-भारत ने विश्व कोे बताए कि कैसे निभाई जाती है दोस्ती
- ब्रिक्स का यह विस्तारित नेटवर्क दोनों देशों को अमेरिकी प्रतिबंधों के दबाव कर रहा कम
अशोक झा/ नई दिल्ली: भारत और ईरान के बीच मजबूत होती दोस्ती पाकिस्तान के लिए हमेशा से एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती रही है। पाकिस्तानी मीडिया, विश्लेषकों और सरकारी हलकों में इस बात को लेकर गहरी चिंता देखी जाती है कि नई दिल्ली और तेहरान के रिश्ते इस्लामाबाद के रणनीतिक हितों को प्रभावित कर रहे हैं। पाकिस्तान हमेशा इस बात को लेकर आशंकित रहता है कि यदि उसके पूर्व में भारत और पश्चिम में ईरान आपस में मजबूत संबंध बना लेते हैं, तो वह दोनों तरफ से घिर जाएगा। अतीत में भी, विशेष रूप से 90 के दशक में अफ़गानिस्तान के मुद्दे पर (जब भारत और ईरान ने मिलकर तालिबान विरोधी नॉर्दन अलायंस की मदद की थी), ईरान का रुख पाकिस्तान के प्रॉक्सी नेटवर्क के खिलाफ और भारत के पक्ष में रहा है।कश्मीर मुद्दे पर झटका: पाकिस्तान वैश्विक मंचों पर मुस्लिम देशों के साथ मिलकर कश्मीर मुद्दे पर भारत को घेरने की कोशिश करता रहा है। हालांकि, ईरान ने कई मौकों पर भारत के साथ अपने ऐतिहासिक और सभ्यतागत संबंधों को प्राथमिकता दी है, जिससे पाकिस्तान का मुस्लिम कार्ड कमजोर पड़ जाता है।
हालांकि, हाल के भू-राजनीतिक घटनाक्रमों और मध्य-पूर्व में अमेरिका व इजरायल के साथ ईरान के बढ़ते तनाव के चलते ईरान और पाकिस्तान के बीच भी कुछ नई समीकरण (जैसे मध्यस्थता और द्विपक्षीय बातचीत) उभर कर आई हैं, लेकिन भारत और ईरान की मजबूत बुनियादी साझेदारी हमेशा से इस्लामाबाद के लिए चिंता का विषय रही है।भारत-ईरान संबंध ऐतिहासिक और सभ्यतागत संबंधों से विकसित होकर एक मजबूत रणनीतिक साझेदारी में बदल चुके हैं, जिसमें ब्रिक्स (BRICS) का विस्तारित मंच एक नए मील के पत्थर के रूप में उभरा है। नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (12-13 सितंबर 2026) में भारत की मेजबानी के दौरान दोनों देशों के बीच सहयोग के नए रास्ते खुले हैं, जिससे पश्चिम एशिया और वैश्विक भू-राजनीति को एक नई दिशा मिल रही है। ब्रिक्स के विशेष संदर्भ में भारत-ईरान संबंधों के ऐतिहासिक पहलुओं और वर्तमान रणनीतिक साझेदारी का विस्तृत विश्लेषण निम्नलिखित है।
प्राचीन संबंध: भारत और ईरान के बीच संबंध सदियों पुराने हैं, जो व्यापार, संस्कृति और भाषाई आदान-प्रदान से जुड़े हैं। फारस की खाड़ी के समुद्री मार्गों ने दोनों उपमहाद्वीपों के बीच सामाजिक-आर्थिक जुड़ाव की मजबूत नींव रखी थी।
आधुनिक कूटनीति: स्वतंत्रता के बाद दोनों देशों ने 15 मार्च 1950 को औपचारिक रूप से राजनयिक संबंध स्थापित किए। वर्ष 1993 में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव की ईरान यात्रा और 1995 में ईरानी राष्ट्रपति रफसंजानी की भारत यात्रा ने इन संबंधों को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। ब्रिक्स (BRICS): रणनीतिक साझेदारी का नया मंच ; ईरान के ब्रिक्स के पूर्ण सदस्य के रूप में शामिल होने के बाद, दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों को एक बहुपक्षीय और अधिक प्रभावी मंच मिला है। 2026 के दिल्ली शिखर सम्मेलन में यह रणनीतिक साझेदारी निम्नलिखित रूपों में सामने आई: बहुध्रुवीयता और वैश्विक संतुलन: पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के बीच, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान की यह भारत यात्रा अत्यधिक महत्वपूर्ण रही। ईरान ब्रिक्स के माध्यम से एक ऐसा वैकल्पिक आर्थिक और रणनीतिक मंच तलाश रहा है, जो पश्चिमी देशों के एकतरफा प्रतिबंधों के प्रभाव को कम कर सके और बहुध्रुवीयता (Multipolarity) को बढ़ावा दे सके।
राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार: ब्रिक्स बैठकों के दौरान ईरान ने व्यापार में स्थानीय/राष्ट्रीय मुद्राओं के अधिक उपयोग पर जोर दिया है, ताकि अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता को कम किया जा सके।संयुक्त वित्तीय पहल: आर्थिक सुरक्षा बढ़ाने और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को वित्तीय सहायता देने के लिए ईरान द्वारा 10 अरब डॉलर की प्रारंभिक पूंजी वाली संयुक्त ब्रिक्स बीमा कंपनी का प्रस्ताव रखा गया है।ब्रिक्स फ्रेमवर्क के तहत भारत और ईरान क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
परियोजना / क्षेत्ररणनीतिक महत्वचाबहार बंदरगाह : भारत द्वारा विकसित यह बंदरगाह अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक भारतीय वस्तुओं की पहुंच के लिए एक बाईपास मार्ग प्रदान करता है, जिससे पाकिस्तान के गवादर पोर्ट (चीन द्वारा निर्मित) को रणनीतिक टक्कर मिलती है।अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC) मुंबई से सेंट पीटर्सबर्ग (रूस) को जोड़ता है। ईरान और भारत इसके विस्तार के जरिए यूरेशियाई व्यापार को सुगम बना रहे हैं।ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security)वैश्विक प्रतिबंधों के बावजूद, ब्रिक्स के मंच पर भारत और ईरान के बीच ऊर्जा आपूर्ति, कच्चे तेल के व्यापार और निवेश के दीर्घकालिक रोडमैप पर सकारात्मक चर्चा हुई है।क्षेत्रीय स्थिरता और मध्यस्थ के रूप में भारत
ब्रिक्स 2026 के मंच पर भारत ने स्वयं को एक वैश्विक शांतिदूत और मध्यस्थ के रूप में स्थापित किया है। भारत की कोशिशों के चलते ब्रिक्स समिट के दौरान एक ही मंच पर ईरान, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), और सऊदी अरब के शीर्ष नेतृत्व मौजूद रहे। शिखर सम्मेलन के दौरान भारत ने ईरान और यूएई के बीच उच्च स्तरीय वार्ता कराई, जिसके परिणामस्वरूप दोनों पारंपरिक प्रतिद्वंद्वियों के शीर्ष नेताओं के बीच आमने-सामने मुलाकात संभव हो सकी। इसके अतिरिक्त, सर्वसम्मति से स्वीकार किए गए 'दिल्ली डिक्लेरेशन' में पश्चिम एशिया की स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए क्षेत्रीय स्थिरता पर बल दिया गया।
भविष्य की राह : अक्टूबर 2026 में ईरानी राष्ट्रपति पेज़ेश्कियान के आधिकारिक बयानों के अनुसार, भारत और ईरान अब अपने संयुक्त आर्थिक आयोग का उपयोग करके दीर्घकालिक रणनीतिक सहयोग के लिए एक व्यापक रोडमैप तैयार करने की दिशा में बढ़ रहे हैं। ब्रिक्स का यह विस्तारित नेटवर्क दोनों देशों को अमेरिकी प्रतिबंधों के दबाव से बचाते हुए व्यापार, गैर-तेल आर्थिक सहयोग और क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे में स्वतंत्र नीतियां अपनाने की ताकत दे रहा है।
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