- पहला दौर था- मंदिर के लिए संघर्ष: दूसरा दौर है-मंदिर बनने के बाद उसकी व्यवस्था, विस्तार और संस्थागत भूमिका
अशोक झा/ अयोध्या: राम मंदिर बन गया. 22 जनवरी 2024 को रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा भी हो गई। अयोध्या में मंदिर निर्माण के साथ राम जन्मभूमि आंदोलन का सबसे बड़ा लक्ष्य भी पूरा हो गया। अब राममंदिर 2 में अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी का मामला सामने आने के बाद श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने मंदिर की व्यवस्थाओं को अभेद्य और पारदर्शी बनाने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है।मंदिर के व्यवस्थित और प्रभावी संचालन के लिए भारतीय वायुसेना के पूर्व एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा को राम मंदिर का पहला मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) बनाया गया है। देश की सुरक्षा में अहम भूमिका निभाने वाले सैन्य अधिकारी के हाथ में मंदिर प्रबंधन की कमान आने से संत समाज में खुशी की लहर है। उन्होंने ट्रस्ट के इस फैसले का खुले दिल से स्वागत किया है।
मिश्रा ने अपने बयान में वायुसेना में बिताए करीब 43 वर्षों के सेवाकाल का उल्लेख करते हुए कहा कि देश की सेवा के बाद अब उन्हें श्रीराम मंदिर श्रद्धालुओं की सेवा का अवसर मिला है. उन्होंने इसे भगवान राम का आशीर्वाद बताया।
ऑपरेशन सिंदूर से भी रहा खास संबंध:जितेंद्र मिश्रा का नाम हाल के वर्षों में भारतीय वायुसेना की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों के कारण चर्चा में रहा है. वह वेस्टर्न एयर कमांड के प्रमुख रह चुके हैं। इसी दौरान उन्हें ऑपरेशन सिंदूर से जुड़ी अहम सैन्य जिम्मेदारी संभालने का अनुभव मिला। ताजा रिपोर्टों में उन्हें इस अभियान के दौरान पश्चिमी वायु क्षेत्र की कमान संभालने वाले अधिकारी के तौर पर बताया गया है।
सबसे पहले ही हम आपको बता दें कि 'राम मंदिर 2.0' कोई आधिकारिक नाम नहीं है। हम बस जो बदलाव हुए हैं, उसे समझने के लिए इसका प्रयोग कर रहे हैं। पहला दौर था- मंदिर के लिए संघर्ष: दूसरा दौर है-मंदिर बनने के बाद उसकी व्यवस्था, विस्तार और संस्थागत भूमिका।पहले दौर में आंदोलन की जरूरत थी. दूसरे दौर में प्रबंधन की जरूरत है. इसीलिए एक तरफ महेश भागचंदका जैसे कारोबारी और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति को जिम्मेदारी दी गई है, तो दूसरी तरफ रिटायर्ड एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा को CEO बनाया गया है। साथ ही मदन मोहन पांडे जैसे कानूनी अनुभव वाले व्यक्ति और डॉ. निर्मला यादव जैसी शिक्षाविद को ट्रस्ट में जगह मिली है. यानी कुल नई टीम देखी जाए तो यह तस्वीर बताती है कि ट्रस्ट का नया ढांचा अलग-अलग क्षेत्रों के अनुभव को जोड़ने की कोशिश कर रहा है। 2027 के चुनाव से जोड़ना कितना सही?: अब सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या जिन-जिन लोगों को जिम्मेदारी दी गई है. उसका असर 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव पर पड़ेगा? तो इसका सीधा जवाब है ही नहीं. राम मंदिर निश्चित रूप से उत्तर प्रदेश और राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा मुद्दा रहा है. लेकिन किसी ट्रस्ट की नियुक्ति सीधे चुनावी रणनीति को प्रभावित करेगी यह कहना मुश्किल है. हां, इतना जरूर है कि अयोध्या का महत्व मंदिर निर्माण के साथ खत्म नहीं हुआ है. बल्कि अब अयोध्या का अगला अध्याय शुरू हुआ है. और जिसका प्रभाव किस रूप में लोगों तक पहुंचेगा यह समय बताएगा. अभी ट्रंस्ट के सामने मंदिर का संचालन कैसा होगा? ट्रस्ट कितना पारदर्शी रहेगा? श्रद्धालुओं की सुविधाएं कैसे बढ़ेंगी? मंदिर से जुड़ी संस्थागत और सामाजिक गतिविधियां किस तरह आगे बढ़ेंगी? यह है. इसके साथ ही अयोध्या की छवि और उसके राजनीतिक-सांस्कृतिक प्रभाव को तय कुछ हो सकेंगे.
असली कहानी महेश से आगे की है
महेश भागचंदका की नियुक्ति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें अतीत और भविष्य दोनों दिखाई देते हैं. अतीत में अशोक सिंघल हैं. राम जन्मभूमि आंदोलन है. मंदिर निर्माण का संघर्ष है. वर्तमान में राम मंदिर है. ट्रस्ट है. प्रशासनिक बदलाव है. CEO है. नई टीम है. और भविष्य में अयोध्या का वह स्वरूप है, जो अभी पूरी तरह दुनिया के सामने नहीं आया है. इसलिए भागचन्दका की एंट्री को सिर्फ एक नियुक्ति के तौर पर देखना शायद कम होगा. यह उस लंबी यात्रा की एक कड़ी है, जिसमें आंदोलन की विरासत अब संस्था के भीतर जगह बना रही है. कुल मिलाकर राम मंदिर आंदोलन ने जिस विरासत को जन्म दिया, मंदिर निर्माण ने उसे एक स्थायी संस्था में बदल दिया. अब उस संस्था को कैसे चलाया जाता है, उसका प्रभाव कितना व्यापक होता है और अयोध्या की कहानी किस दिशा में जाती है? 'राम मंदिर 2.0' का असली सवाल है. महेश भागचन्दका की एंट्री इसी बदलाव की एक कड़ी है. अशोक सिंघल की विरासत से जुड़े व्यक्ति को मंदिर ट्रस्ट के वित्तीय प्रबंधन की जिम्मेदारी मिलना निश्चित रूप से प्रतीकात्मक महत्व रखता है. लेकिन अंतिम अर्थ समय ही तय करेगा. राम का काज जारी है. फर्क सिर्फ इतना है कि आंदोलन के उस दौर की सड़क अब संस्था की चौखट तक पहुंच चुकी है। लेकिन क्या इसके साथ उस आंदोलन की कहानी भी खत्म हो गई? शायद नहीं. राम मंदिर का काम आगे बढ़ा, लेकिन इसी बीच मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी का मामला सामने आया. जांच आगे बढ़ी और जून 2026 में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा ने इस्तीफा दे दिया. इसके बाद ट्रस्ट में बदलाव की जरूरत महसूस हुई और 2 सितंबर 2026 को अयोध्या में हुई बैठक में नई टीम का ऐलान किया गया. इस नई व्यवस्था में पहली बार ट्रस्ट का CEO बनाया गया. रिटायर्ड एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा को यह जिम्मेदारी मिली. तीन नए ट्रस्टी भी आए. जिसमें दिल्ली के कारोबारी महेश भागचंदका, अयोध्या के सीनियर वकील मदन मोहन पांडे और शिकोहाबाद की डॉ. निर्मला यादव. इसी बदलाव में महेश भागचंदका को ट्रस्ट का नया कोषाध्यक्ष बनाया गया और स्वामी गोविंद देव गिरि को महासचिव की जिम्मेदारी दी गई. दरअसल, मंदिर बनने के बाद और चोरी विवाद के बाद अब माना जा रहा है कि एक नए दौर की शुरुआत हुई है. इसे 'राम मंदिर 2.0' कहा जाए तो यह उस बदलाव को समझने का एक तरीका
महेश भागचंदका कौन हैं?: सबसे पहले जानते हैं कि आखिर कौन हैं महेश भागचंदका? महेश भागचंदका दिल्ली के कारोबारी और समाजसेवी हैं. वह M2K Group के चेयरमैन हैं. 2 सितंबर को उन्हें श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का नया सदस्य बनाने के साथ कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई है. लेकिन उनकी पहचान सिर्फ कारोबारी के तौर पर नहीं है. उनकी सबसे अहम पहचान राम जन्मभूमि आंदोलन के बड़े चेहरे रहे अशोक सिंघल से जुड़ाव की है. मीडिया रिपोर्ट की माने तो भागचन्दका अशोक सिंघल के रिश्तेदार हैं. और यही पहचान उनकी नियुक्ति को बाकी दो नए ट्रस्टियों से अलग बनाता है. इसके पीछे वजह भी बहुत साप है।
अशोक सिंघल से कितना गहरा रिश्ता?:
महेश भागचंदका का नाम जिस अशोक सिंघल के साथ जोड़ा जा रहा है. वह अशोक सिंघल कोई आम नहीं है।राम जन्मभूमि आंदोलन के सबसे प्रमुख चेहरों में रहे। विश्व हिंदू परिषद के शीर्ष नेतृत्व में रहते हुए उन्होंने अयोध्या आंदोलन को देशव्यापी स्तर पर आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अब बात अगर महेश भागचंदका की करे तो वह सिर्फ इस विरासत से केवल रिश्तेदारी के जरिए ही नहीं जुड़े हैं. वह अशोक सिंघल फाउंडेशन से भी जुड़े रहे हैं. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक वह फाउंडेशन के फाउंडर-ट्रस्टी हैं और अशोक सिंघल पर लिखी पुस्तक के लेखक भी हैं. यही नहीं, राम जन्मभूमि मंदिर से जुड़े महत्वपूर्ण पड़ावों पर भी उनकी मौजूदगी रही है. इसलिए राम मंदिर ट्रस्ट में उनकी एंट्री को सिर्फ एक कारोबारी व्यक्ति के तौर पर नियुक्ति हुई है. यह देखना पूरी तस्वीर देखना नहीं होगा. यहां एक लंबी यात्रा दिखाई देती है- अशोक सिंघल से राम जन्मभूमि आंदोलन तक, आंदोलन से मंदिर निर्माण तक और मंदिर निर्माण से अब उसके संस्थागत प्रबंधन तक।आंदोलन से प्रबंधन तक बदल गया दौर
राम जन्मभूमि आंदोलन के समय सबसे बड़ा सवाल था. अयोध्या में राम मंदिर बनेगा या नहीं? उस दौर में आंदोलन था, यात्राएं थीं, सभाएं थीं, संतों की लामबंदी थी और लंबी कानूनी लड़ाई थी. अशोक सिंघल जैसे चेहरे इस पूरे आंदोलन की पहचान बन गए थे. लेकिन अब सवाल बदल चुका है. राम मंदिर बन चुका है. रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा हो चुकी है. अब चुनौती मंदिर निर्माण की नहीं, बल्कि मंदिर और उससे जुड़े पूरे तंत्र को व्यवस्थित तरीके से चलाने की है. यही वजह है कि ट्रस्ट में पहली बार CEO की नियुक्ति को महत्वपूर्ण माना जा रहा है. रिटायर्ड एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा को ट्रस्ट का पहला CEO बनाया गया है. CEO पद के लिए 5,585 आवेदन आए थे. चयन प्रक्रिया के बाद तीन नामों को आगे बढ़ाया गया और आखिर में जितेंद्र मिश्रा के नाम पर मुहर लगी. यानी ट्रस्ट अब सिर्फ धार्मिक और आध्यात्मिक नेतृत्व के भरोसे नहीं, बल्कि प्रशासनिक विशेषज्ञता को भी अपनी व्यवस्था में जगह दे रहा है.
दान विवाद के बाद क्यों हुआ बदलाव?
ट्रस्ट में यह बदलाव ऐसे समय हुआ है जब मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी का मामला सामने आ चुका था. नकद दान की कथित चोरी के मामले में आठ लोगों की गिरफ्तारी भी हुई थी. इसके बाद ट्रस्ट के प्रशासनिक ढांचे में बदलाव की प्रक्रिया तेज हुई. इसी दौरान चंपत राय और अनिल मिश्रा ने अपने पदों से इस्तीफा दिया. हालांकि बाद में सामने आई जांच रिपोर्ट में चंपत राय और अनिल मिश्रा के खिलाफ आरोपों की पुष्टि नहीं हुई. एसआईटी की अंतिम रिपोर्ट में दोनों के नाम नहीं थे और दोनों को क्लीन चिट मिली थी. विवाद के बाद ट्रस्ट के प्रशासनिक ढांचे में बड़ा फेरबदल हुआ और नई जिम्मेदारियां तय की गईं.
कोषाध्यक्ष की कुर्सी और भागचन्दका
जिसमें महेश भागचंदका को ट्रस्ट में सिर्फ सदस्य नहीं बनाया गया. जबकि कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई. यह पद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मंदिर ट्रस्ट का काम सिर्फ पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है. मंदिर निर्माण, श्रद्धालु सुविधाएं, दान और वित्तीय प्रबंधन जैसे बड़े काम इसके दायरे में आते हैं. ट्रस्ट ने इसी बैठक में वित्तीय वर्ष 2025-26 के खातों को भी मंजूरी दी है. साथ ही प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव किए गए. ऐसे समय में एक कारोबारी और समाजसेवी को कोषाध्यक्ष बनाना यह संकेत देता है कि ट्रस्ट वित्तीय और प्रशासनिक कामकाज में अलग तरह की विशेषज्ञता का इस्तेमाल करना चाहता है. लेकिन इसे किसी राजनीतिक दल की सीधी रणनीति कहना अभी उचित नहीं होगा.
फिर भी सियासी मायने क्या हैं?: असल में महेश भागचंदका की नियुक्ति का सीधा राजनीतिक अर्थ जोड़ना ठीक नहीं है, लेकिन राजनीति केवल चुनावी टिकट और सीटों का खेल नहीं होती. राजनीति में प्रतीकों की भी बड़ी भूमिका होती है. अशोक सिंघल राम मंदिर आंदोलन के सबसे बड़े चेहरों में रहे. अब उनकी विरासत से जुड़े व्यक्ति को उसी राम मंदिर की संस्था में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिलती है. यह अपने आप में एक मजबूत प्रतीक है. जिस आंदोलन का एक बड़ा चेहरा अशोक सिंघल थे, उसकी मंजिल राम मंदिर निर्माण तक पहुंची. अब उसी मंदिर की संस्था में सिंघल की विरासत से जुड़े व्यक्ति को वित्तीय जिम्मेदारी मिलना एक तरह की संस्थागत निरंतरता के रूप में देखा जा सकता है।
#Ayodha #श्रीराममंदिर #VHP
दुनियाभर के घुमक्कड़ पत्रकारों का एक मंच है,आप विश्व की तमाम घटनाओं को कवरेज करने वाले खबरनवीसों के अनुभव को पढ़ सकेंगे
https://www.roamingjournalist.com/