रविवार को दिल्ली के केंद्रीय सचिवालय मेट्रो स्टेशन गेट नम्बर 4 से इंडिया गेट के कर्तव्य पथ पर चलते हुए मैं दिनेश चंद्र मिश्रा आप सबसे दिल की बात कर रहा हूँ। यहां पर अमर जवान ज्योति पर शहीदों को नमन करने के साथ ही अपनी माँ कुसुमलता और पिता कृपा शंकर मिश्र को भी नमन कर रहा हूं।
समय की खूबी है कि वो बदलता जरूर है, और आज मेरे इस बदले हुए समय में मुझे अपने पिता और माता बहुत याद आ रहें हैं। मन कर रहा है कि वे सिर्फ एक बार ही सही, लौट आएं और मैं नज़र झुकाये हुए उनके पाँव छू कर बताऊं कि जो मैं नहीं कर पाया, वो बच्चियों ने कर दिखाया।
इसका कारण भावनात्मक है, दरअसल बच्चे को ऊँगली पकड़ कर राह दिखाता हर पिता उसको लेकर एक सपना बुनता है, और जब बच्चा वो सपना पूरा नहीं कर पाता, तो वो ऊपर से कितना भी मजबूत दिखे, अंदर से बिखर ही जाता है। पिताओं में एक कमजोरी होती है, वे असफलता का दोष कभी भी अपनी संतानों को नहीं देते, लेकिन पिता की ठहर गयी जिंदगी को देख कर उस संतान को जो ग्लानि होती है, उसका मैं भुक्तभोगी हूँ।
राजकीय इंटर कॉलेज बस्ती में शिक्षक रहे मेरे पिता ने मुझे लेकर भी एक सपना देखा था। संघर्ष के रास्ते इस समाज में अपनी पहचान बनाने वाले पिता का एक ही सपना था कि मैं उनसे भी कुछ बड़ा कर दिखाऊं, अपनी उपलब्धियों एक ऐसी बड़ी लकीर खींचूं, जो उन्हें गौरवान्वित करे, पर नियति तो कुछ और ही चाहती थी। बात अस्सी के अंतिम दशक की है, जब पिता के इस सपने को पूरा करने के लिए मैं पॉलीटेक्निक और इंजीनियरिंग के बीच में कुलांचे खाते हुए दौड़ रहा था और इनकी परीक्षा देने के नाम पर मेरा प्रदेश के कई शहरों का भ्रमण भी हो गया, लेकिन मुआ इन संस्थाओं में दाखिला तो दूर रहा, प्राप्तांक भी माइनस मार्क में ही आते थे। समय का चक्र और किस्मत का पहिया साथ घूमते रहे, किसान डिग्री कॉलेज से बीएससी के बाद लखनऊ यूनिवर्सिटी में बीएड की पढ़ाई छोड़कर पत्रकारिता में परास्नातक डिग्री हासिल की और हिंदुस्तान अखबार की लखनऊ लॉन्चिंग से स्ट्रिंगर के रूप में कैरियर प्रारंभ हुआ। कालान्तर में स्टाफर बनने के बाद गोरखपुर तैनाती हुई, फिर शादी और फिर काशी के हिन्दुस्तान ब्यूरो में तैनाती के दौरान बाबा काशी विश्वनाथ ने दो पुत्रियों की सौगात से नवाजा। पिता जी ने ही बड़ी बेटी का नाम शिवानी रखा तो माँ ने छोटी बेटी का क्षमा।
वक़्त का पहिया कुछ और घूमा और मैं दैनिक हिंदुस्तान से अमर उजाला में आ गया। माता-पिता के आदेश पर बेटियों संग पत्नी को लेकर बनारस पहुँच गया। हिंदुस्तान ब्यूरो चीफ एके लारी और टाइम्स ऑफ इंडिया के बिनय सिंह की कोशिशों से यायावरी ख़त्म हुई और शिवपुरवा में डमरू बाबा के मकान में किराए पर एक कमरा मिल गया। फिर तो महादेव की नगरी में उनके आशीर्वाद से धर्मपत्नी अनामिका व बेटियों संग जिंदगी का सफर चल पड़ा
2005 की बात है, बेटियों का दाखिला मोहल्ले के ही राकेश जूनियर हाईस्कूल में होने के साथ इनको विद्यालय पहुंचाने व वापस घर लाने की ड्यूटी पत्नी ने संभाल ली। इसी बीच माताजी की तबियत बस्ती में खराब हो गई, उन्हें बनारस लेता आया और उसी किराए के कमरे में ही पत्नी संग सेवा में जुटा रहा। काशी में माँ को मोक्ष प्राप्त हुआ लेकिन जीवन की कड़ी धुप में मुझको सुकून देती माँ की छाँव हट गयी, अपने हाथों से उन्हें हरिश्चंद्र घाट पर मुखाग्नि देकर वापस लौटे पिता भी कुछ समय बाद गाँव वापस लौट गए। पिता जी बेटियों का हालचाल लेने 2007 में फिर काशी आये और मुझे स्नान कराने अलसुबह गंगा घाट ले गए। गंगा तीरे स्नान के बाद पिताजी ने मुझे घरेलू सम्बोधन देते हुए कहा कि " गुल्लू, ये दोनों बेटियां ही तुम्हारी सबसे बड़ी पूंजी हैं, अतः इनको पढ़ाने में कोई कमी मत छोड़ना, ये जितना पढ़ना चाहें, पढ़ने देना, उनकी राह में बाधा मत बनना। पिताजी की इस सीख को ज़िंदगी में गांठ बांधकर बस्ती से निकला तो लखनऊ के बाद गोरखपुर से गोण्डा, कानपुर, बुंदेलखंड, काशी से कश्मीर,दिल्ली से दार्जलिंग, सिलीगुड़ी से सिक्किम होते हुए प्रयागराज के बाद आजकल नईदिल्ली में हूं।
बेटियों की पढ़ाई की राह में बनारस के कांग्रेस नेता रत्नाकर त्रिपाठी की मदद से अति-विषम परिस्थितियों में भी केंद्रीय विद्यालय में दाखिला होने से जेब की तंगहाली में जो सहारा मिला उसका भूल जाना किसी पाप से कम नहीं होगा। बाबा से मिले अमूल्य आशीर्वाद और ज्ञान की सीख संग बेटियों की पढ़ाई चलती रही, मेरा देश के कोने कोने में नौकरी के लिए चक्रमण जारी है। बड़ी बेटी पूरब का आक्सफोर्ड कहे जाने वाले इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से बीएससी के बाद IISER त्रिवेंद्रम से कैमेस्ट्री में एमएससी पूरा करके घर लौटी, तो छोटी बेटी बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से बीएससी कम्यूटर साइंस, मैथमेटिक्स, स्टैटिस्टिक्स की पढ़ाई करने के बाद अपनी मां और बहन के साथ अगली मंजिल के मंथन में जुटी रही। बेटियों की पढ़ाई के लिए फीस से लेकर अन्य जरूरतों को पूरी करने में जुटे इस बाप को इस हफ्ते खबर मिली कि जहां छोटी बेटी का #IITRoorkee में एमएससी इकोनॉमिक्स में दाखिला मिल गया है, वहीं बड़ी बेटी का भी #IITBombay में केमिस्ट्री में पीएचडी कोर्स में प्रवेश हो गया है।
बनारस से ज्ञानार्जन संग प्रगति के पथ पर कदम बढ़ा रही बेटियों को ट्रेन में बैठाने न पहुँच पाने का कष्ट तो है, लेकिन खुशी इस बात की है कि पापा के जिस सपने को मैं नहीं पूरा कर सका, उसे बेटियां पूरा कर रहीं हैं और गंगा तट पर दिए अपने दादा के आशीर्वाद से संग अपनी मंजिल तक पहुँच रही हैं। उनके इस कदम में आप सबका आशीर्वाद संग महादेव की कृपा सदैव मिलती रहे, यही विनती है। आप लोगों से बात करते हुए कर्तव्य-पथ पर चलकर इंडिया गेट तक पहुँच गया हूँ। अम्मा-पापा से माफी मांगने के साथ उनसे जिस लोक में भी हो वहीं से अपना आशीर्वाद सदैव पूरे परिवार पर बनाए रखने की प्रार्थना। कर रहा हूँ।
गुरु ब्रह्मा-गुरु विष्णु, गुरु देवो महेश्वरः की प्रार्थना करते हुए बेटियों को पढ़ाई के मार्ग पर ज्ञान देने वाले सभी गुरुजनों को प्रणाम करने के साथ दिल से धन्यवाद संग आशीर्वाद की कामना भी करता हूँ। माँ गंगा संग महादेव की कृपा सदैव बेटियों संग पूरे परिवार और शुभचिंतकों पर बना रहे, यह कामना देश के लिए जान देने वाले जवानों को नमन करते हुए अमर जवान ज्योति को साक्षी मानकर करता हूं। .....जय हिंद जय भारत



It's best ever moments for every perents. as mother of a girl child I know how much difficult to raise a child now a days but Madam Anamika Mishra and you Sir raised your both daughter a fantastic students as well as a wonderful humanbeing. I am really happy and appreciate all your remarkable achievement. I hope my daughter Adishree will certainly follow her both sister. I am really happy for them
ReplyDeleteआप सबका आर्शीवाद व महादेव की कृपा बेटियों पर बनी रहें
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