- कौआ, कुत्ता, गाय बैल के साथ भाई के माथे पर लगाये जाते है टीका
अशोक झा/ सिलीगुड़ी: तिहार, जिसे गोरखा समुदाय अक्सर दीपावली के नाम से जानते हैं, पांच दिन का एक रंगीन त्योहार है जो मुख्य रूप से नेपाल, सिक्किम और पश्चिम बंगाल के उत्तरी हिस्से में मनाया जाता है। यह त्योहार गोरखाओं के लिए बहुत सांस्कृतिक महत्व रखता है और इसकी खास रस्में इसे भारत के दूसरे हिस्सों में मनाई जाने वाली दिवाली से अलग बनाती हैं। जानवरों की पूजा से लेकर भाई-बहनों के बीच के रिश्ते को मनाने तक, तिहार गोरखाओं की समृद्ध परंपराओं को दिखाता है और दीपावली के बड़े त्योहार से कई समानताएं भी रखता है।।आइए तिहार की परंपराओं, रस्मों और महत्व के बारे में और गहराई से जानें, यह जानने के लिए कि यह त्योहार आम तौर पर मनाई जाने वाली दिवाली से कैसे अलग है और गोरखाओं के लिए इसका क्या मतलब है।तिहार का महत्व: गोरखाओं के लिए तिहार सिर्फ रोशनी का त्योहार नहीं है। यह एक ऐसा उत्सव है जो इंसानों, जानवरों और भगवान के बीच के रिश्ते को दिखाता है। यह त्योहार गोरखा समुदाय के प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव को दिखाता है, क्योंकि अलग-अलग दिन जानवरों, जैसे कौवे, कुत्ते, गाय और बैलों के सम्मान के लिए होते हैं।गोरखा मानते हैं कि इन जानवरों की उनकी ज़िंदगी में एक खास जगह है और ये उनकी आध्यात्मिक यात्रा में संदेशवाहक या मददगार का काम करते हैं। जानवरों के प्रति यही श्रद्धा तिहार को भारत के दूसरे हिस्सों में मनाई जाने वाली दिवाली से अलग बनाती है।
तिहार के पांच दिन: तिहार के हर दिन का एक खास महत्व होता है, जिससे जुड़े खास रीति-रिवाज और रस्में होती हैं।पहला दिन: काग तिहार (कौओं की पूजा): तिहार का पहला दिन कौओं की पूजा के लिए होता है, जिन्हें नेपाली में काग कहते हैं। गोरखा लोककथाओं में कौओं को मौत का संदेशवाहक माना जाता है। इस दिन, लोग अपने घरों के बाहर कौओं के लिए खाना रखते हैं। कौओं को खाना खिलाने से, ऐसा माना जाता है कि वे परिवार के लिए बुरी खबर या दुर्भाग्य नहीं लाएंगे। कौओं को खाना खिलाने का काम प्रकृति के प्रति सम्मान और इस विश्वास का भी प्रतीक है कि सभी जीव, चाहे वे बड़े हों या छोटे, जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।दूसरे दिन, कुत्तों या कुकुर की पूजा की जाती है। कुत्तों को इंसानों का रक्षक और वफादार साथी माना जाता है। हिंदू पौराणिक कथाओं में, कुत्तों को भगवान शिव के अवतार, भगवान भैरव से जोड़ा जाता है, और यह भी माना जाता है कि वे परलोक के दरवाज़ों की रखवाली करते हैं।इस दिन, गोरखा अपने कुत्तों को फूलों की माला पहनाते हैं, उनके माथे पर टीका लगाते हैं, और उन्हें स्वादिष्ट खाना खिलाते हैं। गली के कुत्तों को भी खाना खिलाया जाता है और उनके साथ सम्मान से पेश आया जाता है। यह दिन कुत्तों के प्यार और वफादारी की याद दिलाता है और यह भी कि इंसानी ज़िंदगी में उनकी कितनी अहमियत है।दिन 3: गाय तिहार और लक्ष्मी पूजा (गायों की पूजा): तीसरा दिन शायद तिहार का सबसे अहम दिन होता है, क्योंकि यह गायों की पूजा, जिसे गाय तिहार के नाम से जाना जाता है, और धन की देवी, लक्ष्मी पूजा के लिए होता है। गाय हिंदू संस्कृति में माँ और खुशहाली के प्रतीक के तौर पर एक खास जगह रखती है। सुबह-सुबह गायों की पूजा की जाती है, उन्हें माला पहनाई जाती है, और खाने के लिए सबसे अच्छी घास दी जाती है। गाय को दूध, गोबर और इंसानी ज़िंदगी के लिए दूसरी चीज़ें देने के लिए धन्यवाद दिया जाता है।शाम को, घरों में तेल के दीये जलाए जाते हैं और देवी लक्ष्मी के स्वागत के लिए रंगोली सजाई जाती है, माना जाता है कि देवी लक्ष्मी धन और खुशहाली लाती हैं। औरतें बड़ी श्रद्धा से लक्ष्मी पूजा करती हैं, और अपने परिवार के लिए पैसे की भलाई और सफलता की प्रार्थना करती हैं।दिन 4: गोरू तिहार और गोवर्धन पूजा (बैल की पूजा)
तिहार के चौथे दिन दो खास रस्में होती हैं: गोरू तिहार, जिसमें बैलों की पूजा होती है, और गोवर्धन पूजा, जिसमें भगवान कृष्ण वृंदावन के लोगों को तूफ़ान से बचाते हैं। पश्चिम बंगाल के उत्तरी हिस्से जैसे खेती वाले समाजों में बैल बहुत ज़रूरी हैं, जहाँ खेती का बड़ा रोल होता है। इस दिन, खेतों में उनकी कड़ी मेहनत के लिए शुक्रिया के तौर पर बैलों को खाना खिलाया जाता है और सजाया जाता है। दूसरी तरफ, गोवर्धन पूजा में गाय के गोबर से एक छोटा सा टीला बनाया जाता है, जो गोवर्धन पर्वत को दिखाता है, जिसे भगवान कृष्ण ने गांव वालों को बारिश और बाढ़ से बचाने के लिए उठाया था। इस दिन की पूजा धरती और प्रकृति की देन से जुड़ाव दिखाती है।दिन 5: भाई टीका (भाई-बहन के रिश्ते का जश्न): तिहाड़ का पांचवां और आखिरी दिन भाई टीका होता है, जो भाई-बहन के रिश्ते का जश्न है। यह भाई-बहन के प्यार का दिन है, जहां बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र और खुशहाली के लिए प्रार्थना करती हैं, और भाई अपनी बहनों की रक्षा करने की कसम खाते हैं।बहनें अपने भाइयों के माथे पर एक खास रंग-बिरंगा टीका लगाती हैं, जबकि भाई बदले में तोहफे देते हैं। यह रस्म भाई-बहनों के बीच प्यार और सुरक्षा के रिश्ते को मजबूत करती है। जब परिवार जश्न के लिए एक साथ आते हैं तो माहौल हंसी, प्यार और दावत से भर जाता है।तिहाड़ की परंपराएं और तैयारियां: दिवाली की तरह, तिहार भी रोशनी का त्योहार है, और इसकी तैयारियां काफी पहले से शुरू हो जाती हैं। घरों को साफ़ करके फूलों, तेल के दीयों और मोमबत्तियों से सजाया जाता है। यह त्योहार रंगोली के बिना अधूरा है, जो घरों के एंट्रेंस को सजाने के लिए रंगीन पाउडर, फूलों और चावल का इस्तेमाल करके बनाई जाती है। माना जाता है कि ये सजावट पॉज़िटिव एनर्जी लाती है और घर में देवी लक्ष्मी का स्वागत करती है। कई गोरखा घरों में, तिहार के दौरान देउसी-भैलो एक पॉपुलर परंपरा है। देउसी एक तरह का पारंपरिक गाना है जो लोगों के ग्रुप घरों में जाकर खुशहाली और खुशहाली के लिए दुआएं गाते हैं। बदले में, उन्हें शुक्रिया के तौर पर तोहफ़े या पैसे दिए जाते हैं। इससे त्योहार में एक साथ और खुशी का माहौल बन जाता है, क्योंकि लोग देर रात तक गाते और नाचते हैं।तिहार में खाने का एक अहम रोल होता है, परिवार कई तरह की डिशेज़ बनाते हैं जैसे सेल रोटी (चावल के आटे की एक पारंपरिक रोटी), मांडू (पकौड़ी), और दूसरी मिठाइयाँ। ये चीज़ें पड़ोसियों और रिश्तेदारों के साथ शेयर की जाती हैं, जिससे त्योहार की खुशी और बढ़ जाती है।सिलीगुड़ी नवग्रह मंदिर के पंडित ध्रुव उपाध्याय बताते है कि
तिहार नेपाल और भारत के कुछ हिस्सों (जैसे सिक्किम, दार्जिलिंग और असम) में रहने वाले नेपाली और गोरखा समुदायों द्वारा मनाया जाने वाला एक प्रमुख पाँच दिवसीय हिंदू त्योहार है। इसे यमपंचक या प्रकाश पर्व (दिवाली) के रूप में भी जाना जाता है। प्रकाश और सजावट: तिहार के दौरान घरों, दुकानों और गलियों को तेल के दीयों, मोमबत्तियों और रंगोली से सजाया जाता है। पाँच दिन और उनकी महत्ता:काग तिहार (पहला दिन): इस दिन कौवों को भोजन कराया जाता है और उनकी पूजा की जाती है। कुकुर तिहार (दूसरा दिन): कुत्तों की वफादारी और उनके रक्षात्मक स्वभाव का सम्मान करते हुए उनकी पूजा की जाती है और उन्हें माला पहनाई जाती है।गाई तिहार और लक्ष्मी पूजा (तीसरा दिन): इस दिन गाय की पूजा होती है और शाम को धन की देवी माता लक्ष्मी की आराधना की जाती है। गोरू तिहार / गोवर्धन पूजा (चौथा दिन): इस दिन बैलों और गोवर्धन पर्वत की पूजा की जाती है। भाइयों टीका (पाँचवा दिन): यह अंतिम दिन होता है, जिसमें बहनें अपने भाइयों के लंबे जीवन, सुख और समृद्धि के लिए उनके माथे पर टीका लगाती हैं और उपहारों का आदान-प्रदान करती हैं।
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