वैसे तो हर मामले में बाबा की नगरी वाराणसी अप्रतिम है।
यहाँ हमारी जवानी बीती है,इसलिये बनारस को जी भरकर जी पाया हूँ ,धर्म,अध्यात्म,साहित्य,संगीत के अलावा यह नगरी चटोरों के लिए भी स्वर्ग है।यहाँ मिलनेवाले तीखे,चटपटे और ऊपर से क्रंची सकौडे का जवाब नहीं है।सबसे अच्छा कहाँ मिलता है ? यह बताना मुश्किल है लेकिन यह हर चौराहे पर शाम के बाद देर रात्रि तक बिकता है।अखबार की दुकान पर काम करने के दौरान खबरों से खाली होकर दिनभर की शारीरिक और मानसिक थकान मैं एक पुरवा सकौड़ा खाकर हीं मिटाता था,ऊपर से एक पुरवा और इसका गर्मागर्म रसा पी लेता था।सच मानिए मन चैतन्य हो जाता था।इसके एहसास से कलम की मजदूरी का तीखापन फीका लगने लगता था।
इसकी खासियत है कि यह रंगीन(भांग)और सादा दोनों मिलता है।हालांकि चार दशक बनारस गुजारने के बावजूद भांग या पान से मैं दूर हीं रहा लेकिन सादा सकौड़ा भी कम मजेदार नहीं होता है।
कहते हैं लूर, लुफुत,बाई मुअले पर जाई...आदत अभी भी नहीं छुट्टी है आज भी जब कभी बनारस जाता हूँ सकौडे का ठेला तलाश लेता हूँ...जानता हूँ फैटी लीवर,बैड कोलेस्ट्रॉल और हाई बीपी को नजरअंदाज करना कभी भी भारी पड़ सकता है...
अष्टभुजा शुक्ल की कविताओं में...
जो भी बनारस जाता है
कोई सिर के बाल,कोई जेब,कोई मन,कोई तन
अर्थात् कुछ न कुछ खोकर आता है
और जब कोई यहाँ से जाता है
हरी झंडी की तरह
बनारस अपने दोनों हाथ हिलाता है....
जिया राजा बनारस...
( वरिष्ठ पत्रकार अजित मिश्र की कलम से )
#Kashi #Banaras
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