- क्यों इनके आगे समय भी ठहर जाता है, अकाल मृत्यु इसके पूजा से टल जाता है
अशोक झा/ सिलीगुड़ी: आज सावन का पहला सोमवार है। देश में असख्य शिव के भक्त है। ऐसे में उन्हें जानना चाहिए कि क्यों देवों के देव महादेव को महाकाल कहा जाता है।भगवान शिव को महाकाल कहने के पीछे उनका असीम बल, काल पर नियंत्रण, संहार की शक्ति और मोक्ष प्रदाता स्वरूप है। वे न केवल मृत्यु के पार हैं, बल्कि स्वयं मृत्यु को नियंत्रित करते हैं। अतः वे संपूर्ण ब्रह्मांड के सबसे परम, सर्वशक्तिमान और समय के परे देवता हैं। इसीलिए उन्हें महाकालकहा जाता है।हिंदू धर्म में भगवान शिव को "महाकाल" कहा जाता है, जिसका अर्थ है "कालों के भी काल" अर्थात समय के स्वामी। यह नाम केवल उनकी शक्ति और स्वरूप को नहीं दर्शाता, बल्कि उनके उस स्वरूप को भी प्रकट करता है जो सृष्टि, पालन और संहार तीनों का नियंत्रक है। "महाकाल" शब्द में "महा" का अर्थ है महान और "काल" का अर्थ है समय या मृत्यु। अतः महाकाल वह हैं जो मृत्यु और समय से भी परे हैं।
काल के अधिपति: भगवान शिव को महाकाल कहने का मुख्य कारण यह है कि वे समय के भी स्वामी हैं। हर जीव इस संसार में जन्म लेता है और काल के प्रभाव से उसकी मृत्यु निश्चित होती है। परंतु शिव जी स्वयं काल से परे हैं, उनका न आदि है, न अंत। वे स्वयंभू हैं और उनका कोई विनाश नहीं हो सकता। इसलिए उन्हें महाकाल कहा जाता है।उज्जैन और महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग: शिव जी के महाकाल स्वरूप का विशेष महत्व उज्जैन में स्थित महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग से जुड़ा है। यह 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है और यहां शिव जी "महाकाल" रूप में विराजमान हैं। ऐसा माना जाता है कि जब उज्जैन पर संकट आया था, तब भगवान शिव ने "महाकाल" रूप धारण कर दुष्ट राक्षसों का संहार किया था। तभी से उन्हें यहां महाकालेश्वर के रूप में पूजा जाता है। संहारकर्ता रूप: त्रिदेवों में शिव को संहारकर्ता माना गया है। जब सृष्टि में पाप और अधर्म बढ़ता है, तो भगवान शिव तांडव करते हैं और संहार करते हैं। यह संहार ही नई सृष्टि का आधार बनता है। उनका यह रूप समय के अंत का प्रतीक होता है, जब सम्पूर्ण ब्रह्मांड को वे अपने भीतर समेट लेते हैं। इसीलिए वे केवल मृत्यु के देवता नहीं, बल्कि मृत्यु के भी स्वामी हैं।ध्यान और मोक्ष के प्रतीक: शिव जी योगियों के आराध्य हैं। वे ध्यान में लीन रहते हैं और मोक्ष का मार्ग दिखाते हैं। मोक्ष ही मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति है। जो शिव की शरण में आता है, वह कालचक्र से मुक्त हो जाता है। अतः महाकाल के रूप में वे जीवन-मरण के बंधन से मुक्ति दिलाने वाले देवता हैं।कालभैरव का जन्म: एक पौराणिक कथा के अनुसार, ब्रह्मा जी ने घमंड में आकर शिव जी का अपमान किया था। तब शिव जी ने अपने क्रोध से कालभैरव को उत्पन्न किया, जिन्होंने ब्रह्मा का अहंकार समाप्त किया। इस घटना से भी स्पष्ट होता है कि शिव किसी को भी दंड देने में संकोच नहीं करते, चाहे वह कोई भी हो। इस शक्ति के कारण वे महाकाल कहलाते हैं।मध्यप्रदेश के उज्जैन शहर में शिप्रा नदी के तट पर भगवान शिव महाकाल के रूप में विराजमान हैं। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में यह तीसरे स्थान पर आता है। उज्जैन में स्थित यह ज्योतिर्लिंग देश का इकलौता शिवलिंग है जो कि दक्षिण मुखी है। मंदिर से अनेक प्राचीन परंपराएं जुड़ी हैं। वहीं, इस मंदिर के कई अनसुलझे रहस्य भी हैं। भगवान शिव के कई नाम हैं, सदियों से उन्हें महादेव, भोलेनाथ, शंकर, शंभू, त्रिलोकपति के नाम से पुकारा जाता रहा है लेकिन उज्जैन में उन्हें महाकाल के नाम से पुकारा जाता है। आखिर भगवान शिव को यह नाम क्यों मिला और क्यों उन्हें कालों का काल कहा गया, आइए आज आपको भगवान शिव के महाकाल बनने की पौराणिक गाथा के बारे में बताते हैं। काल का संहार करने वाले हैं महाकाल
कहा जाता है कि उज्जैन जिसे पहले उज्जैनी और अवंतिकापुरी के नाम से भी जाना जाता था। यहां एक शिव भक्त ब्राह्मण निवास करता था। अंवतिकापुरी की जनता दूषण नाम के राक्षस के प्रकोप से त्राहि-त्राहि कर रही थी। लोग उसे काल के नाम से जानते थे। ब्रह्रा से जी दूषण को कई शक्तियां मिली थी, जिनका दुरुपयोग कर वह निर्दोष लोगों को परेशान करता था। राक्षस की शक्तियों के प्रकोप से ब्राह्मण काफी दुखी था, उसने भगवान शिव से राक्षस के नाश की प्रार्थना की, लेकिन भगवान ने काफी वक्त तक कुछ नहीं किया। प्रार्थनाओं का असर न होता देख एक दिन ब्रह्म भगवान शिव से नाराज हो गया और उनका पूजन बंद कर दिया। अपने ब्राह्मण भक्त को दुखी देख भगवान शिव हुंकार के रूप में प्रकट हुए और दूषण का वध कर दिया। क्योंकि लोग दूषण को काल कहते थे, इसलिए उसके वध के कारण भगवान शिव का नाम महाकाल पड़ा।
अकाल मृत्यु के निवारण के लिए की जाती है महाकाल की पूजा
काल का वध करने के कारण बाबा महाकाल की पूजा का विशेष महत्व है। कहा जाता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से बाबा महाकाल की आराधना करता है, उसे कभी मृत्यु का भय नहीं डराता न ही कभी उसकी अकाल मृत्यु होती है। मंदिर में अकाल मृत्यु के निवारण के लिए बाबा महाकाल की विशेष पूजा की जाती है। हाल ही में बने महाकाल लोक में भगवान शिव की दूषण के वध करने की एक विशाल प्रतिमा स्थापित की गई है। शिव पुराण में इससे जुड़ी एक बहुत ही अद्भुत कथा का वर्णन मिलता है।यह कहानी बताती है कि जब बात अपने सच्चे भक्त की रक्षा की आती है, तो स्वयं मृत्यु के देवता यमराज को भी पीछे हटना पड़ता है।।ऋषि मार्कंडेय और उनकी अल्पायु का संकट: पौराणिक कथा के अनुसार, ऋषि मृकंडु और उनकी पत्नी मरुद्वती के कोई संतान नहीं थी। उन्होंने भगवान शिव की कठोर तपस्या की। तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी ने उन्हें एक गुणी पुत्र का वरदान दिया, लेकिन उसकी आयु केवल 16 वर्ष निर्धारित की थी। उस बालक का नाम मार्कंडेय रखा गया। जैसे जैसे मार्कंडेय बड़े होने लगे, उनके माता पिता की चिंता बढ़ती गई. मार्कंडेय को जब अपनी कम आयु का पता चला, तो उन्होंने घबराने के बजाय भगवान शिव की भक्ति का मार्ग चुना।
महामृत्युंजय मंत्र का अखंड जाप: मार्कंडेय ने समुद्र तट पर शिवलिंग की स्थापना की और दिन रात शिवजी की आराधना में लीन हो गए। उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए महामृत्युंजय मंत्र की रचना की और उसका अखंड जाप करने लगे।जब उनकी आयु के 16 वर्ष पूरे होने का दिन आया, तब भी वे बिना डिगे पूरी श्रद्धा के साथ शिवलिंग से लिपटकर मंत्र जाप करते रहे. उन्हें अपनी मृत्यु का भय बिल्कुल भी नहीं था, क्योंकि उनका मन पूरी तरह शिव भक्ति में डूबा हुआ था.
जब यमराज के सामने प्रकट हुए महादेव
नियत समय पर यमराज के दूत बालक मार्कंडेय के प्राण लेने पहुंचे. लेकिन बालक की भक्ति और महामृत्युंजय मंत्र के प्रभाव के कारण कोई भी दूत उनके पास जाने की हिम्मत नहीं जुटा सका।इसके बाद स्वयं यमराज अपने महिष पर सवार होकर वहां पहुंचे. यमराज ने जैसे ही मार्कंडेय के प्राण हरने के लिए अपना पाश फेंका, बालक ने कसकर शिवलिंग को बाहों में भर लिया। यमराज के इस कदम से भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो गए और तुरंत शिवलिंग से प्रकट हो गए।
यमराज को भी सहना पड़ा शिवजी का क्रोध:
भगवान शिव का रूप उस समय अत्यंत विकराल था। उन्होंने अपने भक्त की रक्षा के लिए यमराज पर त्रिशूल से प्रहार कर दिया और उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।महादेव ने यमराज से साफ कहा कि जो मेरी शरण में आ जाता है, उसका काल भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता। शिवजी ने मार्कंडेय की अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें अमरता का वरदान दे दिया. यमराज को भी महादेव के सामने नतमस्तक होना पड़ा और वे खाली हाथ लौट गए।क्यों कहलाए महादेव महाकाल?
काल का अर्थ समय और मृत्यु दोनों होता है. चूंकि भगवान शिव ने स्वयं काल यानी यमराज को पराजित कर दिया और समय के चक्र को अपने वश में कर लिया, इसलिए वे महाकाल कहलाए.
महाकाल का सीधा अर्थ है जो काल से भी परे है और जिसके अधीन स्वयं मृत्यु काम करती है. उज्जैन के ज्योतिर्लिंग को भी इसी वजह से महाकाल कहा जाता है. ये कथा सिखाती है कि सच्चे मन से की गई भक्ति के आगे दुनिया की कोई भी शक्ति टिक नहीं सकती।
[03/08, 06:44] Slg Ashok Jha: मैथिलों का मधुश्रावणी पर्व आज से प्रारंभ, आज भी विवाहिता को देना पड़ता है अग्नि परीक्षा
- नाग पंचमी और मनसा पूजा का बनेगा दुर्लभ संयोग, 13 दिनों तक चलेगा
- यह पहला बड़ा पर्व जिसमें महिलाएं ही बनती है पंडित, फूल लोढने की परंपरा
अशोक झा/सिलीगुड़ी:
मिथिला का इतिहास संस्कृति परंपरा, रीति-रिवाज और जीवनशैली के लिए जाना जाता है। मिथिला की नव विवाहिता शादी के बाद मधुश्रावणी पूजा करती है।
मधुश्रावणी मिथिला क्षेत्र के सबसे प्रिय पर्वों में से एक है, जिसे सावन मास में नवविवाहिता मैथिल महिलाएं (जिन्हें पवनैतिन कहा जाता है) मनाती हैं। यह 13 से 15 दिनों तक चलने वाला व्रत है जो पति की दीर्घायु और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के लिए रखा जाता है। ठीक उसी तरह जैसे मान्यता है कि देवी पार्वती ने स्वयं यह व्रत रखकर हर जन्म में भगवान शिव को पति के रूप में पाया। यह पर्व इसलिए विशेष है क्योंकि इसे पूरी तरह महिलाएं ही संपन्न करती हैं। हर शाम, घर की सबसे वरिष्ठ महिला विधकरनी नवविवाहिता को शिव-पार्वती की कथा सुनाती हैं, और पूरा गांव मधुश्रावणी के पारंपरिक लोकगीतों से गूंज उठता है।
मिथिलांचल में नव विवाहिता की अग्नि परीक्षा:मधुश्रावणी पर्व के अंतिम दिन नव विवाहित महिलाओं को अग्नि परीक्षा से गुजारना पड़ता है. टेमी दागने के दौरान नवविवाहिता के घुटने पर पान का पत्ता रखा जाता है. जहां पर टेमी दागा जाता है वहां पान के पत्ते में छेद कर दिया जाता है. उसी जगह पर जलती हुई बाती से दागा जाता है. इस दौरान पति पान के पत्ते से अपनी पत्नी की आंखें बंद करता है और फिर जाकर टेमी दागने की प्रक्रिया खत्म होती है। टेमी दागने की परंपरा का कारण: महिला को जलती टेमी से दागने को लेकर अनेक लोग अनेक तरह का तर्क देते हैं. मिथिला में इसको लेकर एक मान्यता है कि ऐसा करने से पैरों और घुटने पर जो फफोले आते हैं वो पति और पत्नी के बीच प्रेम को दर्शाता है. इसको लेकर कहा जाता है कि जितना बड़ा फफोले का आकार होता है, उतना ही ज्यादा पति पत्नि के बीच प्रेम बढ़ता है। मधुश्रावणी बिहार बंगाल के मिथिलांचल और सीमांचल का प्रचलित त्योहार है। मिथिलांचल में ब्राह्मण, कर्ण कायस्थ, स्वर्णकार में यह त्यौहार मनाया जाता है।मधुश्रावणी का पर्व मिथिलांचल के उन परिवारों में मनाया जाता है जिनके परिवार में बेटी की शादी हुई होती है। यह त्यौहार नव विवाहित मानती है जिनकी शादी के एक साल पूरे नहीं हुए रहते हैं। नवविवाहित पूरे 14 दिनों तक नियम निष्ठा के साथ यह पर्व करती हैं। मिथिला का प्रमुख लोक पर्व मधुश्रावणी इस वर्ष 3 अगस्त, सोमवार से अमृत योग में आरंभ होगा। श्रावण मास की पहली सोमवारी से शुरू होने वाले इस पर्व के पहले दिन नाग पंचमी, मोना पंचमी और मनसा देवी पूजन का भी दुर्लभ संयोग बन रहा है। नवविवाहिताओं के लिए विशेष महत्व रखता है पर्व: सावन माह के आगमन के साथ ही मिथिला में विभिन्न पर्व-त्योहारों की शुरुआत हो जाती है। इनमें मधुश्रावणी का विशेष महत्व है। यह पर्व नवविवाहिताएं अपने पति की लंबी आयु, सुहाग की रक्षा तथा गृहस्थ जीवन में सुख, सम्मान और मर्यादा की कामना के साथ श्रद्धा और उल्लास पूर्वक मनाती हैं।
नाग देवता की पूजा से बढ़ती है दांपत्य जीवन की आयु:
मैथिल पंडित अभय झा ने बताया कि वैदिक काल से ही यह मान्यता है कि श्रावण मास में विधि-विधान से नाग देवता की पूजा करने से दंपति का जीवन सुखमय और दीर्घायु होता है। साथ ही, जीवन में काल का भय और वास्तु दोष भी दूर होता है।
13 दिनों तक चलता है मधुश्रावणी व्रत: पंडित अभय झा के अनुसार, मधुश्रावणी व्रत और पूजन 13 दिनों तक चलता है। इस वर्ष यह पर्व 3 अगस्त से शुरू होकर 15 अगस्त को समाप्त होगा। अंतिम दिन 'टेमी दागने' की परंपरा के साथ व्रत का समापन होता है। इसी दिन महिलाओं का स्वर्ण गौरी व्रत भी मनाया जाएगा।
गौरी-शंकर के साथ नाग-नागिन की होती है पूजा
इस पर्व में भगवान गौरी-शंकर के अलावा विषहरी माता और नाग-नागिन की विशेष पूजा की जाती है। मान्यता है कि नाग देवता की आराधना से परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
ससुराल से आए वस्त्र और भोजन का होता है प्रयोग
प्राचीन परंपरा के अनुसार, मधुश्रावणी के दौरान नवविवाहिताएं ससुराल से भेजे गए कपड़े और गहने ही धारण करती हैं। भोजन और फलाहार भी ससुराल से आए अन्न और सामग्री से ही किया जाता है। पर्व के पहले और अंतिम दिन विशेष रूप से विस्तृत पूजा-अर्चना की जाती है।नाग पंचमी के दिन से शुरू होने वाले इस पूजा में भगवान महादेव, माता पार्वती और नाग देवता की पूजा की जाती है।चौदह दिनों तक चलने वाले मधुश्रावणी पूजा में नवविवाहिताएं नमक का सेवन नहीं करती हैं।
जानें मधुश्रावणी का विधि विधान: मिथिलांचल में मधुश्रावणी त्यौहार का इतिहास सदियों पुराना है. मान्यता है कि नवविवाहित महिलाओं को उनके विवाहित जीवन में सहज बनाने के लिये इसकी शुरुआत की गई थी. नव विवाहित महिलाएं 16 श्रृंगार में दुल्हन के कपड़े पहनती हैं। अपने आसपास के घरों में लगे फूलों और पेड़ों के पत्ते इकट्ठा करती हैं और उन्हें बांस की बनी टोकरी जिसे मिथिला में (डाली) कहा जाता है में रखती हैं। शाम के समय में उस गांव की सभी नव विवाहित लड़कियां एक जगह इकट्ठा होकर इन फूलों से अपनी डाली को सजाती हैं।
माता पार्वती से जुड़ी कहानियां सुनाती: इस सजी हुई डाली के फूलों से अगले दिन भगवान शिव, माता गौरी और नाग देवता की पूजा करती हैं. इस पूजा को संपन्न करवाने के लिए परिवार की सबसे वरिष्ठ महिला- जिसे बिधकरी कहा जाता है। वे 14 दिनों तक प्रतिदिन भगवान शिव एवं माता पार्वती से जुड़ी कहानियां सुनाती हैं। '14 दिनों के अनुष्ठान में महिला पंडित':मधुश्रावणी पर्व में नव विवाहित महिला अपने पति के लंबी उम्र के लिए भगवान महादेव माता पार्वती और विषहरा की पूजा करती हैं। 14 दिनों तक चलने वाले इस अनुष्ठान में मधुर श्रावणी का व्रत कथा सुनाया जाता है. सबसे दिलचस्प बात ये है कि कर्मकांड में पुरुषों का बोलबाला है. लेकिन मिथिलांचल में मधुश्रावणी पर्व में पंडित की भूमिका महिला निभाती हैं। 14 दिनों तक चलने वाले अनुष्ठान में पहले दिन मौन पंचमी कथा का वर्णन सुनाया जाता है।
महादेव की पारिवारिक कथा सुनाई जाती: दूसरे दिन की कथा में बिहुला एवं मनसा का कथा विषहरा का कथा एवं मंगला गौरी का कथा सुनाया जाता है. तीसरे दिन की कथा में पृथ्वी का जन्म एवं समुद्र मंथन का कथा सुनाया जाता है. चौथे दिन की कथा में माता सती की कथा सुनाई जाती है. पांचवें दिन के कथा में महादेव की पारिवारिक कथा सुनाया जाता है. छठे दिन की कथा में गंगा का कथा गौरी का जन्म एवं कामदहन की कथा सुनाई जाती है.
गौरी के विवाह की कथा सुनाई जाती:सातवें दिन की कथा माता गौरी की तपस्या की कथा सुनाई जाती है. आठवें दिन की कथा में गौरी के विवाह की कथा सुनाई जाती है. नौवे दिन की कथा में मैना का मोह एवं गौरी के विवाह कथा सुनाई जाती है. दसवें दिन की कथा में कार्तिक एवं गणेश भगवान के जन्म की कथा सुनाई जाती है. 11वे दिन संध्या के विवाह की कथा सुनाई जाती है. 12वें दिन बाल बसंत एवं गोसावन का कथा सुनाया जाता है और 13 वें दिन श्रीकर राजा के कथा को सुनाया जाता है। माता पार्वती ने की थी व्रत की शुरुआत:ऐसी मान्यता है कि माता पार्वती ने सर्व प्रथम मधुश्रावणी व्रत रखी थी। जन्मजन्मांतर तक शिव को अपने पति रूप में रखने के लिए इस पर्व में शिव पार्वती की कथा आज भी सुनाई जाती है. पूरे मिथिलांचल के हर एक गांव में मंदिरों पर एवं शिवालयो पर गांव की नवविवाहिता एक जगह इकट्ठा होकर भगवान महादेव एवं माता पार्वती को खुश करने के लिए और अपना दांपत्य जीवन खुशहाल बनाने के लिए यह पर्व मानती है।
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