- यह पर्व 15 दिनों तक मनाई जाती है, सप्तमी फूलपाती से शुरू होकर शरद पुर्णिमा तक रहता है जारी
अशोक झा/ सिलीगुड़ी: आप सभी जानते है कि दुर्गोत्सव 10 दिनों का त्यौहार है।लेकिन गोरखाओं के लिए यह 15 दिनों का त्यौहार होता है। इसे दशईं कहा जाता है।दशईं त्योहार आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से शुरू होता है और इसका समापन पूर्णिमा के दिन होता है। इस तरह से ये त्योहार पूरे 15 दिन मनाया जाता है। गोरखा समुदाय में 'दशैन' (दशहरे) के टीके का धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से बहुत गहरा और विशेष महत्व है। गोरखा संस्कृति में दशहरे को 'दशैन' या 'बडादशैन' कहा जाता है। इस उत्सव का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा दसवें दिन यानी विजयादशमी को आयोजित होने वाली टीका प्रथा है, जो केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पूरे समुदाय को एक सूत्र में पिरोने वाला महापर्व है। नेपाल में इस त्योहार के दौरान माथे पर टीका लगाने की अनोखी परंपरा निभाई जाती है। ये टीका चावल के दाने, लाल अबीर और दही के मिश्रण से बनाया जाता है। ऐसे तैयार किया जाता है टीका:इस खास टीके में अबीर का लाल रंग खून का प्रतीक है जो बताता है कि खून के रिश्ते हमेशा मजबूत बने रहें। दही का सफेद रंग शांति और समृद्धि का प्रतीक है। टीके के साथ जौ घास दी जाती है। टीका लगवाने वाले को केले के पत्ते में दक्षिणा भी दी जाती है।
गोरखाओं के लिए दशैन के टीके के महत्व को निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है। बड़ों का आशीर्वाद और सुरक्षा कवच
विजयादशमी के दिन परिवार के बुजुर्ग और मान्यजन (माता-पिता, दादा-दादी, गुरु) अपने से छोटों के माथे पर टीका लगाते हैं। यह टीका सुख, शांति, समृद्धि, लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य के आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है। मान्यजनों द्वारा मंत्रोच्चारण के साथ दिया गया यह टीका और आशीर्वाद प्राप्तकर्ताओं के लिए एक आध्यात्मिक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है। टीका और जमरा का अनूठा संगम
दशैन के टीके में चावल, दही और सिंदूर (अबीर) का मिश्रण होता है। कुछ गोरखा जनजातियों और मंगोल मूल के समुदायों में लाल रंग की जगह सफेद टीके का भी चलन है। टीके के साथ कान के पीछे या सिर पर 'जमरा' (घटस्थापना के दिन बोए गए जौ या मक्के के पवित्र पीले अंकुर) रखा जाता है। अक्षत (चावल): अविनाशिता और समृद्धि का प्रतीक है।
जमरा: सुख, शांति और प्रकृति के आशीर्वाद (अच्छी फसल) को दर्शाता है। पारिवारिक पुनर्मिलन और एकता का प्रतीक
गोरखा समुदाय में लोग आजीविका, विशेषकर सैन्य सेवाओं के सिलसिले में अक्सर अपने घरों से दूर रहते हैं। दशैन का टीका एक ऐसा अवसर है जब दुनिया के किसी भी कोने में रहने वाला गोरखा अपने पैतृक घर लौटता है। विजयादशमी से शुरू होकर यह टीका उत्सव अगले पांच दिनों (कोजाग्रत पूर्णिमा तक) चलता है, जिसमें लोग दूर-दराज के रिश्तेदारों के घर जाकर टीका लगवाते हैं। यह आपसी मतभेदों को भुलाकर पारिवारिक और सामाजिक संबंधों को मजबूत करने का माध्यम है। सैन्य परंपरा और वीरता से जुड़ाव (ब्रिगेड ऑफ गोरखा)
सैन्य इतिहास और वीरता के लिए विख्यात गोरखाओं के लिए यह टीका शक्ति का संचार करने वाला माना जाता है। भारतीय और ब्रिटिश सेना की गोरखा रेजिमेंटों में दशैन का टीका बेहद भव्य रूप से मनाया जाता है। इस दिन रेजिमेंट के सबसे वरिष्ठ अधिकारी (जैसे गोरखा मेजर) और धार्मिक गुरु (पंडित जी) सभी जवानों को टीका और आशीर्वाद देते हैं। युद्ध के मैदान में जाने वाले या देश की सीमाओं पर तैनात जवानों के लिए यह टीका उनके शौर्य, मनोबल और विजय की कामना से जुड़ा होता है। बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह टीका महिषासुर पर देवी दुर्गा की विजय और रावण पर भगवान राम की जीत के उपलक्ष्य में लगाया जाता है। गोरखा समाज में लाल रंग को उस जुड़ाव और शक्ति के रूप में देखा जाता है जो पूरे समुदाय और परिवार को रक्त संबंधों की तरह एक साथ बांधकर रखता है।खान-पान और दावत: गोरखाओं की पाक कला दुर्गा पूजा का बड़ा आकर्षण होती है। विसर्जन से एक रात पहले विशेष दावत का आयोजन होता है, जिसमें मांस की खिचड़ी, लाबरा (सब्जी और मांस का मिश्रण) और कई मांसाहारी व्यंजन शामिल होते हैं।
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