- दुर्गापूजा के विजयादशमी के दिन की जाती है शस्त्रपूजा
-"शस्त्रेण रक्षिते राष्ट्रे शास्त्रचिन्ता प्रवर्तते" यही सनातन का मूल मंत्र
- हर युग में इस बात को प्रमाणित होते देखा जा सकता है, आप भी हो तैयार
अशोक झा/ सिलीगुड़ी: पूर्वोत्तर भारत का प्रवेश द्वार सिलीगुड़ी। यहां सामाजिक संगठनों से जुड़े समाज सेवी सीताराम डालमिया को विजया दशमी के दिन शस्त्रपूजा में मगन देखा गया। सवाल उठा कि क्या जो व्यक्ति संगठन और सनातन के लिए अनवरत कार्य करते आ रहे है वह अब क्या शस्त्र उठाने की तैयारी में है। इन प्रश्नों का उत्तर कई विद्वानों से जानना चाहा। तो पता चला की सनातन धर्म में शस्त्र (हथियार) और शास्त्र (ज्ञानग्रंथ) दोनों को एक ही सिक्के के दो पहलू माना गया है, जहाँ शास्त्र जीवन जीने का सही मार्ग दिखाते हैं, वहीं शस्त्र उस मार्ग और धर्म की रक्षा करने का सामर्थ्य देते हैं। सनातन संस्कृति में यह स्पष्ट कहा गया है कि "शस्त्रेण रक्षिते राष्ट्रे शास्त्रचिन्ता प्रवर्तते" अर्थात् जब राष्ट्र और समाज शस्त्रों द्वारा सुरक्षित होता है, तभी वहाँ शास्त्रों, ज्ञान और कलाओं पर शांतिपूर्वक विचार हो सकता है। दुर्गापूजा (विजयादशमी/दशहरा) के पावन अवसर पर शस्त्र पूजा की परंपरा का बहुत गहरा धार्मिक, ऐतिहासिक और व्यावहारिक महत्व है। संतुलन का संदेश: सनातन परंपरा केवल एकांगी (एकतरफा) नहीं है। यह जहाँ एक ओर ऋषियों के ज्ञान (शास्त्र) का आदर करती है, वहीं दूसरी ओर अन्याय के खिलाफ लड़ने वाले योद्धाओं के शौर्य (शस्त्र) को भी पूजती है। धर्म स्थापना का साधन: बिना शक्ति के सत्य की रक्षा नहीं हो सकती। शास्त्र मनुष्य को विवेक, सदाचार और नीति सिखाते हैं, जबकि शस्त्र दुष्टों से निर्दोषों की रक्षा और धर्म की सुरक्षा का साधन बनते हैं। जब शस्त्र धर्म की रक्षा के लिए उठते हैं, तो वे पवित्र और पूजनीय हो जाते है।
मर्यादा और अनुशासन: सनातन में शस्त्र का अर्थ हिंसा फैलाना नहीं, बल्कि आत्मरक्षा और अनुशासन है। हमारे देवी-देवताओं (जैसे भगवान राम, कृष्ण, शिव, मां दुर्गा) के हाथों में हमेशा शास्त्र के साथ-साथ शस्त्र भी दिखाई देते हैं, जो बुराई के दमन के प्रतीक है।दुर्गापूजा और विजयादशमी पर शस्त्र पूजा क्यों होती है? विजयादशमी या दशहरे के दिन शस्त्र पूजा (जिसे आयुध पूजा भी कहा जाता है) करने के पीछे कई मुख्य पौराणिक और ऐतिहासिक कारण हैं।माँ दुर्गा द्वारा महिषासुर का संहार: पौराणिक कथाओं के अनुसार, महिषासुर नाम के राक्षस से त्रस्त होकर सभी देवताओं ने अपनी सामूहिक ऊर्जा से आदिशक्ति माँ दुर्गा को प्रकट किया था। देवताओं ने अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्र देवी दुर्गा को सौंपे। माँ दुर्गा ने लगातार 9 दिनों तक महिषासुर से भीषण युद्ध किया और 10वें दिन (विजयादशमी) उसका वध कर दिया। इस विजय की खुशी में माँ दुर्गा के साथ-साथ उनके उन सभी अस्त्र-शस्त्रों की पूजा की जाती है, जिन्होंने सृष्टि को भयमुक्त किया था।भगवान श्रीराम का धनुष को प्रणाम:त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने लंकापति रावण का वध करने से पहले रावण की विशाल सेना और उसकी मायावी शक्तियों को परास्त करने के लिए अपनी शक्ति और अस्त्रों की पूजा की थी। विजयदशमी के दिन ही रावण का अंत हुआ था, इसलिए इस दिन को असत्य पर सत्य की जीत के रूप में मनाते हुए शस्त्रों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है।
द्वापर युग में, पांडवों को जब 1 वर्ष का अज्ञातवास काटना था, तब उन्होंने अपने सभी दिव्य गांडीव धनुष और अन्य अस्त्र-शस्त्र एक शमी वृक्ष के पत्तों के पीछे छिपा दिए थे। अज्ञातवास समाप्त होने पर विजयादशमी के दिन ही अर्जुन ने शमी वृक्ष से अपने अस्त्र वापस उतारे, उनकी पूजा की और फिर कौरवों की सेना को युद्ध में परास्त कर दिया। इसी कारण आज भी कई जगहों पर शस्त्र पूजा के साथ-साथ शमी वृक्ष की पूजा की जाती है। क्षत्रिय और शौर्य की परंपरा:ऐतिहासिक रूप से, भारत के राजा, महाराजा और क्षत्रिय योद्धा वर्षा ऋतु की समाप्ति के बाद इसी दिन (विजयादशमी) अपने युद्ध अभियानों की शुरुआत करते थे। प्रस्थान करने से पहले वे अपनी सेना, घोड़ों, हाथियों और हथियारों की पूजा करके माँ दुर्गा से विजय का आशीर्वाद मांगते थे। आधुनिक युग में इसका व्यावहारिक स्वरूप
आज के समय में भले ही हर घर में तलवार या तीर-कमान न हों, लेकिन यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा से निभाई जाती है।
औजारों और मशीनों की पूजा: आधुनिक समय में लोग इस दिन अपने जीवनयापन के साधनों, जैसे- गाड़ियों, कंप्यूटर, कलम, औजारों, क्रेन, या कारखानों की मशीनों को साफ करके उनकी पूजा करते हैं। सुरक्षा बलों द्वारा पूजन: भारत की सेना, पुलिस और सुरक्षा बल आज भी विजयादशमी के दिन अपने आधुनिक हथियारों (बंदूकों, टैंकों, मिसाइलों) का वैदिक रीति-रिवाज से पूजन करते हैं। शस्त्र पूजा की संक्षिप्त विधि: इस दिन सुबह या विजय मुहूर्त में शस्त्रों को स्वच्छ जल से साफ किया जाता है, उन पर रोली-चंदन का तिलक लगाया जाता है, अक्षत, फूल और धूप-दीप दिखाकर रक्षा सूत्र बांधा जाता है।
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