बंगाल क्या बढ़ रहा राष्ट्रपति शासन की ओर, बंगाल में "खेला होवे या झमेला होवे"
फ़रवरी 27, 2026
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- सुप्रीम कोर्ट की सख्ती और पहली मार्च से अर्धसैनिक बलों की तैनाती कर रही इशारा
- 7 मई 2026 को पश्चिम बंगाल विधानसभा का कार्यकाल हो जाएगा समाप्त
- हर हाल में अप्रैल माह में कराना होगा विधानसभा चुनाव, नहीं तो फिर राष्ट्रपति शासन
पश्चिम बंगाल की सियासत में इन दिनों हलचल अपने चरम पर है। 'खेला होबे' के नारों से आगे बढ़ चुकी राजनीति अब संवैधानिक गणित और समय सीमा के जाल में उलझती नजर आ रही है। इसको लेकर ऐसा दावा किया जा रहा कि यदि वक़्त पर SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिविजन) की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई, तो 7 मई 2026 के बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लग सकता है और यह कदम केंद्र की तरफ से नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रावधानों के अंतर्गत "ऑटोमैटिक" होगा। आयोग के निर्णय के अनुसार, केंद्रीय बलों की पहली खेप आगामी शुक्रवार से चरणबद्ध तरीके से बंगाल पहुंचना शुरू कर देगी। उत्तर 24 परगना के तीन पुलिस जिलों और दो पुलिस कमिश्नरेट को मिलाकर सुरक्षा के विशेष इंतजाम किए गए हैं। कोलकाता पुलिस कमिश्नरेट क्षेत्र में भी रविवार से ही बलों की सक्रियता बढ़ जाएगी। 28 फरवरी को अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन के ठीक अगले दिन यानी 1 मार्च से जवान मोर्चा संभाल लेंगे। आयोग ने जिलों की संवेदनशीलता के आधार पर बलों का बंटवारा किया है। मुर्शिदाबाद के दो पुलिस जिलों में 16 कंपनियां मोर्चा संभालेंगी, जबकि हावड़ा (कमिश्नरेट व जिला पुलिस) और दक्षिण 24 परगना में 15-15 कंपनियां तैनात की जा रही हैं। पूर्व मेदिनीपुर में 14, मालदा और नदिया में 12-12 तथा उत्तर दिनाजपुर में 11 कंपनियों की तैनाती तय की गई है। पहाड़ी क्षेत्रों की बात करें तो दार्जिलिंग और सिलीगुड़ी को मिलाकर 9 कंपनियां दी गई हैं, जबकि कूचबिहार में भी 9 और पूर्व बर्धमान में 8 कंपनियां तैनात होंगी। अन्य जिलों जैसे पश्चिम बर्धमान, पश्चिम मेदिनीपुर, जलपाईगुड़ी, बांकुरा और बीरभूम में 7-7 कंपनियां सुरक्षा का जिम्मा संभालेंगी। इस बार की तैनाती में विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों का समन्वय देखने को मिलेगा। कुल 240 कंपनियों में सबसे बड़ी हिस्सेदारी सीआरपीएफ(110 कंपनियां) की है। इसके अलावा 55 कंपनियां बीएसएफ , 21 सीआईएसएफ, 27 आईटीबीपी और 27 कंपनियां एसएसबी की शामिल होंगी। गृह मंत्रालय ने सख्त निर्देश जारी किए हैं कि प्रत्येक कंपनी में जवानों की संख्या 72 से कम नहीं होनी चाहिए। निर्वाचन आयोग की रणनीति केवल इन 240 कंपनियों तक सीमित नहीं है।
प्रारंभिक चरण के बाद 10 मार्च तक राज्य में अतिरिक्त 240 कंपनियां और भेजी जाएंगी, जिससे कुल संख्या 480 कंपनियों तक पहुंच जाएगी। गौरतलब है कि पिछले विधानसभा चुनावों के दौरान आयोग ने आठ चरणों में लगभग 1100 कंपनियां तैनात की थीं। इस बार भी आयोग का मुख्य उद्देश्य राज्य में शांतिपूर्ण, निष्पक्ष और पूरी तरह से भयमुक्त चुनावी माहौल सुनिश्चित करना है, ताकि मतदाता बिना किसी दबाव के अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकें।
7 मई महत्वपूर्ण क्यों?: जानकारी के मुताबिक, 7 मई 2026 को पश्चिम बंगाल विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो जाएगा। संविधान के अंतर्गत अगर उस तारीख तक नई सरकार का गठन नहीं हो पाता, तो मौजूदा सरकार स्वतः समाप्त मानी जाएगी और राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो सकता है। उनका तर्क है कि चुनाव कराने के लिए कम से कम 40 दिन की प्रक्रिया चाहिए जिसमें अधिसूचना, नामांकन, मतदान के कई चरण और मतगणना शामिल हैं।यदि मार्च की शुरुआत तक चुनाव आयोग कार्यक्रम घोषित नहीं करता, तो मई से पहले नई सरकार बनना भाड़ मुश्किल हो सकता है। ऐसे में मामला सीधे संवैधानिक संकट की तरफ बढ़ सकता है। कोर्ट की लड़ाई बनी उलझन? इसे लेकर यह पहले ही साफ़ हो चुका है कि बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने SIR प्रक्रिया को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाकर रणनीतिक भूल कर दी है। उनका कहना है कि जब मामला अदालत में उलझता है तो वक़्त निकल जाता है और यही समयसीमा सरकार के खिलाफ जा सकती है। और ऐसे में यदि चुनावी प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तो इसका ठीकरा सीधे केंद्र पर नहीं फोड़ा जायेगा, क्योंकि देरी संवैधानिक प्रक्रिया और न्यायिक सुनवाई के कारण होगी।
"मोदी-शाह इंतजार की रणनीति पर" राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह इस पूरे घटनाक्रम में आक्रामक कदम उठाने के बजाय "वेट एंड वॉच" की नीति पर हैं। उनके अनुसार, केंद्र को राष्ट्रपति शासन थोपने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, क्योंकि यदि समयसीमा पार हुई तो संवैधानिक रूप से वही स्थिति बन जाएगी। आपको बता दे, यदि राज्य का टेन्योर खत्म हो गया तो सरकार अपने आप चली जाएगी।
फ्रीबी बनाम प्रक्रिया: राज्य सरकार की लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाओं को लेकर भी बहस तेज है। विपक्ष का कहना है कि आखिरी वक़्त में योजनाओं की घोषणा चुनावी रणनीति का भाग है। हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि योजनाओं का बड़ा ल;लाभ तभी होगा जब चुनाव वाट पर हों। और यदि चुनाव अक्टूबर-नवंबर महीने तक खिसक गए, तो मौजूदा सरकार की प्रशासनिक पकड़ कमजोर हो सकती है और विपक्ष को फायदा मिल सकता है।बंगाल में 7 चरणों का गणित: पश्चिम बंगाल में आमतौर पर 7-8 चरणों में वोटिंग प्रक्रिया कराइ जाती है। हर चरण के बीच कई दिन का अंतर होता है। ऐसे में पूरी प्रक्रिया में लगभग 35 से 40 दिन लग जाते हैं। इसके बाद मतगणना और शपथ ग्रहण की प्रक्रिया भी जुड़ती है। यदि, मार्च के पहले हफ्ते तक चुनाव कार्यक्रम घोषित नहीं होता, तो मई से पहले नई सरकार बनना व्यावहारिक रूप से बेहद मुश्किल हो जायेगा।
क्या दीदी फंस गईं अपने ही जाल में? देखा जाए तो... ममता बनर्जी ने राजनीतिक लड़ाई को न्यायिक लड़ाई में बदलकर बड़ा खतरा अपनी अपने सिर ले लिया है। हालांकि, तृणमूल कांग्रेस का दावा है कि चुनाव आयोग और अदालतों की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही चुनाव होंगे और पार्टी पूरी तैयारी में है। पार्टी नेताओं का कहना है कि राज्य सरकार ने जनकल्याण योजनाओं के माध्यम से मजबूत जनाधार बनाया है।
तो अब... आगे क्या?: अब सब की निगाहें चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट की आगामी कार्यवाही पर टिकी हैं। यदि SIR प्रक्रिया जल्द पूरी होती है और मार्च में चुनाव कार्यक्रम घोषित होता है, तो मई से पहले नई सरकार का गठन संभव है। लेकिन यदि देरी जारी रही, तो 7 मई की तारीख बंगाल की राजनीति में बड़ा मोड़ ला सकती है। फिलहाल, इतना तो तय है कि पश्चिम बंगाल की सियासत में आगामी दो महीने बेहद निर्णायक साबित होंगे और साथ ही साथ यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या "खेला" चुनावी मैदान में होगा या संवैधानिक प्रावधानों के अंतर्गत सत्ता की बाजी पलट जाएगी। (बंगाल से अशोक झा की रिपोर्ट)
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