-बोट्स, AI टूल्स और 'कॉकरोच इज बैक' का डिजिटल जाल:
- बांग्लादेश के कट्टरपंथी संगठन 'जमात-ए-इस्लामी' ने प्रदर्शनकारियों के समर्थन में एक 'सपोर्ट लेटर
अशोक झा/ नई दिल्ली: देश में अराजकता के संगठित कृत्य को आंदोलन कहकर स्वीकार कर लिया जाएगा। भारत के युवाओं को कॉकरोच कहकर अपमानित करने वाली इंटरनेशनल साज़िशों को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है। भारत में 'कॉकरोच शब्द और दिल्ली जंतर-मंतर कनेक्शन' अब नए संदर्भ में अपरिचित नहीं रह गया है। सबसे पहले कुछ जमूरों ने अमेरिकी में बैठकर- भारत के युवाओं को- भारत के सुप्रीम कोर्ट की ख़िलाफ़त में कॉकरोच
कहा। फिर भाजपा और मोदी विरोध की पटकथा लिखी गई। जबकि सुप्रीम कोर्ट के CJI जस्टिस सूर्यकांत ने मई 2026 में ये टिप्पणी फर्जी डिग्री के ज़रिए वकालत करने वाले वकीलों पर की थी। इसका उन्होंने स्पष्टीकरण भी दिया था। लेकिन डीप स्टेट ने आम आदमी पार्टी के जमूरों को आगे कर- भारत की न्यायपालिका के ख़िलाफ़ उकसाया। यहीं से कॉकरोच शब्द को भारत के युवाओं के माथे पर चस्पा करने की योजना को मूर्तरूप दिया गया।संसद मार्च’ के दौरान दिल्ली में जंतर-मंतर, मंदिर मार्ग, कनॉट प्लेस इलाके में हुई हिंसा, तोड़फोड़ और सुरक्षाबलों पर जानलेवा हमला करने की घटनाओं में दिल्ली पुलिस ने अब तक दस एफआईआर दर्ज कर ली हैं।अब खुफिया एजेंसियां इस बात की गहराई से पड़ताल कर रही हैं कि आखिर सोशल मीडिया पर महज एक 'व्यंग्य' के रूप में शुरू हुआ ऑनलाइन पेज कुछ ही दिनों में दिल्ली में भारी लाठीचार्ज और हिंसा की मुख्य वजह कैसे बन गया।
बाहरी तत्व, फर्जी मौत के दावे और पाकिस्तान से संचालित हैंडल्स: पुलिस सूत्रों के अनुसार, दिल्ली में हुए प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिए गए कई लोग छात्र थे ही नहीं, जिससे हिंसा में बाहरी तत्वों की संलिप्तता का शक पुख्ता हो गया है। जांच अधिकारियों ने खुलासा किया है कि सोशल मीडिया पर अफवाहें और भ्रामक जानकारी फैलाने के लिए कुछ ऐसे संदिग्ध हैंडल्स का सहारा लिया गया, जो कथित तौर पर पाकिस्तान से चलाए जा रहे थे। इन पाकिस्तानी हैंडल्स के जरिए झूठा नैरेटिव गढ़ा गया कि हिंसा में 7 प्रदर्शनकारियों की मौत हो चुकी है, 391 लोग घायल हुए हैं और 250 से अधिक लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है।
बोट्स, AI टूल्स और 'कॉकरोच इज बैक' का डिजिटल जाल: इस पूरे मार्च को हवा देने के लिए इंस्टाग्राम और एक्स (X) का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया। सीजेपी के मुख्य इंस्टाग्राम हैंडल ने कुछ ही दिनों में 2 करोड़ से ज्यादा फॉलोअर्स बटोरे, जिसने देश की स्थापित राजनीतिक पार्टियों को भी पीछे छोड़ दिया। विशेषज्ञों का साफ मानना है कि बिना 'पेड बोट्स' या 'विदेशी रीच' के इतनी तेजी से लाखों युवाओं को जोड़ना सामान्य बात नहीं है।
जब केंद्र सरकार के आदेश पर सीजेपी के आधिकारिक एक्स (X) हैंडल को ब्लॉक किया गया, तो महज कुछ ही मिनटों में 'कॉकरोच इज बैक' नाम से एक नई आईडी बना ली गई। सोमवार तक इस आईडी को फॉलो करने वालों की संख्या 3 लाख से ऊपर निकल गई, जबकि इंस्टाग्राम पेज के फॉलोअर्स 2 करोड़ 30 लाख के पार पहुंच गए। जांच में यह भी सामने आया है कि युवाओं को भड़काने के लिए इस आंदोलन के घोषणापत्र, वेबसाइट और पोस्टरों को बनाने में 'चैटजीपीटी' और 'क्लॉड' जैसे आधुनिक एआई टूल्स का संगठित तरीके से इस्तेमाल किया गया था।
बोस्टन यूनिवर्सिटी, बांग्लादेश मॉडल और विदेशी फंडिंग का सच: सुरक्षा एजेंसियां सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके से जुड़े पहलुओं की भी जांच कर रही हैं। अभिजीत दीपके हाल ही में अमेरिका की बोस्टन यूनिवर्सिटी से पढ़ाई पूरी कर भारत लौटे हैं। एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि कहीं इस डिजिटल अभियान को विदेशों से फंडिंग या लॉजिस्टिक सपोर्ट तो नहीं मिला। जांच में बांग्लादेश और नेपाल के छात्र आंदोलनों से जुड़े पैटर्न का भी अध्ययन किया जा रहा है।दिल्ली में चल रहे छात्र आंदोलन के बीच बांग्लादेश से आई एक खबर ने भारतीय खुफिया एजेंसियों को अलर्ट कर दिया है. रिपोर्ट्स का दावा है कि बांग्लादेश के कट्टरपंथी संगठन 'जमात-ए-इस्लामी' ने प्रदर्शनकारियों के समर्थन में एक 'सपोर्ट लेटर' भेजा है। ये वे कट्टरपंथी हैं, जिन्होंने अपने ही देश को तबाही की तरफ धकेल दिया था। हिंदुओं पर अत्याचार और हिंसा में भी इसी से जुड़े लोगों का नाम सामने आया था। इतना ही नहीं, ये पार्टी हमेशा से भारत-विरोधी हरकतों में आगे रही है।ऐसे में सवाल ये उठता है कि आखिर भारत के अंदरूनी मामलों में टांग अड़ाने के पीछे जमात-ए-इस्लामी का असली मकसद क्या है? भारतीय सुरक्षा एजेंसियां और सरकारी तंत्र फिलहाल इस कथित चिट्ठी की सच्चाई पता लगाने में जुटे हैं. हालांकि, अभी तक किसी भी सरकारी विभाग ने इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की है लेकिन सुरक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि भारत के अंदरूनी मामलों और घरेलू विरोध प्रदर्शनों में किसी भी विदेशी या कट्टरपंथी संगठन का दखल देश की सुरक्षा, संप्रभुता और अखंडता के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है।जमात-ए-इस्लामी 'सपोर्ट लेटर' में आखिर लिखा क्या है?
सुरक्षा एजेंसियों और कूटनीतिक गलियारों तक पहुंचे इस कथित लेटर में जमात-ए-इस्लामी ने भारतीय छात्रों और प्रदर्शनकारियों के प्रति 'बिना शर्त' हमदर्दी जताई है.
इस लेटर में लिखा है कि 'बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी की तरफ से हम भारत में चल रहे छात्र आंदोलन का पूरा और बिना किसी शर्त के समर्थन करते हैं. न्याय, शिक्षा, अधिकार और अपने हक की लड़ाई में आपका यह हौसला हमारे दिलों को छू गया है. भारत के इन छात्रों का आंदोलन पूरे उपमहाद्वीप के युवाओं के लिए जुल्म के खिलाफ एक मजबूत मिसाल बन चुका है. प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर किसी भी तरह की हिंसा या दबाव की हम कड़े शब्दों में निंदा करते हैं'.
पत्र के आखिर में धार्मिक और उकसाऊ लहजे में लिखा गया है, 'हम भारत में जारी छात्र आंदोलन के साथ मजबूती से खड़े हैं. अपना शांतिपूर्ण और सैद्धांतिक प्रतिरोध जारी रखें. अल्लाह धैर्यवानों और सच बोलने वालों के साथ है'.राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ये 'विदेशी समर्थन' इतना खतरनाक क्यों?
सुरक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि अगर ये चिट्ठी असली निकली तो इसके नतीजे बेहद गंभीर और खतरनाक हो सकते हैं. भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहां लोगों को अपनी बात रखने और सरकार के किसी भी फैसले के खिलाफ आवाज उठाने का पूरा हक है लेकिन जब देश के अंदरूनी आंदोलनों में सीमा पार के कट्टरपंथी संगठनों की एंट्री होती है, तो पूरा माहौल खराब हो जाता है और विरोध का असल मकसद ही बदल जाता है.
आंदोलन की विश्वसनीयता पर सीधा हमला: विशेषज्ञों का कहना है कि जब कोई विवादित या कट्टरपंथी विदेशी संगठन किसी नागरिक आंदोलन को सार्वजनिक रूप से अपना समर्थन देता है तो उससे स्थानीय प्रदर्शनकारियों की मूल और जायज मांगों से सबका ध्यान भटक जाता है. आलोचकों और सुरक्षा एजेंसियों को ये कहने का ठोस आधार मिल जाता है कि ये आंदोलन शुद्ध रूप से घरेलू नहीं है, बल्कि इसे बाहरी ताकतों द्वारा भड़काया जा रहा है. इससे प्रदर्शनकारियों की साख को भारी नुकसान पहुंचता है.
स्थानीय मुद्दों पर भारी पड़ता कट्टरपंथी एजेंडा: जब किसी विदेशी या धार्मिक-राजनीतिक संगठन की एंट्री होती है, तो छात्रों के असल मुद्दे, जैसे फीस में बढ़ोतरी, नियम-कायदे या उनके अधिकार, कहीं पीछे छूट जाते हैं. उनकी जगह बड़ा कूटनीतिक खेल और उग्र धार्मिक विचारधारा हावी होने लगती है. इसका सीधा नतीजा यह होता है कि एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन का माहौल भी हिंसक और बेकाबू होने की कगार पर पहुंच जाता है.
जमात-ए-इस्लामी का इतिहास और उसका भारत-विरोधी रिकॉर्ड
बांग्लादेश की जमात-ए-इस्लामी कोई साधारण सामाजिक या राजनीतिक संस्था नहीं है. इसका इतिहास कट्टरपंथ, हिंसा और भारत-विरोधी गतिविधियों से भरा पड़ा है.भारत विरोधी एजेंडा और उग्रवाद से संबंध: जमात-ए-इस्लामी पर लंबे समय से भारत विरोधी रुख अपनाने, उग्रवादी और हिंसक तत्वों से सांठगांठ रखने तथा बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदू समुदायों पर हमलों को बढ़ावा देने के गंभीर आरोप लगते रहे हैं. बांग्लादेश की राजनीति में भी इस संगठन का रुख हमेशा से भारत के खिलाफ ही रहा है.
गुस्से का फायदा उठाकर युवाओं का इस्तेमाल: सुरक्षा विशेषज्ञों की चेतावनी है कि इतिहास इस बात का गवाह है कि जब भी किसी देश में सामाजिक असंतोष या नागरिक प्रदर्शन का दौर चलता है, तब-तब ऐसे कट्टरपंथी संगठन उस मौके को भुनाने की ताक में रहते हैं. वो युवाओं के गुस्से को ढाल बनाकर अपने स्थानीय कैडर और नेटवर्क को खड़ा करने की कोशिश करते हैं. इस आड़ में वे निर्दोष युवाओं का ब्रेनवॉश करने और उन्हें कट्टरपंथ की राह पर धकेलने का काम करते हैं.
खुफिया एजेंसियां अलर्ट पर: क्या-क्या खंगाला जा रहा है?
इस खुलासे के बाद दिल्ली समेत देश की तमाम बड़ी सुरक्षा एजेंसियां और खुफिया तंत्र पूरी तरह अलर्ट मोड पर आ गए हैं. भारत की जांच एजेंसियां अब इस पूरे मामले को हर एंगल से खंगालने में जुट गई हैं.
सबसे पहला काम तो ये पता लगाना है कि क्या यह चिट्ठी सचमुच जमात-ए-इस्लामी के बड़े नेताओं ने ही जारी की है, या फिर ये किसी अराजक तत्व की कोई खुराफात या शरारत है.
एजेंसियां इस एंगल की भी गहराई से पड़ताल कर रही हैं कि क्या देश में चल रहे इन प्रदर्शनों को हवा देने के लिए सरहद पार से कोई फंडिंग आ रही है, कूटनीतिक मदद मिल रही है या फिर बाहर से कोई 'टूलकिट' चलाई जा रही है। एजेंसियां ये भी खंगाल रही हैं कि क्या सरहद पार बैठी देश-विरोधी ताकतें इन प्रदर्शनों का फायदा उठाकर भारत का माहौल बिगाड़ने और हमारे भाईचारे में जहर घोलने की साजिश रच रही हैं।
विपक्षी दलों और छात्र संगठनों की भूमिका की भी जांच
जांच के दौरान इस आंदोलन में विपक्षी दलों और विभिन्न छात्र संगठनों की भागीदारी भी एजेंसियों के दायरे में है। नीट पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर 20 जून से जंतर-मंतर पर शुरू हुए प्रदर्शन में कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और समाजवादी पार्टी समेत कई विपक्षी दलों की सहभागिता सामने आई। इसके अलावा स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई), ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा), ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन (एआईएसएफ), बिरसा आंबेडकर फुले स्टूडेंट्स एसोसिएशन (बापसा) और क्रांतिकारी युवा संगठन जैसे छात्र संगठनों की सक्रियता की भी जांच की जा रही है।
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