-"इस्लामोफोबिया' के कारण बदनाम हो रहा इस्लाम
- वरना मानव जीवन के लिए एक संपूर्ण मार्गदर्शिका और जीवन-प्रणाली
अशोक झा/ कोलकाता : पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि उनके कार्यकाल में राज्य में धर्मांतरण, लव जिहाद और 'लैंड जिहाद' नहीं होने दिया जाएगा। मुस्लिम बहुल मालदा में एक राहत वितरण कार्यक्रम को संबोधित करते हुए अधिकारी ने कहा कि अतीत में जिले के कालियाचक इलाके में धर्म परिवर्तन की घटनाएं हुई थीं, लेकिन इसे दोहराया नहीं जाना चाहिए।पश्चिम बंगाल सरकार ने मई में मालदा सहित कई जिलों में कंटीले तारों की बाड़ लगाने और सीमा चौकी के लिए 142.79 एकड़ जमीन बीएसएफ को हस्तांतरित की है। नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) पर अधिकारी ने कहा कि आवेदकों को अब प्रमाणपत्र के लिए दूसरों के पास जाने की जरूरत नहीं होगी, क्योंकि केंद्र ने राज्य को इन्हें जारी करने की शक्ति दे दी है।
उन्होंने कहा, ''हम सुनवाई करेंगे और प्रमाणपत्र देंगे। जिन लोगों ने आवेदन नहीं किया है, उन्हें जल्दी करना चाहिए। जिन लोगों को पहले ही प्रमाण पत्र मिल चुके हैं, उन्हें मतदाता सूची में जोड़ा जाएगा, और उनमें से जो लोग अनुसूचित जातियों से संबंधित हैं, उन्हें उनके जाति प्रमाणपत्र भी मिलेंगे।'' मुख्यमंत्री ने सभी से पश्चिम बंगाल पशु वध नियंत्रण अधिनियम, 1950 का सख्ती से पालन करने को भी कहा।
अधिकारी ने कहा कि मालदा को नशा मुक्त बनाने और बाल विवाह रोकने के लिए भी राज्य सरकार काम करेगी। उन्होंने कहा, ''जो लोग स्कूलों और मदरसों में कक्षाओं की शुरुआत से पहले पूरा वंदे मातरम गाएंगे, वो मेरे दोस्त होंगे।'' अधिकारी ने यह भी घोषणा की कि किसानों का समर्थन करने के लिए एक किसान विकास बोर्ड का गठन किया जाएगा। उन्होंने कहा कि दुनिया भर के कई आधुनिक मुस्लिम विद्वान और समाज सुधारक लगातार यह बात उठाते रहे हैं कि कट्टरपंथ और आतंकवाद का इस्लाम की मूल सीख से कोई लेना-देना नहीं है।
मूल शिक्षाएँ बनाम व्याख्या: मुख्यधारा के विद्वानों का तर्क है कि इस्लाम शांति, न्याय और मानवता का संदेश देता है, लेकिन कुछ चरमपंथी संगठन और विचार अपनी राजनीतिक या व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के लिए धार्मिक ग्रंथों की गलत और सख्त व्याख्या करते हैं। आंतरिक सुधार की मांग: समुदाय के भीतर से भी ऐसी आवाजें उठ रही हैं जो शिक्षा की कमी, लकीर का फकीर बनने की प्रवृत्ति और आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों को अपनाने में आने वाली हिचकिचाहट को कट्टरपंथ की मुख्य जड़ मानती हैं और इसमें सुधार की वकालत करती हैं। चुनिंदा संगठनों की गतिविधियाँ: आईएसआईएस (ISIS), अल-कायदा या तालिबान जैसे उग्रवादी संगठनों द्वारा की जाने वाली हिंसक घटनाओं के कारण वैश्विक स्तर पर पूरे समुदाय को शक की नजर से देखा जाने लगता है, जिसे समाजशास्त्री 'इस्लामोफोबिया' भी कहते हैं। मीडिया और राजनीतिक हित: कुछ विश्लेषकों का मानना है कि वैश्विक मीडिया और कुछ देशों के राजनीतिक हित भी किसी एक समुदाय की नकारात्मक छवि को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने में भूमिका निभाते हैं। इसके विपरीत, आलोचकों का तर्क है कि जब तक समुदाय के भीतर से उग्रवादी विचारधाराओं का पुरजोर विरोध नहीं होगा, तब तक छवि बदलना मुश्किल है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और दार्शनिकों के अनुसार, इस समस्या के समाधान के लिए 'सिद्धांतों' और 'इंसानों' के बीच अंतर करना जरूरी है। आलोचना का अधिकार: किसी भी धार्मिक विचार, रूढ़िवादिता या शरिया कानूनों (जैसे लिंग असमानता या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक) की तार्किक और शांतिपूर्ण आलोचना होनी चाहिए। मानवाधिकारों की सुरक्षा: विचार की आलोचना करने का मतलब यह कतई नहीं होना चाहिए कि आम मुस्लिम नागरिकों को हिंसा, भेदभाव या सामूहिक संदेह का शिकार बनाया जाए। क्योंकि इस्लाम जीवन का एक संपूर्ण नियम है जो मानव जीवन के हर पहलू के लिए व्यापक मार्गदर्शन प्रदान करता है। यह केवल रीति-रिवाजों या धार्मिक प्रथाओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि व्यक्तिगत आचरण, सामाजिक संबंधों, आर्थिक व्यवस्थाओं, नैतिकता और सांस्कृतिक मूल्यों तक भी फैला हुआ है। इस्लाम केवल पूजा-पाठ या धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित कोई साधारण धर्म नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन के लिए एक संपूर्ण मार्गदर्शिका और जीवन-प्रणाली है। अरबी भाषा में इसे 'दीन' कहा जाता है, जिसका अर्थ ऐसी व्यवस्था से है जो मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक, और व्यक्तिगत आचरण से लेकर अंतरराष्ट्रीय मामलों तक हर क्षेत्र में नियम और सिद्धांत निर्धारित करती है।इस्लामी विद्वानों और धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, इस्लाम निम्नलिखित प्रमुख स्तंभों और नियमों के माध्यम से जीवन के सभी पहलुओं को संचालित करता है।
ईमान और इबादत: अल्लाह की एकता पर विश्वास (तौहीद), दैनिक पांच वक्त की नमाज़, रमज़ान के रोज़े, जकात (दान) और हज इसके बुनियादी स्तंभ हैं जो मनुष्य को उसके निर्माता से जोड़ते हैं। स्वच्छता और आहार: इस्लाम में शारीरिक और मानसिक शुद्धता को अनिवार्य माना गया है। इसमें 'हलाल' (वैध) चीज़ों को अपनाने और 'हराम' (जैसे सूअर का मांस या शराब) से दूर रहने के कड़े नियम हैं।पारिवारिक ढांचा: विवाह, माता-पिता के अधिकार, बच्चों की परवरिश, और रिश्तेदारों के साथ व्यवहार के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश दिए गए हैं। यहाँ तक कि बच्चे के जन्म से पहले ही माता-पिता के चयन को लेकर मार्गदर्शन शुरू हो जाता है। सामाजिक समानता: इस्लाम नस्ल, रंग या जाति के भेदभाव को नकारता है और समाज में न्याय, भाईचारे तथा कमज़ोरों (अनाथों, विधवाओं और गरीबों) की मदद पर ज़ोर देता है। न्यायपूर्ण व्यापार: इस्लाम में ईमानदारी से व्यापार करने को इबादत का दर्जा दिया गया है।
ब्याज (सूद) पर प्रतिबंध: आर्थिक शोषण को रोकने के लिए इस्लाम में ब्याज को पूरी तरह प्रतिबंधित (हराम) किया गया है।
जकात और सदका: संपत्ति के एक हिस्से को गरीबों में बांटना अनिवार्य (जकात) है, ताकि समाज में धन का प्रवाह बना रहे और आर्थिक असमानता कम हो। शरिया और कानून: यह नागरिक, आपराधिक और व्यक्तिगत कानूनों की एक व्यापक रूपरेखा प्रदान करता है। नेतृत्व और शासन: शासकों को जनता के प्रति जवाबदेह, न्यायप्रिय और परामर्श (शूरा) के आधार पर फैसले लेने का निर्देश दिया गया है। यहाँ तक कि युद्ध की स्थिति में भी बच्चों, महिलाओं, बुजुर्गों और पर्यावरण को नुकसान न पहुँचाने के सख्त नैतिक नियम (युद्ध नीति) निर्धारित हैं। इस्लाम मनुष्य को ईमानदारी, विनम्रता, क्षमा, और धैर्य जैसे गुणों को अपनाने तथा झूठ, चुगली, घमंड और धोखेबाजी से बचने की सीख देता है। इस प्रकार, इस्लाम मानव जीवन को टुकड़ों में नहीं देखता, बल्कि इसे एक संपूर्ण इकाई (Organic Whole) मानता है। चाहे वह घर का एकांत हो, बाज़ार का व्यापार हो, या फिर अदालत और संसद, हर जगह इस्लाम के नैतिक और व्यावहारिक नियम लागू होते हैं। आधुनिक युग में, जहाँ विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने तीव्र प्रगति की है और दुनिया एक वैश्विक गाँव बन गई है, मानवता अनगिनत सुख-सुविधाओं का आनंद ले रही है। हालाँकि, साथ ही साथ, लोग मानसिक तनाव, नैतिक पतन और आध्यात्मिक शून्यता का सामना भी कर रहे हैं। इस संदर्भ में, इस्लामी जीवनशैली का महत्व और भी बढ़ जाता है।आधुनिक समाज की प्रमुख विशेषताओं में से एक भौतिकवाद है। सफलता को अक्सर धन, प्रतिष्ठा और प्रसिद्धि के आधार पर मापा जाता है। सांसारिक उपलब्धियों की इस दौड़ में व्यक्ति आंतरिक शांति और नैतिक मूल्यों को खो बैठता है। इसके विपरीत, इस्लाम सिखाता है कि सच्ची सफलता ईश्वर की प्रसन्नता, नैतिक शुद्धता और परलोक में सफलता में निहित है। कुरान बार-बार न्याय, ईमानदारी, धैर्य, संयम और धार्मिकता को संतुलित जीवन के लिए आवश्यक मूल्यों के रूप में रेखांकित करता है।इस्लामी जीवनशैली का एक प्रमुख सिद्धांत संयम (वसातिय्यत) है। इस्लाम न तो सांसारिक जीवन से पूर्ण अलगाव को बढ़ावा देता है और न ही भौतिक सुखों में अंधाधुंध लिप्त होने को प्रोत्साहित करता है। इसके बजाय, यह सांसारिक जिम्मेदारियों और आध्यात्मिक दायित्वों के बीच एक संतुलित मार्ग प्रदान करता है। आज की दुनिया में, जहाँ लोग अक्सर अत्यधिक भौतिकवाद और असीमित नैतिक स्वतंत्रता के चरम सीमाओं के बीच झूलते रहते हैं, संतुलन का यह सिद्धांत एक सार्थक समाधान प्रस्तुत करता है। सामाजिक जीवन में, इस्लाम मानवाधिकारों और दायित्वों पर विशेष बल देता है। माता-पिता का आदर, पड़ोसियों के प्रति दयालुता, पारिवारिक संबंध बनाए रखना, अनाथों और गरीबों की सहायता करना और समाज में न्याय सुनिश्चित करना इस्लाम की मूलभूत शिक्षाएँ हैं। यदि इन सिद्धांतों को आधुनिक समाज में व्यापक रूप से अपनाया जाए, तो हिंसा, असमानता, भ्रष्टाचार और भेदभाव जैसी कई सामाजिक समस्याओं को काफी हद तक दूर किया जा सकता है।
#लवजिहाद
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