- उपचुनाव से पहले EC का बड़ा फैसला , टीएमसी के 28 साल के इतिहास में पहली बड़ी औपचारिक टूट के साथ बिखड़ी पार्टी
अशोक झा/ कोलकाता:टीएमसी के 28 साल के इतिहास में पहली बड़ी औपचारिक टूट के तौर पर देखा गया। विवाद के पीछे पार्टी नेतृत्व से असंतोष, संगठन में फैसलों के केंद्रीकरण अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव जैसे मुद्दे बताए गए। इससे पहले ऋतब्रत बनर्जी संदीपन शाह को कथित फर्जी हस्ताक्षर विवाद के बाद पार्टी से निष्कासित किया गया था।चुनाव आयोग ने अंतरिम आदेश में ममता बनर्जी दूसरे गुट, दोनों को फिलहाल टीएमसी के नाम पारंपरिक चुनाव चिह्न के इस्तेमाल से रोक दिया है।बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के दो फाड़ होने के बाद दोनों गुट को अलग-अलग पार्टी के नाम से मान्यता मिल गई है। एक गुट का नेतृत्व ममता बनर्जी कर रही हैं तो दूसरे गुट का ऋतब्रत बनर्जी।बंगाल में बड़ा खेला हो गया है। भारत के निर्वाचन आयोग ने (ECI) ने आज शुक्रवार 18 सितंबर को पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के दोनों गुटों को अलग-अलग नाम और सिंबल अलॉट कर दिया है। बता दें कि एक दिन पहले ही चुनाव आयोग ने बड़ा फैसला लिया था। इसके तहत तृणमूल के दोनों गुटों को 6 अक्तूबर को होने वाले उपचुनाव में पार्टी का नाम अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस और उसके फूल और घास सिंबल का प्रयोग करने पर रोक लगा दी थी। तृणमूल कांग्रेस के दोनों गुटों को क्या मिला?: चुनाव आयोग के फैसले के मुताबिक, अब ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल कांग्रेस समूह को ममता 'ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस' के नाम से जाना जाएगा और सिंबल फुटबॉल खिलाड़ी आवंटित किया गया है। साथ ही इस पश्चिम बंगाल, मेघालय और त्रिपुरा में एक मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के रूम में माना जाएगा उधर, चुनाव आयोग ने अरूप रॉय के नेतृत्व वाले समूह को डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस नाम दिया है जबकि सिंबल 'लिफाफा' प्रदान किया गया है। साथ ही इसे पश्चिम बंगाल, मेघालय और त्रिपुरा में एक मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी के रूप में जाना जाएगा।
कैसे ममता बनर्जी को लगा झटका पर झटका : 5 मई 2026. स्थान-कोलकाता का मशहूर कालीघाट. सफेद रूमाल में माइक लपेटकर मीडिया के सामने ममता बनर्जी पेश हुईं। मौका था बंगाल चुनाव में तृणमूल की हार पर बात करने का। पत्रकारों से बात करते हुए ममता बनर्जी ने कहा- मैं एक स्ट्रीट फाइटर हूं।मेरे लिए चुनाव में हार और जीत मायने नहीं रखते. मैं सड़क पर थी और रहूंगी. ममता ने कार्यकर्ताओं में जोश भरते हुए कहा कि मैं हारी नहीं हूं. चुनाव में हमारे 80 विधायक चुनकर आए हैं.
हालांकि, 5 महीने बाद ममता बनर्जी की सियासी दुनिया अब पूरी तरह बदल चुकी है. जिस पार्टी में उन्होंने नए सिरे से जान फूंकने का ऐलान किया था. अब उस पर विवाद है. 80 के बदले ममता के पास अब सिर्फ 20 विधायक बचे हैं। कितनी बदल गई ममता की सियासी दुनिया?: टुकड़ों में बंट गई तृणमूल कांग्रेस- 1998 में कांग्रेस से बगावत करके ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस का गठन किया था. 28 साल बाद अब उस पार्टी का भविष्य अधर में है. विवाद चुनाव आयोग के पास है और आयोग को इस पर फैसला लेना है. फिलहाल ममता के पास से पार्टी की कमान जा चुकी है. ममता को चुनाव आयोग ने अस्थाई तौर पर नई पार्टी चुनने के लिए कहा है. इस पार्टी का नाम ममता अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस है। सिंबल फ्रीज, नया चुनाव चिह्न मिला– ममता ने जब तृणमूल का गठन किया तो इसे ग्रास रूट पार्टी बताया. इसके कारण पार्टी का सिंबल जोड़ा फूल (2 फूल और घास) रखा गया. चुनाव आयोग ने अब इसे जब्त कर लिया है. चुनाव आयोग ने ममता को फुटबॉल खिलाड़ी का नया सिंबल प्रदान किया है. जोड़ा फूल जो 28 साल से टीएमसी की पहचान थी, अब बंगाल के चुनाव में नहीं दिखेगी.3. 440 करोड़ रुपए फ्रीज हो गए- 5 मई को ममता बनर्जी जब पत्रकारों को संबोधित कर रही थीं, तब पार्टी के अकाउंट में 440 करोड़ रुपए थे. अब उन पैसों को ईडी ने फ्रीज कर लिया है. ईडी हेलिकॉप्टर खरीद मामले की जांच कर रही है. इस मामले में मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप है. ममता को इस मामले में हाई कोर्ट से राहत नहीं मिली है। अब सिर्फ 20 विधायक और 8 सांसद बचे- 5 महीने बाद ममता बनर्जी की पार्टी पूरी तरह से टूट चुकी है। पार्टी 3 टुकड़ों में बंट चुकी है। सुदीप बंधोपाध्याय के साथ 20 सांसद एनसीपीआई में शामिल हो चुके हैं. इनमें काकोली घोष दस्तीदार, सायोनी घोष भी शामिल हैं, जिसे ममता का करीबी माना जाता था. वहीं 60 विधायकों के साथ ऋतब्रता बनर्जी और अरुप राय ने मूल टीएमसी पर दावा ठोक दिया है. 5 मई को ममता के पास 80 विधायक और 28 सांसद थे. इस वक्त ममता के पास 20 विधायक और 8 सांसद बचे हैं।
करीबी साथियों ने साथ छोड़ दिया- बंगाल में जब तृणमूल की सरकार थी, तब फिरहाद हकीम, अणुब्रत मंडल और अरुप राय, सुदीप बंधोपाध्याय को ममता का सबसे करीबी नेता माना जाता था. इस वक्त ये सभी पार्टी छोड़ चुके हैं. ममता कैबिनेट में मंत्री रहे सिर्फ एक नेता मदन मित्रा अभी उनके साथ है।
ममता बनर्जी का ये हाल कैसे हुआ?
गुरुवार (17 सितंबर) को जब चुनाव आयोग की तरफ से सिंबल फ्रीज का आदेश आया, तब जाधवपुर से सांसद सायोनी घोष ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट लिखा- ये बता कारवां क्यों लूटा? जानकार इसके 3 कारण बताते हैं। ममता बनर्जी के पुराने और विश्वासपात्र नेता या तो इस दुनिया में नहीं हैं या अलग थलग हो चुके हैं. मसलन, सुब्रत मुखर्जी, मुकुल राय जैसे नेताओं का निधन हो चुका है. वहीं पार्थ चटर्जी और अमित मित्रा अलग थलग हो चुके हैं। चुनाव में हार के बाद पार्टी के भीतर अभिषेक बनर्जी का विरोध खुलकर होने लगा. ऋतब्रता और काकोली गुट के निशाने पर अभिषेक ही रहे. हालांकि, ममता का कहना है कि ये सब साजिश है। सरकार में न होना एक बड़ी वजह है. ममता के खिलाफ विद्रोह करने वाले कई बड़े नेताओं पर केस दर्ज है। इनमें ज्योतिप्रिय मल्लिक, अरुप राय और अणुब्रत मंडल का नाम प्रमुख हैं।
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