- भारत बांग्लादेश और नेपाल सीमांत तक फैलाने की साजिश
- भारतीय युवाओं को हिकमत , मसलाहत, मिज़ान और आधुनिक तकनीकी युग का कर रहा इस्तेमाल
बांग्लादेश बोर्डर से अशोक झा: भारत में दम तोड़ रहे आतंकवाद को दोबारा जीवित करने के लिए पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई (ISI) एक सोची-समझी रणनीति के तहत पुराने आतंकी नेटवर्क और उनके सरगनाओं को फिर से सक्रिय करने की कोशिश कर रही है। पाक अपने नापाक इरादे को सिर्फ काश्मीर तक ही नहीं बल्कि भारत बांग्लादेश और नेपाल सीमांत तक फैलाने की कोशिश में है। आईएसआई अब 'होमग्रोन टेरर मॉडल' और पुराने चेहरों के सहारे नया जाल बुन रही है।अल-उमर मुजाहिदीन की वापसी: आईएसआई कश्मीर के पुराने और लगभग निष्क्रिय हो चुके आतंकी संगठन अल-उमर मुजाहिदीन को दोबारा खड़ा करने की कोशिश कर रही है।
मुश्ताक लटरम का इस्तेमाल: इस संगठन का सरगना मुश्ताक अहमद जरगर उर्फ मुश्ताक लटरम है। यह वही आतंकी है जिसे 1999 के कंधार विमान अपहरण कांड (IC-814) के दौरान मसूद अजहर के साथ भारत सरकार ने यात्रियों की रिहाई के बदले छोड़ा था। लगभग 26 साल बाद, आईएसआई लटरम के पुराने नेटवर्क का इस्तेमाल कर घाटी में स्थानीय युवाओं को भड़काने और भर्ती करने का प्रयास कर रही है। इसका नेपाल ओर दार्जिलिंग हिल्स से भी तार जुड़ चुका था। लश्कर और जैश को गति देना: लटरम के जरिए आईएसआई लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे बड़े आतंकी संगठनों के जमीनी नेटवर्क को फिर से मजबूत करना चाहती है। स्थानीय युवाओं की भर्ती बढ़ाकर आईएसआई TRF जैसे छद्म संगठनों को आगे कर रही है। इसका मकसद दुनिया के सामने यह दिखाना है कि कश्मीर में होने वाले हमले पाकिस्तान समर्थित नहीं, बल्कि वहां के स्थानीय लोगों का 'घरेलू विद्रोह' हैं।डिजिटल और ऑनलाइन प्रोपेगैंडा: युवाओं को कट्टरपंथी बनाने और फंड जुटाने के लिए एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म, टेलीग्राम और सोशल मीडिया का सहारा लिया जा रहा है। विदेशी धरती (जैसे बांग्लादेश या पाकिस्तान) पर बैठे हैंडलर स्थानीय स्तर पर ओवर ग्राउंड वर्कर्स (OGWs) के जरिए लॉजिस्टिक्स और रिक्रूटमेंट मॉड्यूल चला रहे हैं। आज का विश्व मानव इतिहास के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है, जहाँ विज्ञान और प्रौद्योगिकी में तीव्र प्रगति ने जीवन के लगभग हर पहलू को बदल दिया है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रोबोटिक्स, जैव प्रौद्योगिकी और डिजिटल संचार ने मानव जीवन को अधिक कुशल और परस्पर संबद्ध बना दिया है। हालाँकि, इन विकासों के साथ-साथ गंभीर नैतिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक चुनौतियाँ भी उभर कर सामने आई हैं। ऐसे जटिल युग में, हिकमत (बुद्धि), मसलाह (जनहित) और मिज़ान (संतुलन) के इस्लामी सिद्धांत मानवता को जिम्मेदार और सार्थक प्रगति की ओर मार्गदर्शन करने के लिए एक व्यापक ढाँचा प्रदान करते हैं। हिकम, या ज्ञान, इस्लामी चिंतन में एक केंद्रीय स्थान रखता है।वह जिसे चाहता है उसे ज्ञान प्रदान करता है, और जिसे ज्ञान प्रदान किया गया है उसे निश्चय ही बहुत लाभ प्राप्त हुआ है।इस्लाम में, बुद्धिमत्ता केवल ज्ञान का संचय नहीं है, बल्कि ज्ञान को उचित समय पर, सही तरीके से और सही उद्देश्य के लिए लागू करने की क्षमता है। आज के डिजिटल युग में, सूचना प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, फिर भी बुद्धिमत्ता की अक्सर कमी है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी प्रौद्योगिकियाँ जटिल समस्याओं का समाधान कर सकती हैं, लेकिन नैतिक मार्गदर्शन के बिना, वे मानवता के लिए गंभीर खतरे भी पैदा कर सकती हैं। हिकमत हमें न केवल यह मूल्यांकन करना सिखाती है कि क्या किया जा सकता है, बल्कि यह भी कि क्या किया जाना चाहिए। यह नवाचार के साथ-साथ नैतिक चिंतन का आह्वान करती है। मसलाह, यानी जनहित, इस्लामी न्यायशास्त्र का एक और महत्वपूर्ण सिद्धांत है। यह समाज के कल्याण और मानव कल्याण की रक्षा पर बल देता है। इस्लामी कानून (मकासिद अल-शरिया) के उद्देश्य आस्था, जीवन, बुद्धि, वंश और संपत्ति की रक्षा करना है। पैगंबर मुहम्मद ने कहा: "न तो हानि पहुंचानी चाहिए और न ही हानि का प्रतिशोध करना चाहिए।"आधुनिक तकनीकी परिदृश्य में यह सिद्धांत अत्यंत प्रासंगिक है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, डेटा-आधारित अर्थव्यवस्थाएं और एआई सिस्टम समाजों को आकार देने की अपार क्षमता रखते हैं। यदि कुछ शक्तिशाली संस्थाओं द्वारा इन्हें नियंत्रित किया जाए, तो ये असमानता और अन्याय को और गहरा कर सकते हैं। इस्लामी दृष्टिकोण से, प्रौद्योगिकी को संकीर्ण हितों के बजाय जनहित की सेवा करनी चाहिए। नीतियां और प्रणालियां निष्पक्षता, सुलभता और नुकसान से सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बनाई जानी चाहिए, जो मसलाह की भावना को ध्यान में रखना जरूरी है।
#ISI
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