह किसी दूसरे को सही दिशा दिखाकर उसके पीछे सारथी की भूमिका भी निभाता है।
जन्माष्टमी का बदलता स्वरूप और चुनौतियां
समय के साथ जन्माष्टमी का स्वरूप भी बदल रहा है। धार्मिक अनुष्ठानों के साथ बड़े सार्वजनिक आयोजन, सजावट, सांस्कृतिक कार्यक्रम और बाजार आधारित गतिविधियां जुड़ गई हैं। इससे पर्व की व्यापकता बढ़ी है, लेकिन इसके साथ कुछ चुनौतियां भी सामने आई हैं। त्योहार का अत्यधिक व्यावसायीकरण उसकी आध्यात्मिक संवेदना को कमजोर कर सकता है। प्लास्टिक सजावट, अत्यधिक बिजली खपत और उत्सव के बाद पैदा होने वाला कचरा पर्यावरण पर बोझ डालता है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि आधुनिक जन्माष्टमी भव्य होने के साथ-साथ संवेदनशील भी हो। मिट्टी की मूर्तियां, प्राकृतिक सजावट, कम प्लास्टिक, सामुदायिक स्वच्छता और जरूरतमंदों की सहायता जैसे कार्य पर्व की आत्मा को अधिक सार्थक बना सकते हैं।
कृष्ण का वैश्विक विस्तार: कृष्ण की लोकप्रियता अब भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं है। भगवद्गीता, योग और भारतीय दर्शन के प्रसार के साथ कृष्ण संबंधी विचार भी विश्व के विभिन्न हिस्सों में पहुंचे हैं। कृष्ण का वैश्विक स्वरूप कई रूपों में सामने आता है कहीं वे दार्शनिक हैं, कहीं योग और ध्यान की परंपरा के संदर्भ में देखे जाते हैं, तो कहीं भक्ति आंदोलन के केंद्र में।यह वैश्विक विस्तार इस बात का प्रमाण है कि कृष्ण की कथा में ऐसे प्रश्न मौजूद हैं जो केवल भारतीय समाज के प्रश्न नहीं हैं कर्तव्य क्या है? जीवन का उद्देश्य क्या है? प्रेम क्या है? संकट में निर्णय कैसे लिया जाए? और मनुष्य अपने भीतर के भय को कैसे जीत सकता है? इन्हीं सार्वभौमिक प्रश्नों के कारण कृष्ण की प्रासंगिकता समय और भूगोल की सीमाओं से परे हो जाती है।
कृष्ण : भारतीय संस्कृति के अनेक रंगों को जोड़ने वाला सूत्र : कृष्ण की सबसे बड़ी विशेषता शायद उनकी बहुलता है। वे किसी एक छवि में बंधते ही नहीं। वे गोकुल के बालक हैं तो द्वारका के शासक भी। वे वृंदावन के मुरलीधर हैं तो कुरुक्षेत्र के सारथी भी। वे राधा के प्रियतम हैं तो अर्जुन के मार्गदर्शक भी। वे लोकगीत के नायक हैं तो दर्शन के गंभीर अध्येता भी। यही कारण है कि कृष्ण भारतीय संस्कृति में विविध परंपराओं को जोड़ते हैं। लोक और शास्त्र, भक्ति और दर्शन, प्रेम और कर्तव्य, कला और आध्यात्मिकता इन सभी के बीच कृष्ण एक अदृश्य सेतु की तरह उपस्थित हैं। आज भी ब्रज की गलियों से लेकर द्वारका के मंदिरों तक जन्माष्टमी के अवसर पर कृष्ण की यही बहुरंगी उपस्थिति दिखाई देती है। आधिकारिक पर्यटन स्रोत भी जन्माष्टमी को आस्था, संस्कृति और परंपरा के समन्वित उत्सव के रूप में रेखांकित करते हैं।
कृष्ण का जन्म एक तिथि नहीं, एक चेतना का उदय है:
श्रीकृष्ण का जन्म केवल एक धार्मिक आख्यान का उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की उस शाश्वत चेतना का प्रतीक है, जो अंधकार में प्रकाश, अन्याय के बीच न्याय और संकट में विवेक की तलाश करती है। उनका संदेश है कि जीवन के संघर्षों से बचना संभव नहीं, लेकिन कठिन परिस्थितियों में दृष्टि को स्पष्ट रखते हुए अपने कर्म को सार्थक बनाया जा सकता है। कृष्ण की बांसुरी प्रेम की भाषा सिखाती है, गीता विवेक और कर्म का मार्ग दिखाती है। उनका बाल रूप सहजता का प्रतीक है, तो सारथी रूप जिम्मेदारी और कर्तव्य का बोध कराता है। राधा-कृष्ण की कथा समर्पण और आत्मीयता का भाव जगाती है, वहीं कुरुक्षेत्र का कृष्ण धर्म के पक्ष में दृढ़ता से खड़े होने की प्रेरणा देता है।इसीलिए कृष्ण किसी एक मंदिर या परंपरा तक सीमित नहीं हैं। वे भारतीय लोकमानस में भक्ति, दर्शन, प्रेम, साहित्य, कला, संगीत और नैतिकता की विविध धाराओं के रूप में प्रवाहित होते हैं। जन्माष्टमी इसी विराट चेतना के उदय की स्मृति है। इसका शाश्वत संदेश है कि जब मनुष्य भय पर साहस, मोह पर कर्तव्य, घृणा पर प्रेम और अंधकार पर प्रकाश को चुनता है, तब उसके भीतर कृष्ण का जन्म होता है।
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