- चीन का यह बुनियादी नेटवर्क खड़ा होना सुरक्षा बलों के लिए गंभीर चिंता का विषय
- 300 मिलियन अमेरिकी डॉलर (तकरीबन 2,500 करोड़ रुपये) के निवेश के साथ चीनी संस्थाएं यहां सड़क और पुल निर्माण के नाम पर अपनी मौजूदगी करा रही दर्ज
अशोक झा/ नेपाल बॉर्डर से: भारत के लिए बांग्लादेश में बढ़ती कट्टरता, जिहादी उग्रवाद और हथियारों का प्रसार अब आंतरिक मामला नहीं रह गया है। पूर्व विदेश मंत्री डॉ एके अब्दुल मोमेन की संयुक्त राष्ट्र से हस्तक्षेप की अपील के बाद नई दिल्ली में सुरक्षा एजेंसियां सिलीगुड़ी कॉरिडोर, सीमावर्ती जिलों और पूर्वोत्तर तक इसके संभावित असर को लेकर अलर्ट हो गई हैं। वहीं सामरिक विशेषज्ञों के मुताबिक सिलीगुड़ी कॉरिडोर भारत का वह संवेदनशील हिस्सा है, जहां अगर कोई प्रतिकूल स्थिति बनती है तो पूर्वोत्तर राज्यों का बाकी भारत से सड़क संपर्क प्रभावित हो सकता है। काकरभिट्टा में चल रहे निर्माण कार्यों के बीच इंजीनियरों और मजदूरों के भेष में खुफिया कर्मियों की मौजूदगी का अंदेशा जताया जा रहा है। भारतीय सीमा के इतने करीब चीन का यह बुनियादी नेटवर्क खड़ा होना सुरक्षा बलों के लिए गंभीर चिंता का विषय है। इसी वजह से काकरभिट्टा अब भारत और चीन की सुरक्षा एजेंसियों और कूटनीतिक तंत्र के बीच एक अदृश्य और खामोश प्रतिस्पर्धा का प्रमुख केंद्र बन चुका है।भारतीय सुरक्षा एजेंसियां दिन-रात इस सीमा पर चौकसी बनाए रखती हैं। हालांकि, चीन लंबे समय से इस मुख्य मार्ग के आसपास किसी न किसी बहाने अपनी पैठ बनाने की कोशिश कर रहा है। बांग्लादेश में तीस्ता नदी परियोजना के अलावा अब चीन ने नेपाल की सीमा का इस्तेमाल कर भारत के इस महत्वपूर्ण गलियारे पर नजर रखना शुरू कर दिया है।
काकरभिट्टा शहर का रणनीतिक स्थान और चीनी इरादे:
नेपाल का काकरभिट्टा शहर भारतीय सीमा और सिलीगुड़ी कॉरिडोर के बिल्कुल पास स्थित है। भौगोलिक बनावट ऐसी है कि इस शहर की जमीनी ऊंचाई से भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को जोड़ने वाले ट्रांसपोर्ट नेटवर्क पर आसानी से निगरानी रखी जा सकती है। इसी भौगोलिक स्थिति का फायदा उठाने के लिए चीन ने इस क्षेत्र में विशाल बुनियादी ढांचा तैयार करने की योजना बनाई है. लगभग 300 मिलियन अमेरिकी डॉलर (तकरीबन 2,500 करोड़ रुपये) के निवेश के साथ चीनी संस्थाएं यहां सड़क और पुल निर्माण के नाम पर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही हैं. यह क्षेत्र भारत की सुरक्षा के लिए खतरे की घंटी बन चुका है. भारतीय सुरक्षा एजेंसियां दिन-रात इस सीमा पर चौकसी बनाए रखती हैं. हालांकि, चीन लंबे समय से इस मुख्य मार्ग के आसपास किसी न किसी बहाने अपनी पैठ बनाने की कोशिश कर रहा है. बांग्लादेश में तीस्ता नदी परियोजना के अलावा अब चीन ने नेपाल की सीमा का इस्तेमाल कर भारत के इस महत्वपूर्ण गलियारे पर नजर रखना शुरू कर दिया है।हाईवे प्रोजेक्ट की आड़ में चीनी कंपनियों का कब्जा
नेपाल के काकरभिट्टा से लौकाही के बीच 95 किलोमीटर लंबे 'एशियन हाईवे कॉरिडोर' का निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है. वैसे तो इस विशाल प्रोजेक्ट को एशियन डेवलपमेंट बैंक (ADB) वित्तीय मदद दे रहा है, लेकिन इसका निर्माण करने का ठेका चीन की प्रमुख सरकारी कंपनियों के हाथ में आ चुका है. इन निर्माण कार्यों के बहाने चीन ने अपने भारी उपकरण, विशेषज्ञ इंजीनियर और तकनीकी कर्मियों का बड़ा अमला भारतीय सीमा के बेहद करीब तैनात कर दिया है. विकास कार्य के आड़ में सीमावर्ती इलाके में मशीनों का यह नेटवर्क सीधे तौर पर चीन के कूटनीतिक प्रभाव को बढ़ा रहा है।तीन रणनीतिक तरीकों से मजबूत की पकड़: चीन ने इस पूरे सीमावर्ती क्षेत्र में अपना दबदबा बनाने के लिए तीन अलग-अलग रणनीतिक कदम उठाए हैं।विशाल पुलों का निर्माण- 'चाइना स्टेट सेविंथ इंजीनियरिंग डिविजन' और 'कोवेक-CRGEC' जैसी प्रमुख चीनी कंपनियों के संयुक्त उपक्रम काकरभिट्टा के आसपास रतुवा, लोहंदरा और बकराहा जैसी नदियों पर विशालकाय रिवर ब्रिज तैयार कर रहे हैं।परिवहन तंत्र पर नियंत्रण- 'चाइना रेलवे नंबर 2 इंजीनियरिंग ग्रुप' पूर्वी नेपाल के प्रमुख ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर और क्षेत्रीय हाईवे को चौड़ा करने तथा अपग्रेड करने के प्रोजेक्ट्स का संचालन सीधे अपने हाथों में ले चुका है.
बहुराष्ट्रीय फंडिंग का लाभ- एशियाई विकास बैंक (ADB) से फंडेड 300 मिलियन डॉलर के प्रोजेक्ट्स में बोली जीतकर चीनी कंपनियों ने अपनी आक्रामक मौजूदगी स्थापित की है. फोर-लेन हाईवे बनाने के नाम पर चीनी श्रमिकों और अधिकारियों का दस्ता सीमा पर मुस्तैद है।एक और बड़ा खतरा बांग्लादेश के सरकारी शस्त्रागारों (आर्मरी) से लूटे गए हथियारों से पैदा हुआ है। खुफिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि ये लूटे गए घातक हथियार तस्करी के जरिए भारत के ब्लैक मार्केट में पहुंचाए जा सकते हैं। अगर ऐसा होता है, तो भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में सक्रिय विद्रोही गुटों और संगठित क्रिमिनल नेटवर्क्स के हाथ ये हथियार लग सकते हैं, जिससे सीमावर्ती इलाकों में हिंसा का नया दौर शुरू होने का अंदेशा है।
किन जिहादी नेटवर्क पर नजर?: भारतीय सुरक्षा तंत्र बांग्लादेश में जड़े जमा रहे चरमपंथी नेटवर्क्स पर चौबीसों घंटे नज़र बनाए हुए है। जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (JMB), नियो-JMB और अंसारुल्लाह बांग्ला टीम (अंसार अल-इस्लाम) जैसे खूंखार संगठन लगातार अपने पैर पसार रहे हैं। ये संगठन ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरीकों से युवाओं का ब्रेनवॉश कर रहे हैं। एजेंसियों को सिर्फ सीमा पार आतंकवाद का ही डर नहीं है, बल्कि इस बात की भी गहन जांच की जा रही है कि क्या ये नेटवर्क भारत के सीमावर्ती जिलों में सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की साजिश तो नहीं रच रहे। इसके अलावा 'अल-कायदा इन इंडियन सबकॉन्टिनेंट' (AQIS) और ISIS से जुड़े तार भी खंगाले जा रहे हैं।
नई दिल्ली के लिए बांग्लादेश का मौजूदा संकट सिर्फ वहां की घरेलू राजनीति तक सीमित मामला नहीं है। राजनीतिक अस्थिरता, कट्टरपंथ, हथियारों का कथित प्रसार, चरमपंथी नेटवर्क और सीमा की कमजोरियां-ये सभी कारक मिलकर भारत के लिए सुरक्षा चुनौती पैदा कर सकते हैं। यही कारण है कि भारतीय सुरक्षा एजेंसियां बांग्लादेश में होने वाले राजनीतिक और सुरक्षा बदलावों पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। खास तौर पर सीमा से लगे इलाकों, हथियारों की संभावित तस्करी और चरमपंथी नेटवर्क की गतिविधियों को लेकर सतर्कता बढ़ाई जा रही है।
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