- विश्व संवाद केंद्र उत्तरबंग के " देवर्षि नारद जयंती" का प्रति वर्ष कर रहा आयोजन
- पत्रकारों को सम्मान देने का है यह बड़ा मंच, सभी भाषाओं के पत्रकार होते है इसमें शामिल
अशोक झा/ सिलीगुड़ी: दुनिया के पहले पत्रकार देवर्षि नारद ने लोगों की समस्याओं को भगवान विष्णु तक पहुंचाया।देवर्षि नारद को दुनिया का पहला पत्रकार माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि वे पृथ्वी लोक के लोगों के कष्टों की जानकारी भगवान विष्णु तक पहुंचाते थे और विष्णु भगवान उन कष्टों का निवारण करते थे। देश में हर वर्ष नारद जयंती मनाई जाती है। विश्व संवाद केंद्र उत्तरबंग की ओर से हर वर्ष पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले पत्रकारों को सम्मानित किया जाता है।। सिलीगुड़ी में "‘ विश्व संवाद केंद्र उत्तरबंग" द्वारा हर साल देव ऋषि नारद पत्रकार सम्मान समारोह का आयोजन किया जाता है। चूंकि इस वर्ष बंगाल में चुनाव होने के कारण "देवर्षि नारद जयंती"और "देवर्षि नारद सार्थक जीवन सम्मान 2026" रविवार, 31 मई 2026 को आयोजित दिया जाएगा। कार्यक्रम में बतौर मुख्यमंत्री श्री आर.एन. रवि पश्चिम बंगाल राज्यपाल उपस्थित रहेंगे। यह कार्यक्रम दीनबंधु मंच में होगा। वर्ष 2010 में शुरू हुई इस पहल के तहत अब तक कई प्रतिष्ठित पत्रकारों को सम्मानित किया जा चुका है। यह कार्यक्रम पत्रकारों द्वारा पत्रकारों के लिए आयोजित एक महत्वपूर्ण मंच है, जिसमें बड़ी संख्या में पत्रकार, लेखक और स्तंभकार भाग लेते हैं। मनाई जाने वाली नारद जयंती पर आइए जानते हैं देवर्षि से जुड़ी वे बातें, जो शायद ही आपने पहले कभी सुनी हों।
ब्रह्मा के 'मन' से जन्म और 'देवर्षि' का रुतबा
नारद कोई साधारण ऋषि नहीं, बल्कि ब्रह्मा जी के 'मानस पुत्र' हैं। उन्हें 'देवर्षि' की उपाधि प्राप्त है-एक ऐसा पद जो केवल उन्हें मिलता है जिनमें दिव्य ज्ञान और कठोर तप का संगम हो। वे केवल संदेशवाहक नहीं, बल्कि नारद भक्ति सूत्र जैसे महान ग्रंथ के रचयिता भी हैं।
क्यों नहीं रुक पाते एक जगह? (शाप या वरदान?)
नारद मुनि हमेशा घूमते क्यों रहते हैं? इसके पीछे एक रोचक कहानी है। राजा प्रजापति दक्ष ने नारद जी को शाप दिया था कि वे दो मिनट से ज्यादा एक जगह नहीं ठहर पाएंगे। लेकिन नारद जी ने इस शाप को लोक-कल्याण का माध्यम बना लिया और तीनों लोकों में सूचनाओं का आदान-प्रदान करने लगे।
जब नारद को बनना पड़ा 'स्त्री': हैरान रह गए? पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान विष्णु की माया समझने के प्रयास में नारद जी ने एक सरोवर में स्नान किया और स्त्री रूप धारण कर लिया। वे 12 वर्षों तक राजा तालजंघ की रानी बनकर रहे। बाद में श्री हरि की कृपा से पुनः उसी सरोवर में स्नान कर वे अपने असली स्वरूप में लौटे।
बंदर जैसा चेहरा और भगवान विष्णु को शाप!
यह किस्सा सबसे मशहूर है। नारद जी माता लक्ष्मी से विवाह करना चाहते थे। उन्होंने भगवान विष्णु से 'हरि' जैसा रूप मांगा। 'हरि' का एक अर्थ विष्णु होता है और दूसरा बंदर। भगवान ने उन्हें बंदर का चेहरा दे दिया। स्वयंवर में मजाक बनने के बाद क्रोधित नारद ने विष्णु जी को शाप दिया कि उन्हें भी पृथ्वी पर 'स्त्री वियोग' सहना होगा (यही कारण था कि राम अवतार में उन्हें माता सीता से अलग होना पड़ा)।गंधर्व से 'दासी पुत्र' और फिर 'देवर्षि' तक का सफर: नारद जी का सफर संघर्षों भरा रहा। पहले कल्प में वे उपबर्हण नाम के गंधर्व थे। ब्रह्मा जी के शाप से वे एक दासी के पुत्र के रूप में जन्मे। मात्र 5 वर्ष की आयु में संतों की सेवा कर उन्हें वह ज्ञान मिला, जिसने उन्हें अंततः ब्रह्मा जी के मानस पुत्र और 'देवर्षि' के रूप में पुनर्जन्म दिलाया। नारद मुनि से जुड़ी कुछ 'क्विक' बातें:
नारद संहिता: ज्योतिष का एक अद्भुत ग्रंथ। लीला पात्र: वे 'चुगली' नहीं करते, बल्कि भगवान की लीला को पूरा करने के लिए परिस्थितियों का निर्माण करते हैं।।त्रिलोक संचारक: उनके पास स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल में बेरोक-टोक घूमने का 'वीजा' है।
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