- फिर क्या मैं बोलूं, कृपया शांत हो जाइए- तस्लीमा नसरीन
- अपील पर खामोशी से लोगों में तस्लीमा नसरीन को सुना
अशोक झा/ कोलकाता: करीब दो दशक बाद कोलकाता लौटीं निर्वासित बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन के एक कार्यक्रम में शनिवार को हंगामा हो गया।बताया जा रहा है कि कार्यक्रम के दौरान तसलीमा नसरीन ने मशहूर बांग्ला कवि जॉय गोस्वामी को मंच पर बुलाया।लोगों ने जबरदस्त नारेबाजी शुरू कर दी. जिससे गोस्वामी ठिठक गए और वापस अपनी सीट पर बैठ गए. इसके बाद नसरीन ने लोगों से शांत होने की अपील की, जिसके बाद कार्यक्रम दोबारा चालू हो पाया।
क्या मैं बोलूं, कृपया शांत हो जाइए- तस्लीमा नसरीन
जब यह हंगामा शुरू हुआ तो नसरीन कुछ देर तक माइक के पास चुपचाप खड़ी रही. इस दौरान आयोजक लोगों से शांति बनाए रखने की अपील करते रहे लेकिन लोग शांत नहीं हुए. आखिरकार तस्लीमा नसरीन ने अपनी चुप्पी तोड़ी और कहा, 'क्या मैं बोलूं. कृपया शांत हो जाइए. अपनी सीटों पर बैठ जाइए।उनकी इस अपील के बाद व्यवस्था बहाल हुई और नसरीन आगे लोगों को संबोधित कर पाईं. अपने संबोधन में भावुक दिख रहीं नसरीन ने कहा कि ऐसा लग रहा है, जैसे वे जीवन के उस हिस्से में वापस आ गई हैं, जिसे वे पीछे छोड़ गई थीं. उन्होंने कहा कि उनकी घर वापसी इस बात का प्रमाण है कि अन्याय लंबा हो सकता है लेकिन स्थायी नहीं हो सकता. उन्होंने उम्मीद जताई कि किसी भी लेखक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का प्रयोग करने के लिए भविष्य में इस तरह निर्वासन में नहीं जाना पड़ेगा।
जॉय गोस्वामी पर भड़क उठे लोग: जॉय गोस्वामी से लोग इस बात से नाराज थे कि जब तस्लीमा नसरीन को तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य से बाहर निकाला था तो गोस्वामी चुप रहे और साहित्यकार होने के बावजूद उन्होंने विरोध नहीं किया।दर्शकों के विरोध को देखते हुए जय गोस्वामी तुरंत वापस अपनी सीट पर बैठ गए। इस दौरान कुछ समय के लिए कार्यक्रम बाधित रहा और तसलीमा नसरीन भी अपना संबोधन रोककर माइक के सामने खड़ी रहीं। बाद में स्थिति सामान्य होने पर कार्यक्रम आगे बढ़ाया गया।
दर्शकों के एक वर्ग की नाराजगी की वजह जय गोस्वामी का तसलीमा नसरीन के निर्वासन के मुद्दे पर वर्षों से रहा मौन रुख और राज्य की पूर्व राजनीतिक परिस्थितियों से जुड़ी उनकी निकटता को माना जा रहा है। हालांकि, इस संबंध में आयोजकों या जय गोस्वामी की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि जॉय गोस्वामी इससे पहले तस्लीमा नसरीन के लंबे निर्वासन पर सार्वजनिक रूप से खेद व्यक्त कर चुके थे. उन्होंने कहा था कि जब 2007 में लेखिका को उनके लेखन पर हुए हिंसक विरोध प्रदर्शनों की वजह से बंगाल छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था, तब वामपंथी सरकार और बाद में टीएमसी सरकार ने पर्याप्त कदम नहीं उठाए थे. इसके लिए वे खुद को दोषी मानते हैं। वर्ष 2007 में बंगाल छोड़ने को किया था मजबूर :उनके इस कबूलनामे के बावजूद टीएमसी शासन में हुए अत्याचारों की वजह से लोगों में ममता से जुड़े तमाम लोगों के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा बना हुआ है. वे किसी भी हाल में उन्हें सम्मान मिलते देखने को तैयार नहीं हैं।
2007 के बाद कोलकाता में तसलीमा नसरीन का कार्यक्रम: यह कार्यक्रम नवंबर 2007 के बाद कोलकाता में नसरीन की पहली सार्वजनिक उपस्थिति थी. उस समय उन्हें अपनी आत्मकथा ‘द्विखंडितो’ (Split: A Life) के कुछ हिस्सों को लेकर हुए हिंसक विरोध-प्रदर्शनों के बीच शहर छोड़ना पड़ा था. यह विवाद किताब के प्रकाशन के बाद शुरू हुआ था, जिससे पश्चिम बंगाल के कई हिस्सों में विरोध-प्रदर्शन हुए थे।
तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार ने किताब पर प्रतिबंध लगा दिया था और कानून-व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति का हवाला देते हुए नसरीन को कोलकाता से बाहर भेज दिया था, जिसके बाद वे राज्य छोड़कर चली गई थीं. बीजेपी सरकार के लिए, नसरीन की वापसी का एक राजनीतिक महत्व है जो किसी साहित्यिक कार्यक्रम से कहीं बढ़कर है। बंगाल की राजनीति में लंबे समय से विवाद: 2007 में कोलकाता से उन्हें जबरन बाहर भेजे जाने की घटना बंगाल की राजनीति में लंबे समय से विवाद का विषय रही है. बीजेपी अक्सर इस घटना का ज़िक्र करके वाम मोर्चा और तृणमूल कांग्रेस की सरकारों पर धार्मिक कट्टरपंथ और वोट-बैंक की राजनीति के आगे अभिव्यक्ति की आजादी से समझौता करने का आरोप लगाती रही है।
कोलकाता के प्रमुख सांस्कृतिक स्थलों में से एक में नसरीन का सार्वजनिक रूप से स्वागत करके और उनकी वापसी को संवैधानिक आजादी की बहाली के सबूत के तौर पर पेश करके, बीजेपी सरकार ने राज्य की पिछली राजनीतिक व्यवस्था से पूरी तरह अलग होने की अपनी बात को मजबूत करने की कोशिश की।
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