- क्यों बंगाल की संस्कृति में यह रात इतनी खास मानी जाती है
- आइए जाने क्या वाकई भूतों से जुड़ा है इस दिन का रिश्ता?
अशोक झा/ कोलकाता: जब भी देश में दीपावली की बात होती है, तो आँखों के सामने जगमगाते दीये, आसमान में छूटते पटाखे और घरों में महकती मिठाइयों की खुशबू तैरने लगती है। लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि हर राज्य और संस्कृति इस त्योहार को अपने ही अंदाज में कितना अलग और खास बना देती है?आज हम आपको ले चलते हैं पश्चिम बंगाल की गलियों में, जहाँ दिवाली की मुख्य रात से ठीक एक रात पहले एक ऐसा अनूठा और रोमांचक पर्व मनाया जाता है, जिसके बारे में जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं 'भूत चतुर्दशी' की, जिसे लेकर बंगाल के हर घर में एक अलग ही सुगबुगाहट और उत्साह देखने को मिलता है. आइए जानते हैं कि आखिर इस नाम के पीछे का रहस्य क्या है और क्यों बंगाल की संस्कृति में यह रात इतनी खास मानी जाती है।इसे यम दीपदान कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि यमराज के लिए दीपक जलाने से परिवार पर उनकी कृपा बनी रहती है और अकाल मृत्यु का भय दूर होता है।
हालांकि, कई लोगों को यह जानकारी नहीं होती कि यम का दीपक किस दिन जलाना चाहिए, इसे किस दिशा में रखना चाहिए और दीपदान करने का सही तरीका क्या है। कुछ लोग धनतेरस पर तो कुछ नरक चतुर्दशी यानी छोटी दिवाली के दिन यह परंपरा निभाते हैं। आइए जानते हैं यम दीपदान की विधि, शुभ समय और सही स्थान के बारे में।
किस दिशा में जलाएं यम का दीपक?: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दक्षिण दिशा को यमराज की दिशा माना जाता है। इसलिए धनतेरस के दिन घर के मुख्य द्वार की दक्षिण दिशा में यम का दीपक जलाने की परंपरा है। इसे चार मुख वाला दीपक कहा जाता है। नाम सुनते ही दिमाग में डरावनी कहानियाँ घूमने लगती हैं। आपको बता दें कि 'भूत चतुर्दशी' का नाता किसी डर या खौफ से बिल्कुल नहीं है।।कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को पड़ने वाले इस पर्व को लेकर मान्यता है कि इस खास रात को हमारे पूर्वज, यानी हमारे पुरखे और वे आत्माएं, जिन्हें हम बहुत चाहते हैं, इस दुनिया में अपने परिजनों से मिलने के लिए आती हैं। यही वजह है कि इसे पूर्वजों की याद का दिन कहा जाता है। बंगाली समाज में इसे बेहद श्रद्धा और अपनेपन के साथ मनाया जाता है, जहाँ डर की कोई जगह नहीं, बल्कि अपनों के प्रति सम्मान और प्यार झलकता है।
चौदह दीयों की रोशनी
इस त्योहार की सबसे खूबसूरत रस्म है 14 दीये जलाने की परंपरा. भूत चतुर्दशी की शाम ढलते ही घर के हर उस कोने को रोशन कर दिया जाता है जहाँ अंधेरा टिक सकता है। दरवाजे की चौखट से लेकर खिड़कियों के पास, रसोई में और तुलसी के चबूतरे पर कुल 14 मिट्टी के दीपक (दीये) जलाए जाते हैं।
इसके पीछे की लोक-मान्यता बेहद मार्मिक है। ऐसा माना जाता है कि ये चौदह दीये हमारे पूर्वजों की आत्माओं के लिए रास्ते का उजाला बनते हैं, ताकि वे बिना किसी भटकाव के सीधे अपने घर पहुँच सकें। साथ ही, यह भी विश्वास किया जाता है कि दीपकों की यह लौ घर से हर तरह की नकारात्मकता और बुरी ऊर्जा को हमेशा के लिए दूर भगा देती है। 14 तरह के साग की परंपरा: अब बात करते हैं इस दिन के सबसे स्वादिष्ट और दिलचस्प हिस्से की- खानपान की! बंगाल की रसोई में इस दिन 'चोउद्द शाक' यानी 14 तरह के अलग-अलग साग बनाने और खाने का अनूठा नियम है। लोग सुबह-सुबह बाजार से या खास तौर पर चुनकर चौदह प्रकार की हरी पत्तेदार सब्जियां और साग घर लाते हैं।दरअसल, मौसम बदल रहा होता है और ठीक दीपावली के आसपास से हल्की ठंडक शुरू हो जाती है. ऐसे में शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने के लिए हरी पत्तेदार सब्जियां किसी वरदान से कम नहीं हैं। आयुर्वेद भी मानता है कि बदलते मौसम में अलग-अलग जड़ी-बूटियों और साग का सेवन पाचन तंत्र को दुरुस्त रखता है और शरीर को अंदर से ऊर्जावान बनाता है।
घर की होती है खास सफाई :भूत चतुर्दशी की सुबह होते ही घरों में महिलाएं और पुरुष घर का कोना-कोना चमकने में लग जाते हैं, जाले हटाई जाती हैं, हर वो पुराना सामान बाहर कर दिया जाता है जिसकी अब जरूरत नहीं है। मान्यता यही है कि जितना साफ-सुथरा घर होगा, उतनी ही सकारात्मक ऊर्जा भीतर आएगी और हमारे पूर्वज भी खुश होकर आशीर्वाद देंगे।
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