नई दिल्ली। काशी में राजभाषा को समर्पित साहित्यकार यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी और देश के जाने-माने न्यूरोलॉजिस्ट प्रोफेसर डॉ. विजय नाथ मिश्र को उनकी कृति दंडपाणि च भैरवं के हिंदी में मौलिक लेखन के लिए राजभाषा गौरव पुरस्कार के लिए चयन किया गया है। विदित हो कि 14, सितंबर को मुंबई हिंदी दिवस समारोह एवं छठे अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन - 2026 के दौरान राजभाषा पुरस्कार प्रदान किये जाएंगे ।
उनकी यह पुस्तक भारत की संस्कृति परंपरा और मूल्यों को उजागर करती है। सृष्टि के आदि काल से मौन जहाँ तपस्यारत है । शब्द के रूप में नाद जहाँ जन्म लेकर पनपते हैं स्वयं अपने भगवान् शिव के लिए । यहीं पर स्वयंभू शिव हर युग में देह और प्राण को सायुज्य प्रदान करते हैं । इस काशी ने एक कालातीत सफर तय किया है, उस युग के कल से लेकर इस युग के आज तक का सफर । दण्डपाणि च भैरवम् हमारे भगवान् और भारतीय सभ्यता की परत दर परत संक्षिप्त कथा है । आनन्दकानन के इस इतिहासगाथा का विवरण जगह- जगह टूटे और बिखरे हुए अक्षरों में मिलता है, जिसे लेखक द्वय यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी और डॉ. विजय नाथ मिश्र ने चुन-चुन कर एकत्रित किया है।
डॉ. विजय नाथ मिश्र बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के चिकित्सा विज्ञान संस्थान में न्यूरोलॉजी विभाग के प्रोफेसर और पूर्व विभागाध्यक्ष, सर सुंदरलाल चिकित्सालय, बीएचयू के पूर्व चिकित्सा अधीक्षक हैं। पिछले तीस वर्षों से न्यूरोलॉजी के क्षेत्र में सक्रिय प्रोफेसर मिश्र को मिर्गी मरीजों के प्रति समर्पित होने के कारण उत्तर भारत की हिन्दी पट्टी में ‘मिर्गी मैन’ के रूप में जाना जाता है। प्रोफेसर मिश्र की एक महत्त्वपूर्ण रचना "रामचरित मानस की पांडुलिपियाँ (ज्ञात-अज्ञात तथ्य)" पूरे देश में चर्चा का विषय रही है, जिसे हिन्दुस्तानी एकेडमी, इलाहाबाद द्वारा 'तुलसीदास पुरस्कार' से सम्मानित किया गया था। प्रो. (डॉ.) विजय नाथ मिश्र गोस्वामी तुलसीदास जी की तपस्थली काशी के तुलसी घाट स्थित परम्परा और विरासत के साथ ही अनके द्वारा स्थापित संकटमोचन मंदिर के शिवसायुज्य प्राप्त महन्त, महान् वैज्ञानिक और पर्यावरणविद् प्रोफेसर वीरभद्र मिश्र के पुत्र हैैं। काशिका सम्पदा में गहरी रूचि रखने वाले प्रोफेसर मिश्र वाराणसी में गंगा में बढ़ते प्रदूषण पर शोध करने के लिए स्वच्छ गंगा अनुसंधान प्रयोगशाला में जो शामिल हुए आजतक उसमें विभिन्न आयामोें के साथ सन्नद्ध हैैं। गंगा के तट पर चलते हैैं, तो वह काशी का अंतरराष्ट्रीय काशी घाट वाक् विश्वविद्यालय बन जाता है। काशिका इसे एक चिकित्सक की ओपेन ओपीडी कहती है। प्रतिदिन नियमित काशी की गलियों में घूमना, मंदिरों की ड्योढ़ी चढ़ना, चौरासी घाटों पर विचरण करना इनकी जीवनशैली और दिनचर्या का हिस्सा है। घाटों पर रहने वाले घाटियों, मछुआरों, डोम, पंडितों आदि के प्रति खोजी विचारधारा रहती है। इन घाटों पर रहने वाले भिक्षुक, निराश्रितों के लिए प्रोफेसर मिश्र एक महत्वपूर्ण धारा है।
यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी का साहित्य केवल शब्दों का संकलन नहीं, बल्कि भारत की सनातन ऋषि-परंपरा, इतिहास और आधुनिक समाजशास्त्र का एक जीवंत दस्तावेज़ है। भारतीय साहित्य, वैदिक परंपरा और प्राचीन इतिहास के सशक्त हस्ताक्षर हैं। वर्तमान में आप पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय (भारत सरकार) की हिन्दी सलाहकार समिति के सदस्य हैं। प्राचीन शास्त्रीय चेतना और आधुनिक साहित्यिक विमर्शों के इस अद्भुत संगम ने आपकी लेखनी को एक कालजयी पहचान दी है। भारतीय ज्ञान-परंपरा और राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान अतुलनीय रहा है। आप भारत सरकार के केन्द्रीय युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय, संस्कृति मंत्रालय, नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय, वित्त मंत्रालय (राजस्व) तथा नागर विमानन मंत्रालय जैसे कई प्रमुख मंत्रालयों की हिन्दी सलाहकार समितियों में राजपत्रित सदस्य रह चुके हैं। अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE), शिक्षा मंत्रालय (भारत सरकार) की 'तकनीकी पाठ्य पुस्तक पुरस्कार योजना' तथा 'भारतीय विद्या सार' की उच्चस्तरीय मूल्यांकन समिति के विशेषज्ञ सदस्य रह चुके हैं। डॉ. भीमराव आंबेडकर मुक्त विश्वविद्यालय (अहमदाबाद, गुजरात) के स्नातक (B.A.) एवं स्नातकोत्तर (M.A.) स्तर के हिन्दी साहित्य, नाट्य, एकांकी तथा आधुनिक विमर्शों (किन्नर व वृद्ध विमर्श) हेतु स्वाध्याय सामग्री का लेखन कर चुके हैं। संस्कृति मंत्रालय द्वारा पूर्व में शोध क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य हेतु वरिष्ठ अध्येतावृत्ति एवार्ड हासिल कर चुके हैं।
दुनियाभर के घुमक्कड़ पत्रकारों का एक मंच है,आप विश्व की तमाम घटनाओं को कवरेज करने वाले खबरनवीसों के अनुभव को पढ़ सकेंगे
https://www.roamingjournalist.com/