- नाग पंचमी और मनसा पूजा का बनेगा दुर्लभ संयोग, 13 दिनों तक चलेगा
- यह पहला बड़ा पर्व जिसमें महिलाएं ही बनती है पंडित, फूल लोढने की परंपरा
अशोक झा/ मिथिलांचल:मिथिला का इतिहास संस्कृति परंपरा, रीति-रिवाज और जीवनशैली के लिए जाना जाता है। मिथिला की नव विवाहिता शादी के बाद मधुश्रावणी पूजा करती है।
मधुश्रावणी मिथिला क्षेत्र के सबसे प्रिय पर्वों में से एक है, जिसे सावन मास में नवविवाहिता मैथिल महिलाएं (जिन्हें पवनैतिन कहा जाता है) मनाती हैं। यह 13 से 15 दिनों तक चलने वाला व्रत है जो पति की दीर्घायु और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के लिए रखा जाता है — ठीक उसी तरह जैसे मान्यता है कि देवी पार्वती ने स्वयं यह व्रत रखकर हर जन्म में भगवान शिव को पति के रूप में पाया। यह पर्व इसलिए विशेष है क्योंकि इसे पूरी तरह महिलाएं ही संपन्न करती हैं। हर शाम, घर की सबसे वरिष्ठ महिला विधकरनी नवविवाहिता को शिव-पार्वती की कथा सुनाती हैं, और पूरा गांव मधुश्रावणी के पारंपरिक लोकगीतों से गूंज उठता है।
मिथिलांचल में नव विवाहिता की अग्नि परीक्षा:मधुश्रावणी पर्व के अंतिम दिन नव विवाहित महिलाओं को अग्नि परीक्षा से गुजारना पड़ता है. टेमी दागने के दौरान नवविवाहिता के घुटने पर पान का पत्ता रखा जाता है. जहां पर टेमी दागा जाता है वहां पान के पत्ते में छेद कर दिया जाता है. उसी जगह पर जलती हुई बाती से दागा जाता है. इस दौरान पति पान के पत्ते से अपनी पत्नी की आंखें बंद करता है और फिर जाकर टेमी दागने की प्रक्रिया खत्म होती है। टेमी दागने की परंपरा का कारण: महिला को जलती टेमी से दागने को लेकर अनेक लोग अनेक तरह का तर्क देते हैं. मिथिला में इसको लेकर एक मान्यता है कि ऐसा करने से पैरों और घुटने पर जो फफोले आते हैं वो पति और पत्नी के बीच प्रेम को दर्शाता है. इसको लेकर कहा जाता है कि जितना बड़ा फफोले का आकार होता है, उतना ही ज्यादा पति पत्नि के बीच प्रेम बढ़ता है। मधुश्रावणी बिहार बंगाल के मिथिलांचल और सीमांचल का प्रचलित त्योहार है। मिथिलांचल में ब्राह्मण, कर्ण कायस्थ, स्वर्णकार में यह त्यौहार मनाया जाता है।मधुश्रावणी का पर्व मिथिलांचल के उन परिवारों में मनाया जाता है जिनके परिवार में बेटी की शादी हुई होती है। यह त्यौहार नव विवाहित मानती है जिनकी शादी के एक साल पूरे नहीं हुए रहते हैं। नवविवाहित पूरे 14 दिनों तक नियम निष्ठा के साथ यह पर्व करती हैं। मिथिला का प्रमुख लोक पर्व मधुश्रावणी इस वर्ष 3 अगस्त, सोमवार से अमृत योग में आरंभ होगा। श्रावण मास की पहली सोमवारी से शुरू होने वाले इस पर्व के पहले दिन नाग पंचमी, मोना पंचमी और मनसा देवी पूजन का भी दुर्लभ संयोग बन रहा है। नवविवाहिताओं के लिए विशेष महत्व रखता है पर्व: सावन माह के आगमन के साथ ही मिथिला में विभिन्न पर्व-त्योहारों की शुरुआत हो जाती है। इनमें मधुश्रावणी का विशेष महत्व है। यह पर्व नवविवाहिताएं अपने पति की लंबी आयु, सुहाग की रक्षा तथा गृहस्थ जीवन में सुख, सम्मान और मर्यादा की कामना के साथ श्रद्धा और उल्लास पूर्वक मनाती हैं।
नाग देवता की पूजा से बढ़ती है दांपत्य जीवन की आयु:
मैथिल पंडित अभय झा ने बताया कि वैदिक काल से ही यह मान्यता है कि श्रावण मास में विधि-विधान से नाग देवता की पूजा करने से दंपति का जीवन सुखमय और दीर्घायु होता है। साथ ही, जीवन में काल का भय और वास्तु दोष भी दूर होता है।
13 दिनों तक चलता है मधुश्रावणी व्रत: पंडित अभय झा के अनुसार, मधुश्रावणी व्रत और पूजन 13 दिनों तक चलता है। इस वर्ष यह पर्व 3 अगस्त से शुरू होकर 15 अगस्त को समाप्त होगा। अंतिम दिन 'टेमी दागने' की परंपरा के साथ व्रत का समापन होता है। इसी दिन महिलाओं का स्वर्ण गौरी व्रत भी मनाया जाएगा।
गौरी-शंकर के साथ नाग-नागिन की होती है पूजा
इस पर्व में भगवान गौरी-शंकर के अलावा विषहरी माता और नाग-नागिन की विशेष पूजा की जाती है। मान्यता है कि नाग देवता की आराधना से परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
ससुराल से आए वस्त्र और भोजन का होता है प्रयोग
प्राचीन परंपरा के अनुसार, मधुश्रावणी के दौरान नवविवाहिताएं ससुराल से भेजे गए कपड़े और गहने ही धारण करती हैं। भोजन और फलाहार भी ससुराल से आए अन्न और सामग्री से ही किया जाता है। पर्व के पहले और अंतिम दिन विशेष रूप से विस्तृत पूजा-अर्चना की जाती है।नाग पंचमी के दिन से शुरू होने वाले इस पूजा में भगवान महादेव, माता पार्वती और नाग देवता की पूजा की जाती है।चौदह दिनों तक चलने वाले मधुश्रावणी पूजा में नवविवाहिताएं नमक का सेवन नहीं करती हैं।
जानें मधुश्रावणी का विधि विधान: मिथिलांचल में मधुश्रावणी त्यौहार का इतिहास सदियों पुराना है. मान्यता है कि नवविवाहित महिलाओं को उनके विवाहित जीवन में सहज बनाने के लिये इसकी शुरुआत की गई थी. नव विवाहित महिलाएं 16 श्रृंगार में दुल्हन के कपड़े पहनती हैं। अपने आसपास के घरों में लगे फूलों और पेड़ों के पत्ते इकट्ठा करती हैं और उन्हें बांस की बनी टोकरी जिसे मिथिला में (डाली) कहा जाता है में रखती हैं। शाम के समय में उस गांव की सभी नव विवाहित लड़कियां एक जगह इकट्ठा होकर इन फूलों से अपनी डाली को सजाती हैं।
माता पार्वती से जुड़ी कहानियां सुनाती: इस सजी हुई डाली के फूलों से अगले दिन भगवान शिव, माता गौरी और नाग देवता की पूजा करती हैं. इस पूजा को संपन्न करवाने के लिए परिवार की सबसे वरिष्ठ महिला- जिसे बिधकरी कहा जाता है। वे 14 दिनों तक प्रतिदिन भगवान शिव एवं माता पार्वती से जुड़ी कहानियां सुनाती हैं। '14 दिनों के अनुष्ठान में महिला पंडित':मधुश्रावणी पर्व में नव विवाहित महिला अपने पति के लंबी उम्र के लिए भगवान महादेव माता पार्वती और विषहरा की पूजा करती हैं। 14 दिनों तक चलने वाले इस अनुष्ठान में मधुर श्रावणी का व्रत कथा सुनाया जाता है. सबसे दिलचस्प बात ये है कि कर्मकांड में पुरुषों का बोलबाला है. लेकिन मिथिलांचल में मधुश्रावणी पर्व में पंडित की भूमिका महिला निभाती हैं। 14 दिनों तक चलने वाले अनुष्ठान में पहले दिन मौन पंचमी कथा का वर्णन सुनाया जाता है।
महादेव की पारिवारिक कथा सुनाई जाती: दूसरे दिन की कथा में बिहुला एवं मनसा का कथा विषहरा का कथा एवं मंगला गौरी का कथा सुनाया जाता है. तीसरे दिन की कथा में पृथ्वी का जन्म एवं समुद्र मंथन का कथा सुनाया जाता है. चौथे दिन की कथा में माता सती की कथा सुनाई जाती है. पांचवें दिन के कथा में महादेव की पारिवारिक कथा सुनाया जाता है. छठे दिन की कथा में गंगा का कथा गौरी का जन्म एवं कामदहन की कथा सुनाई जाती है.
गौरी के विवाह की कथा सुनाई जाती:सातवें दिन की कथा माता गौरी की तपस्या की कथा सुनाई जाती है. आठवें दिन की कथा में गौरी के विवाह की कथा सुनाई जाती है. नौवे दिन की कथा में मैना का मोह एवं गौरी के विवाह कथा सुनाई जाती है. दसवें दिन की कथा में कार्तिक एवं गणेश भगवान के जन्म की कथा सुनाई जाती है. 11वे दिन संध्या के विवाह की कथा सुनाई जाती है. 12वें दिन बाल बसंत एवं गोसावन का कथा सुनाया जाता है और 13 वें दिन श्रीकर राजा के कथा को सुनाया जाता है। माता पार्वती ने की थी व्रत की शुरुआत:ऐसी मान्यता है कि माता पार्वती ने सर्व प्रथम मधुश्रावणी व्रत रखी थी। जन्मजन्मांतर तक शिव को अपने पति रूप में रखने के लिए इस पर्व में शिव पार्वती की कथा आज भी सुनाई जाती है. पूरे मिथिलांचल के हर एक गांव में मंदिरों पर एवं शिवालयो पर गांव की नवविवाहिता एक जगह इकट्ठा होकर भगवान महादेव एवं माता पार्वती को खुश करने के लिए और अपना दांपत्य जीवन खुशहाल बनाने के लिए यह पर्व मानती है।
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