- इस एकादशी का व्रत करने से पूर्वजों को कष्टों से मिलती है मुक्ती
अशोक झा/ सिलीगुड़ी: पितृ पक्ष के दौरान कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को इंदिरा एकादशी व्रत के नाम से जानते हैं। आज 6 अक्टूबर को इंदिरा एकादशी मनाई जा रही है। आज का दिन एकादशी व्रत करने और एकादशी तिथि का श्राद्ध करने के लिए खास है। अक्टूबर माह की यह पहली एकादशी है। 6 अक्टूबर को आज एकादशी तिथि सुबह 2 बजकर 7 मिनट से आरंभ हुई है। वहीं एकादशी तिथि का समापन 7 अक्टूबर को रात 12 बजकर 34 मिनट पर होगा। उदया तिथि के अनुसार एकादशी का व्रत आज ही किया जा रहा है। वहीं व्रत का पारण कल 7 अक्टूबर को किया जाएगा। जानें आज कौनसी एकादशी है, आज की एकादशी का नाम क्या है और 6 अक्टूबर को एकादशी शुभ मुहूर्त। 6 अक्टूबर को आज कौनसी एकादशी है : आज हिंदू पंचांग के अनुसार आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की इंदिरा एकादशी है। इंदिरा एकादशी मुख्य रूप से पितरों की मुक्ति और उन्हें वैकुंठ लोक में मोक्ष दिलाने हेतु मनाई जाती है। इस एकादशी का व्रत करने से पूर्वजों को कष्टों से मुक्ती मिलती है। इंदिरा एकादशी के व्रत का फल और पुण्य पूर्ण रूप से पितरों को समर्पित होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इंदिरा एकादशी का व्रत करने से कुल की सात पीढ़ियों तक के पूर्वजों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।इंदिरा एकादशी व्रत के नियम
इंदिरा एकादशी के दिन व्रत रखने वाले व्यक्ति को सात्विक जीवनशैली अपनानी चाहिए। सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें।
पूजा के दौरान भगवान विष्णु को पीले फूल, फल, तुलसी दल और पंचामृत अर्पित कर सकते हैं। भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी का विशेष महत्व माना जाता है। दिनभर भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करें और संभव हो तो विष्णु सहस्रनाम या धार्मिक ग्रंथों का पाठ करें। इंदिरा एकादशी की कथा:
सतयुग में महिष्मती नाम की नगरी पर राजा इंद्रसेन का शासन था। राजा धर्म-कर्म करने वाले और अपनी प्रजा का ध्यान रखने वाले थे। उनके राज्य में सुख-समृद्धि थी। एक दिन महर्षि नारद राजा इंद्रसेन के दरबार में पहुंचे। राजा ने उनका आदर-सत्कार किया और आने का कारण पूछा।तब नारद जी ने बताया कि उन्होंने यमलोक में राजा के पिता को देखा है। राजा के पिता पुण्यात्मा और दानी थे, लेकिन पिछले जन्म में एकादशी व्रत से जुड़ी गलती के कारण उन्हें यमलोक में कष्ट भोगना पड़ रहा था। यह सुनकर राजा इंद्रसेन दुखी हो गए। उन्होंने नारद जी से पिता को इस स्थिति से बाहर निकालने का उपाय पूछा।तब महर्षि नारद ने उन्हें आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी यानी इंदिरा एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि राजा को विधि-विधान से व्रत करके उसका पुण्य अपने पिता को समर्पित करना चाहिए। नारद जी के बताए अनुसार राजा ने दशमी तिथि से ही नियमों का पालन शुरू किया। अगले दिन एकादशी पर स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा की और श्रद्धापूर्वक व्रत रखा। उन्होंने भगवान शालिग्राम की पूजा की, ब्राह्मण को भोजन कराया और दक्षिणा दी।इसके साथ ही गाय के लिए भी भोजन निकाला। रात में भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए जागरण किया और अगले दिन द्वादशी पर व्रत का पारण किया। इस व्रत के प्रभाव से उनके पिता को यमलोक से मुक्ति मिल गई और वे स्वर्ग लोक चले गए। राजा इंद्रसेन को भी इस व्रत का पुण्य प्राप्त हुआ और बाद में उन्हें भी मोक्ष की प्राप्ति हुई।
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