अशोक झा/ सिलीगुड़ी: विश्व के मूलनिवासी समुदाय केवल मानव सभ्यता के प्राचीनतम सामाजिक समूह नहीं हैं, बल्कि पृथ्वी की जैव विविधता, पारंपरिक ज्ञान, सांस्कृतिक विरासत और पर्यावरणीय संतुलन के सबसे महत्वपूर्ण संरक्षक भी हैं।
बंगाल में 12 लाख से अधिक आदिवासी सदियों से प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का जीवन जिया है। जंगल, नदियां, पहाड़ और भूमि उनके लिए केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार, पहचान और आध्यात्मिक संबंध रहे हैं।विश आदिवासी दिवस के मौके पर राज्य के वित्त सह परिवहन मंत्री आनंदमय बर्मन ने कहा कि प्रकृति के जड़ों को यह समाज आज भी बचाने में लगा है। इसी ऐतिहासिक और वैश्विक महत्व को स्वीकार करते हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 1994 में प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की। यह तिथि 1982 में संयुक्त राष्ट्र के की पहली बैठक की स्मृति में निर्धारित की गई थी। तब से यह दिवस हर वर्ष मूलनिवासी समुदायों के अधिकारों, संस्कृति और योगदान पर वैश्विक चर्चा का मंच बनता आया है। आज विश्व में लगभग 47.6 करोड़ (476 मिलियन) मूलनिवासी लोग 90 से अधिक देशों में निवास करते हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, वे विश्व की कुल जनसंख्या का लगभग 6 प्रतिशत हैं, किंतु विश्व के अत्यंत गरीब लोगों में उनकी हिस्सेदारी लगभग 19 प्रतिशत है। यह आंकड़ा स्पष्ट करता है कि सांस्कृतिक रूप से समृद्ध होने के बावजूद आर्थिक और सामाजिक न्याय की दृष्टि से ये समुदाय अब भी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।
भारत में “Indigenous Peoples” शब्द का संवैधानिक उपयोग नहीं किया गया है। भारतीय संविधान “अनुसूचित जनजाति शब्द का प्रयोग करता है। फिर भी वैश्विक मूलनिवासी विमर्श के मूल सिद्धांत सांस्कृतिक संरक्षण, आत्मसम्मान, प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार और सहभागी विकास—भारतीय आदिवासी समाज की ऐतिहासिक यात्रा से गहराई से जुड़े हुए हैं। भारत का आदिवासी समाज : सांस्कृतिक विविधता का जीवंत प्रतीक: भारत विश्व के सबसे बड़े आदिवासी समुदायों वाले देशों में शामिल है। जनगणना 2011 के अनुसार, देश में अनुसूचित जनजातियों की जनसंख्या लगभग 10.45 करोड़ है, जो कुल आबादी का 8.6 प्रतिशत है। संविधान के अनुच्छेद 342 के अंतर्गत 700 से अधिक अनुसूचित जनजातियां अधिसूचित हैं। बंगाल,झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान तथा पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में आदिवासी समाज की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराएं आज भी जीवंत हैं। मुंडा, संथाल, उरांव, हो, खड़िया, बिरहोर, असुर, गोंड, भील, मीणा, नागा, मिजो, खासी, गारो और अनेक अन्य जनजातियां भारत की बहुलतावादी संस्कृति को समृद्ध बनाती हैं।
इन समुदायों की जीवन-शैली सामुदायिक स्वामित्व, प्रकृति के प्रति गहन सम्मान, श्रम की गरिमा, सामाजिक समानता और स्थानीय लोकतंत्र जैसे मूल्यों पर आधारित रही है। आज जब विश्व सतत विकास और जलवायु न्याय की चर्चा कर रहा है, तब आदिवासी समाज का पारंपरिक जीवन-दर्शन इन अवधारणाओं का व्यवहारिक उदाहरण प्रस्तुत करता है। सरहुल, करमा, सोहराय जैसे त्योहार, सामुदायिक वन प्रबंधन और औषधीय पौधों का ज्ञान आज भी पर्यावरण संरक्षण का जीवंत पाठ पढ़ाते हैं।
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