- भाजपा सरकार के एक फैसले से 110 फ्लोर मिल पर संकट, हजारों लोग हुए बेरोजगार
- इससे जुड़े व्यापारियों का करोड़ो का नुकसान , कौन सुनेगा उनका दर्द
- दार्जिलिंग जिले में तीन फ्लोर मिल पर लटका ताला, कई और बंद होने के कगार पर
- भ्रष्टाचार के दीमक में कितने अधिकारियों पर हुई कार्रवाई
अशोक झा/ सिलीगुड़ी: बंगाल में 15 साल के कुशासन वाली टीएमसी सरकार को लोगो ने उखाड़कर फेक दिया। कारण था भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, ठप पड़े उद्योग और व्यापारियों से हो रहा दोहन। भाजपा सरकार आने से ऐसा लगा कि सोनार बांग्ला का नारा सार्थक होगा। मुख्यमंत्री ने इस दिशा में कदम भी उठाए। लेकिन आज सरकार के एक फैसले से उद्योग, व्यापार को बड़ा धक्का लगा है। बेरोजगारी का आलम यह है कि एक ही दिन में 10 हजार से लोगों को बेरोजगारी का सामना करना पड़ा। जी हाँ आपने सही सुना। इतना ही नहीं अभी इसकी संख्या लाख तक पहुंच सकती है। यह मामला है बंगाल में पीडीएस आटा सप्लाई को बंद करने का।
क्या है पूरा मामला: बंगाल की राजनीति में इन दिनों 'चावल-आटा' सिर्फ पेट भरने का सामान नहीं, बल्कि एक बड़ा सियासी अखाड़ा बनने लगा है।मामला ये है कि बंगाल के नए-नवेले खाद्य और आपूर्ति मंत्री अशोक कीर्तनिया ने कुर्सी संभालते ही एक ऐसा फैसला सुनाया है, जिसने पूरे राज्य में खलबली मचा दी है। उन्होंने आदेश दिया है कि अब सरकारी राशन (PDS) की लिस्ट से 'गेहूं का आटा' (Whole Wheat Flour) गायब हो गया।अब आप सोच रहे होंगे कि भला सरकार आटा क्यों बंद कर रही है? क्या लोगों को अब रोटी नहीं मिलेगी? या फिर इसके पीछे कोई बहुत बड़ा 'खेला' हो गया है?दरअसल, इसके पीछे की कहानी रोटी से ज्यादा 'करप्शन' की बोरी से जुड़ी है। बंगाल के नवनियुक्त खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री अशोक कीर्तनिया ने मंगलवार को राज्य में राशन सामग्री की सूची से गेहूं के आटे (होल व्हीट फ्लोर) को हटाने का आदेश दिया। उन्होंने दावा किया कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) में सबसे ज्यादा घोटाले और भ्रष्टाचार आटे की सप्लाई में हो रहे हैं। इस अचानक फैसले का असर राज्य के जुड़े 110 फ्लोर मालिकों पर पड़ा। सभी फ्लोर मिल मालिकों को कम से कम 25 लाख से 1 करोड़ तक का नुकसान हुआ। दार्जिलिंग जिले में तीन फ्लोर मिल बन हो गए। राज्यभर में 10 हजार से ज्यादा लोगों को बेरोजगारी का सामना करना पड़ा। अभी हजारों और बेरोजगार होंगे ऐसी आशंका जताई जा रही है।
कैसे पड़ा इतना बड़ा असर: मामले को समझे तो संभी फ्लोर मिल मालिकों को राज्य सरकार राशन कार्ड धारकों को देने के लिए गेहूं के बदले आटा की सप्लाई का जिम्मा देती है। इसके लिए उन्हें एफसीआई से गेहूं मुहैया कराया जाता है। उसकी पिसाई पर एक कमीशन दिया जाता है। यही सिस्टम चावल मिल मालिकों के साथ भी है। उन्हें सीधे धान खरीद चावल बनाकर पीडीएस के लिए मुहैया कराना पड़ता है। पीडीएस में अचानक आटा सप्लाई होने से जो फ्लोर मिल 6 से 7 घंटे इसी काम में उपयोग आते थे वह बंद हो गए। बैंक लॉन और कम पूंजी के फ्लोर मिल मालिकों के सामने आर्थिक संकट लाने लगा। इससे जुड़े कारीगरों और मजदूरों को बाहर का रास्ता दिखाया फिर फ्लोर मिल में ताला लगा दिया। फ्लोर मिल मालिकों और बेरोजगारी का दंश झेल रहे लोगों का कहना है कि भ्रष्टाचार तो सबसे ज्यादा धान खरीद के नाम अर होता आया है? क्या उसे भी सरकार बंद कर देगी? भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए योजना को ही बंद नहीं किया जाना चाहिए। उसके लिकेज़ को बंद करने या इससे जुड़े फ्लोर मिल मालिक को इस सिस्टम से वंचित किया जाना चाहिए। उद्योग और रोजगार को प्राथमिकता देनी चाहिए। लोगों का कहना है कि लगातार हो रहे प्रश्नपत्र लीक मामले में क्या सरकार स्कूल कॉलेज पर ताला लगा देगी या उसमें सुधार का मार्ग प्रशस्त कर रही है।
खाद्य मंत्री और बंगाल के मुख्यमंत्री को करना होगा गंभीरता से विचार : राज्य के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली नई व्यवस्था में भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की बात कही जा रही है। खाद्य आपूर्ति मंत्री अशोक कीर्तनिया का ये फैसला उसी दिशा में एक बड़ी 'सर्जिकल स्ट्राइक' माना जा रहा है। लेकिन सवाल ये है कि क्या सिर्फ आटा बंद कर देने से भ्रष्टाचार रुक जाएगा या फिर ये गरीबों की थाली पर सीधा हमला है? घोटाले की 'जड़' पर प्रहार या प्रशासनिक मजबूरी?: बंगाल में राशन घोटाला कोई नई बात नहीं है। पिछले कुछ सालों में ईडी (ED) और सीबीआई (CBI) ने इस विभाग में इतने चक्कर काटे हैं कि आम जनता भी समझ गई थी कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है। पूर्व खाद्य मंत्री ज्योतिप्रिय मल्लिक का जेल में होना इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि सिस्टम के अंदर कितनी गहरी दीमक लगी थी। सवाल यह भी उठ रहा कि इस सिस्टम को खराब करने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई। इस सिस्टम के दीमक भ्रष्ट अधिकारी और कारोबारी को खत्म करने के बजाय सिस्टम को ही खत्म कर क्यों उद्योग और उससे जुड़े लोगों के साथ क्या अन्याय नहीं है।
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