- फोन बना नया हथियार! सीमांचल बिहार बंगाल झारखंड पर पाकिस्तानी हैंडलर्स और कट्टरपंथियों की नजर
- जैश-ए-मोहम्मद ने अब बंदूक और बारूद के पार अपनाई
डिजिटल जिहाद की एक नई रणनीति
अशोक झा/ कोलकाता: बंगाल के मुख्यमंत्री और राज्य के ही एक मंत्री को निशाने पर लेने वाले जैश ए मोहम्मद से जुड़े आतंकी और उसकी माशूका की गिरफ्तारी के बाद "चिकन नेक" में एक बार फिर सुर्खियों में है। बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि उन्हें अपनी सुरक्षा की चिंता नहीं है। चिंता है राष्ट्र की सुरक्षा की। क्योंकि जैश-ए-मोहम्मद ने अब बंदूक और बारूद के पार डिजिटल जिहाद की एक नई रणनीति अपनाई है। इस नीति पर वह सीमांचल बिहार बंगाल और झारखंड में पाँव फैलाने में लगा है।
2024 के बाद संगठन ने अपने प्रचार का नया अड्डा बना लिया है व्हाट्सऐप, जहां खुले तौर पर चल रहे चैनलों के जरिए ये भारत में पढ़े-लिखे स्मार्टफोन यूजर्स तक पहुंच रहा है। कुछ इसकी पुष्टि भी राज्य के स्पेशल टास्क फोर्स के आईजी आईजी गौरव शर्मा ने की है। उन्होंने बताया कि यह नेटवर्क केवल बंगाल या झारखंड तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार सीमा पार से जुड़े हैं। जांच अधिकारियों ने 'अबीर जाट 333', 'उजैर', 'राणा' और 'हमाद' नाम के चार प्रमुख पाकिस्तानी हैंडलर्स की पहचान की है, जो कथित तौर पर पाकिस्तान के कुख्यात शहजाद भट्टी गिरोह से ताल्लुक रखते हैं। ये आतंकी हैंडलर्स युवाओं का माइंडवॉश करने और देश विरोधी साजिशों को अंजाम देने के लिए ब्रिटेन और मेक्सिको के फर्जी सिम कार्ड्स का इस्तेमाल कर रहे थे।।डिजिटल नेटवर्क की जांच: एसटीएफ की शुरुआती जांच से स्पष्ट हुआ है कि यह नेटवर्क अपनी गतिविधियों को अंजाम देने और कोड वर्ड में बातचीत करने के लिए साधारण कॉल के बजाय व्हाट्सएप, टेलीग्राम, एलिमेंट एक्स और सेशन जैसे अत्याधुनिक एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स का सहारा ले रहा था। अर्पिता ने हमीम को रसूखदार राजनीतिक हस्तियों तक पहुंच बनाने और उनकी निजी जानकारियां एकत्र करने में अहम भूमिका निभाई थी। फिलहाल एसटीएफ की टीम दोनों आरोपियों के डिजिटल उपकरणों, चैट डेटा और वित्तीय लेनदेन की बारीकी से जांच कर रही है ताकि इस विशाल नेटवर्क की पूरी संरचना और इसमें शामिल अन्य संदिग्धों की पहचान की जा सके। बताया जा रहा है कि 13,000 से ज्यादा भारतीय फॉलोअर वाले जैश के चैनल:
जैश के संबद्ध व्हाट्सऐप चैनल (Markaz Sayyedna Tamim Dari (MSTD) के 13,000 से ज्यादा फॉलोअर हैं। ये चैनल जनवरी 2024 में बनाया गया था और इसमें जैश का रोजाना प्रचार प्रसार होता है। इसमें ऑडियो क्लिप, वीडियो मैसेज और कट्टर विचारधारा वाले बयान पोस्ट होते हैं। एक दूसरा चैनल (Madrasah Sayyidina Zayd Bin Sabit) भी ऑपरेशन सिंदूर के बाद जून 2024 में लॉन्च हुआ था, जिसके करीब 3,000 फॉलोअर्स हैं। ये चैनल लगातार धार्मिक भाषणों और कट्टर इस्लामी जीवनशैली अपनाने की बातें फैलाते हैं। तुलना करें तो MSTD के टेलीग्राम चैनल पर सिर्फ 188 सब्सक्राइबर हैं, जबकि व्हाट्सऐप पर ये 13,000 से ज्यादा हैं।इंस्टाग्राम और X (ट्विटर) पर उनके अकाउंट भारत में ब्लॉक कर दिए गए हैं लेकिन व्हाट्सऐप चैनल अब भी खुलेआम चल रहे हैं।डिजिटल जिहाद का नया इकोसिस्टम: इन चैनलों पर अब अजहर के पुराने भाषण, ई-बुक्स, नशीद (जिहादी गीत) और ऑनलाइन लेक्चर आसानी से शेयर किए जा रहे हैं. इस तरह जैश ने बहावलपुर से लेकर भारत के स्मार्टफोन तक अपनी पहुंच बना ली है। अब खुफिया एजेंसियां इन चैनलों और दिल्ली रेड फोर्ट कार बम धमाके (जिसमें 12 लोगों की मौत हुई) के बीच संभावित कनेक्शन की जांच कर रही हैं। जांच एजेंसियों के मुताबिक जैश का नया डिजिटल कैंपेन भारत के पत्रकारों और डिफेंस रिपोर्टर्स को भी निशाना बना रहा है। कई बार जैश ऐसे बयान जारी करता है जो सिर्फ मीडिया का ध्यान खींचने के लिए होते हैं जैसे नई 'विंग' के दावे या 'नए मिशन' के नाम पर फैलाई गई फर्जी सूचनाएं।
परिणाम ये होता है कि कई पत्रकार, यूट्यूबर या OSINT हैंडल अनजाने में जैश के प्रचार को ही आगे बढ़ा देते हैं। खुफिया सूत्रों के अनुसार, जैश ने अब जनरेटिव एआई टूल्स का भी इस्तेमाल शुरू कर दिया है जिससे अंग्रेजी और कभी-कभी हिंदी में भी कंटेंट तैयार होता है ताकि भारतीय यूजर्स को बेहतर तरीके से टारगेट किया जा सके। इतना ही नहीं लश्कर-ए-तैयबा का प्रचार भी भारतीय घरों तक पहुंच रहा है, जहां इसका स्रोत Facebook और अन्य सोशल मीडिया पेज हैं। जो पाकिस्तान मरकजी मुस्लिम लीग (PMML) नामक संगठन से जुड़े हैं। ये संगठन जमात-उद-दावा (JuD) और लश्कर-ए-तैयबा से संबद्ध है और भारत में आसानी से एक्सेस किया जा सकता है।
क्या है जैश ए मोहम्मद,कब हुई इसकी स्थापना : जैश-ए-मोहम्मद की स्थापना सन 2000 में हुई थी लेकिन इसके इतिहास को समझने के लिए थोड़ा और पीछे जाना होगा।
सन 1979 में कराची बिनोरिया टाउन मस्जिद के छात्र इरशाद अहमद ने अफ़ग़ानिस्तान में रूसियों के ख़िलाफ़ सशस्त्र जिहाद के लिए हरकत-उल-जिहाद-अल-इस्लामी (हूजी) की स्थापना की थी। सन 1984 में हूजी में विभाजन हो गया और पश्तून कमांडर फ़ज़लुर्रहमान ख़लील ने हरकत-उल-मुजाहिदीन की स्थापना की। नौ साल बाद 1993 में हूजी और हरकत-उल-मुजाहिदीन फिर से एक हो गए और इस संगठन का नाम हरकत-उल-अंसार रखा गया। इस एकीकरण में मसूद अज़हर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ये साथ चार साल तक चला। हरकत-उल-अंसार के अरब-अफ़ग़ानों के साथ संपर्क के कारण अमेरिका ने सन 1997 में इस पर प्रतिबंध लगा दिया। लेकिन एक साल बाद इस प्रतिबंध को चकमा देते हुए इसको जमात-उल-अंसार के रूप में फिर से उदय हुआ। जिस पर परवेज़ मुशर्रफ़ ने फिर प्रतिबंध लगा दिया। मसूद अज़हर को जब सन 1994 में कश्मीर में गिरफ़्तार किया गया तब वो हिज़्बुल मुजाहिदीन का सदस्य था। दिसंबर, 1999 में कंधार में भारतीय यात्री विमान के हाइजैक के बाद, भारतीय खुफ़िया अधिकारी मानते हैं कि भारतीय जेल से छूटकर मसूद ने अफ़ग़ानिस्तान का दौरा किया जहाँ मुल्ला उमर और ओसामा बिन लादेन से मुलाक़ात भी हुई। 14 फ़रवरी, 2019 को पूरी दुनिया ने जम्मू-श्रीनगर राजमार्ग पर पुलवामा में केंद्रीय रिज़र्व पुलिस फ़ोर्स (सीआरपीएफ़) के क़ाफ़िले पर एक ज़बरदस्त आत्मघाती हमले की ख़बर सुनी जिसमें 40 भारतीय सुरक्षाकर्मी मारे गए। इस हमले के लिए चरमपंथी संगठन जैश-ए-मोहम्मद को ज़िम्मेदार ठहराया गया जिसके बारे में भारत का मानना है कि उसका मुख्यालय पाकिस्तान में है। लेकिन पाकिस्तान इससे हमेशा इंकार करता रहा है।इस हमले की जाँच के लिए भेजे गए 12 सदस्यीय एनआईए के दल ने पुष्टि की कि इस हमले में 300 किलो विस्फोटक इस्तेमाल हुआ जिसमें 80 किलो हाई क्लास आरडीएक्स शामिल था। इस हमले के 12 दिन बाद भारत ने बालाकोट में हवाई हमला किया जिसे इसका जवाब बताया गया, भारत का कहना था कि उसने जैश-ए-मोहम्मद के ट्रेनिंग कैंप को निशाना बनाया। जैश के काम करने के तरीके पर सुरक्षा एजेंसियों का कहना ह कि, "कश्मीर में काम करने वाले दूसरे मिलिटेंट संगठनों की तुलना में जैश का काडर बहुत लो-प्रोफ़ाइल रखता है। गोपनीयता बनाए रखने के लिए वो अपने काडर की संख्या छोटी रखते हैं। लश्कर और हिज़्बुल मुजाहिदीन की तुलना में हर ज़िले में जैश की काडर संख्या बहुत कम है। ख़ुफ़िया विभाग के अधिकारियों के मुताबिक़, सन 2016 में गिरफ़्तार किए गए जैश चरमपंथी अब्दुल रहमान मुग़ल ने जाँचकर्ताओं को कुछ जानकारी दी थी जिसके मुताबिक, 'उन्हें कश्मीरी भाषा बोलने का भी प्रशिक्षण दिया जाता है। ट्रेनिंग हो जाने के बाद उन्हें एके-47 के 10 राउंड, पीका गन के पाँच राउंड, पिस्टल के सात राउंड और दो ग्रेनेड अभ्यास के लिए दिए जाते हैं।
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