- ध्रुवीकरण के कारण 1969 के बाद कोई हिंदू उम्मीदवार नहीं बन सका यहां से विधायक या सांसद
- अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय सीमा पर बसे होने के कारण केंद्रीय गृहमंत्री कर रहे निगेहबानी
- सीमांत में अब गूंजेगा सेना और अर्धसैनिक बलों के बूटों की आवाज
- सभी राजनीतिक पार्टियों का बन गया हूं प्रयोगशाला, अन्तर्राष्ट्रीय तस्करों का ट्रांजिट रूट
मैं किशनगंज में हूं। क्योंकि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह राजनीतिक और प्रशासनिक शह और मात का विषाद बिछाने में लगे है। यहां की बदलती स्थिति को लेकरकेंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पहुंचे हुए है। वो बिहार के संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों का दौरा करेंगे। सीमा पर घुसपैठ और कथित अवैध धार्मिक ढांचों के कारण राज्य के सीमांचल क्षेत्र में हो रहे जनसांख्यिकीय परिवर्तनों पर समीक्षा बैठक की अध्यक्षता भी की। किशनगंज बिहार का एक मात्र जिला है जहां हिंदू अल्पसंख्यक हैं। यहां लगभग 70 फीसदी आबादी मुस्लिम समुदाय की है। डेमोग्राफी का यह असंतुलन शोध का विषय है। मुस्लिम मतों के ध्रुवीकरण के कारण 1969 के बाद कोई हिंदू उम्मीदवार यहां से विधायक या सांसद नहीं बना। पहले डेमोग्राफी का ऐसा असंतुलन नहीं था। किशनगंज के पहले विधायक रावतमल अग्रवाल थे। 1952 के चुनाव में कांग्रेस के रावतमल अग्रवाल ने निर्दलीय अब्दुल हयात को हराया था। फिर इसके बाद 1967 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी की सुशीला कपूर ने निर्दलीय के. रहमान को 11 हजार से अधिक वोटों से हराया था। सुशीला कपूर को 16 हजार 207 मत मिले थे जब कि के. रहमान को 4594 वोट। मतों का यह अंतर बताता है कि उस समय डेमोग्राफी किशनगंज में कोई मुद्दा नहीं थी। वोटिंग पैटर्न भी सामान्य था। हिंदू-मुस्लिम से अधिक यह बात महत्वपूर्ण थी किस नेता का जनाधार अधिक है। 1969 से हालात बदलने लगे: लेकिन 1969 से हालात बदलने लगे। सुशीला कपूर के बाद किशनगंज से किसी भी दल को कोई हिंदू उम्मीदवार विधायक नहीं बना। 1969 के मध्यावधि चुनाव में सुशीला कपूर फिर प्रसोपा की उम्मीदवार बनीं। इस बार उनका मुकाबला कांग्रेस के रफीक आलम से हुआ। उस समय पूरे बिहार में कांग्रेस के खिलाफ माहौल था क्योंकि उसने समाजवादी धारा के दलों से मिलकर बनी तीन संविद सरकारों को गिराया था। इसके बाद भी किशनगंज में कांग्रेस के पक्ष में बंपर वोटिंग हुई। कांग्रेस उम्मीदवार रफीक आलम को 17 हजार 999 वोट मिले जब कि सुशीला कपूर को 8 हजार 322 वोट ही मिले। सिर्फ दो साल में हालात बिल्कुल बदल गये। 1969 में सुशीला कपूर के प्रतिस्पर्धी को पिछले चुनाव की अपेक्षा तीन गुना से भी अधिक वोट मिले।
1967 में लखन लाल कपूर बने थे सांसद:
1967 में ही किशनगंज का लोकसभा चुनाव परिणाम भी डेमोग्राफी संतुलन का एक प्रमाण है। इस चुनाव में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के लखनलाल कपूर ने कांग्रेस के मोहम्मद ताहिर को करीब 34 हजार मतों से हराया था। किशनगंज की अंतिम हिंदू विधायक सुशील कपूर, लखन लाल कपूर की पत्नी थीं। यह बिहार के लिए अनोखी घटना थी कि किशनगंज विधानसभा सीट से पत्नी विधायक तो किशनगंज लोकसभा सीट से पति सांसद। दोनों ही बड़े मतों के अंतर से जीते। लखन लाल कपूर भी किशनगंज के अंतिम हिंदू लोकसभा सदस्य हैं। उनके बाद कोई हिंदू यहां से सांसद नहीं चुना गया। यहां तक कि लोकसभा चुनाव में भाजपा को भी इस सीट पर जीत के लिए मुस्लिम उम्मीदवार (शाहनवाज हुसैन) को ही उतारना पड़ा। वे भी एक बार ही जीते।लखन लाल कपूर अति पिछड़ा समाज के पहले सांसद : लखन लाल कपूर अति पिछड़ा समाज से आने वाले बिहार के पहले सांसद थे। उनका जन्म मुंगेर में हुआ था लेकिन वे 1942 के आसपास ही किशनगंज आ गये थे। उन्होंने किशनगंज को ही अपनी कर्मभूमि बनायी। आजादी के लड़ाई के दौरान वे क्रांतिकारी दस्ते के सदस्य थे। एक क्रांतिकारी के रूप में वे किशनगंज, पूर्णिया और पश्चिम बंगाल की सीमा तक सक्रिय थे। वे नेपाल के आंदोलन में शामिल रहे। इसलिए उनका किशनगंज जिले में बहुत प्रभाव था। आजादी के बाद वे समाजवादी पार्टी से जुड़ गये। समाजवादी पार्टी में विभाजन हुआ तो वे प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (प्रसोपा) के सदस्य बन गये। 1957 में किशनगंज जिले के बहादुरगंज से विधायक: 1957 के दूसरे विधानसभा चुनाव में लखन लालू कपूर किशनगंज जिले की बहादुरगंज सीट से पहली बार विधायक चुने गये। उन्होंने प्रसोपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और कांग्रेस के मोहम्मद अहसान को करीब ढाई हजार वोटों से हराया। लखन लाल कपूर को 11 हजार 873 और मो. अहसान को 9 हजार 277 वोट मिले थे। लखन लाल कपूर का किशनगंज से बहुत लगाव था। वे 1977 का लोकसभा चुनाव भी किशनगंज से ही लड़ना चाहते थे। लेकिन 1977 में जब जनता पार्टी का गठन हुआ तो उसमें जगजीवन राम की पार्टी कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी भी शामिल हुई।
1977 में पूर्णिया से सांसद: ।उस समय किशनगंज के रहने वाले हलीमुद्दीन अहमद जगजीवन राम के निकट सहोयोगी थे। कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी के गठन में उनका भी योगदान था। हलीमुद्दीन भी किशनगंज से लोकसभा चुनाव लड़ना चाहते थे। तब जगजीवन राम ने जयप्रकाश नारायण से किशनगंज सीट अपनी पार्टी के लिए मांग ली। इसके बाद जयप्रकाश नारायण ने लखन लालू कपूर को पूर्णिया से चुनाव लड़ने के लिए कहा। जेपी की बात भला कौन टालता। लखन लाल कपूर 1977 में पूर्णिया से सांसद चुने गये। हलीमुद्दीन अहमद किशनगंज से सांसद बने। ( किशनगंज से अशोक झा की रिपोर्ट )
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