आचार्य संजय तिवारी
हरतालिका तीज का व्रत सनातन संस्कृति में सबसे बड़ा व्रत तप माना जाता है। यह तीज का त्यौहार भादो की शुक्ल तीज को मनाया जाता है। यह आमतौर पर अगस्त-सितम्बर महीने में ही आती है। इसे गौरी तृतीया व्रत भी कहते हैं। यह वस्तुतः अखंड अहिवात के लिए किया जाने वाला सबसे बड़ा प्रकृति पर्व है जिसमे तप महत्वपूर्ण है। आज यह तप पर्व मनाया जा रहा है।
हरियाली तीज, कजरी तीज और करवा चौथ की तरह ही हरतालिका तीज भी सुहागिनों का व्रत होता है। इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए व्रत रखती हैं और भगवान शिव और पार्वती से सदा सुहागन का आर्शीवाद मांगती हैं. इस व्रत को निराहार और निर्जला रखा जाता है। मान्यता है कि इस व्रत को सबसे पहले माता पार्वती ने भगवान शंकर को प्राप्त करने के लिए किया था। इसलिए यह कहा जाता है कि माता पार्वती की तरह अच्छा वर प्राप्त करने के लिए कुंवारी कन्याएं भी इस व्रत को रख सकती हैं।
हरतालिका तीज खासतौर पर महिलाओं द्बारा यह त्यौहार मनाया जाता हैं। कम उम्र की लड़कियों के लिए भी यह हरतालिका का व्रत श्रेष्ठ समझा गया है। हरतालिका तीज में भगवान शिव, माता गौरी एवम गणेश जी की पूजा का महत्व है। यह व्रत निराहार एवं निर्जला किया जाता है और रत जगा कर नाच गाने के साथ इस व्रत को किया जाता है।
अलियों ने जब हर लिया गौरी को
माता गौरी के पार्वती रूप में वे शिव जी को पति रूप में चाहती थी जिस के लिए उन्होंने कठिन तपस्या की थी उस वक्त पार्वती की सहेलियों ने उन्हें अगवा कर लिया था। इस करण इस व्रत को हरतालिका कहा गया हैं क्यूंकि हरत मतलब अगवा करना एवम आलिका मतलब सहेली अर्थात सहेलियों द्बारा अपहरण करना हरतालिका कहलाता हैं।
व्रत से जुड़ी कई मान्यताएं
हरतालिका व्रत से जुड़ी कई मान्यता हैं, जिनमें इस व्रत के दौरान जो सोती हैं, वो अगले जन्म में अजगर बनती हैं, जो दूध पीती हैं, वो सर्पिनी बनती हैं, जो व्रत नहीं करतीं वो विधवा बनती हैं, जो शक्कर खाती हैं मक्खी बनती हैं, जो मांस खाती हैं वो शेरनी बनती हैं, जो जल पीती हैं वो मछली बनती हैं, जो अन्न खाती हैं वो सुअरी बनती हैं जो फल खाती हैं वो बकरी बनती हैं।
हरतालिका तीज नियम
हरतालिका व्रत निर्जला किया जाता हैं, अर्थात पूरा दिन एवं रात अगले सूर्योदय तक जल ग्रहण नहीं किया जाता।
हरतालिका व्रत कुवांरी कन्या, सौभाग्यवती महिलाओं द्बारा किया जाता है। इसे विधवा महिलायें भी कर सकती हैं।
हरतालिका व्रत का नियम हैं कि इसे एक बार प्रारंभ करने के बाद छोड़ा नहीं जा सकता। इसे प्रति वर्ष पूरे नियमों के साथ किया जाता है।
हरतालिका व्रत के दिन रतजगा किया जाता है। पूरी रात महिलायें एकत्र होकर नाच गाना एवम भजन करती हैं। नये वस्त्र पहनकर पूरा श्रृंगार करती हैं।
हरतालिका व्रत जिस घर में भी होता हैं, वहां इस पूजा का खंडन नहीं किया जा सकता अर्थात इसे एक परम्परा के रूप में प्रति वर्ष किया जाता हैं।
हरतालिका तीज पूजन विधि
हरतालिका पूजन प्रदोष काल में किया जाता हैं। प्रदोष काल अर्थात दिन रात के मिलने का समय।
हरतालिका पूजन के लिए शिव, पार्वती एवं गणेश जी की प्रतिमा बालू रेत अथवा काली मिटटी से हाथों से बनाई जाती हैं।
फुलेरा बनाकर उसे सजाया जाता हैं। उसके भीतर रंगोली डालकर उस पर पटा अथवा चौकी रखी जाती हैं। चौकी पर एक सातिया बनाकर उस पर थाल रखते हैं, उस थाल में केले के पत्ते को रखते हैं।
तीनो प्रतिमा को केले के पत्ते पर आसीत किया जाता हैं।
सर्वप्रथम कलश बनाया जाता हैं जिसमे एक लौटा अथवा घड़ा लेते हैं। उसके उपर श्रीफल रखते हैं अथवा एक दीपक जलाकर रखते हैं। घड़े के मुंह पर लाल नाडा बांधते हैं। घड़े पर सातिया बनाकर उर पर अक्षत चढ़ाया जाता हैं।
कलश का पूजन किया जाता हैं। सबसे पहले जल चढ़ाते हैं, नाडा बांधते हैं और कुमकुम, हल्दी चावल चढ़ाते हैं फिर पुष्प चढ़ाते हैं।
कलश के बाद गणेश जी की पूजा की जाती हैं।उसके बाद शिव जी की पूजा जी जाती हैं। उसके बाद माता गौरी की पूजा की जाती हैं। उन्हें सम्पूर्ण श्रृंगार चढ़ाया जाता हैं।
इसके बाद हरतालिका की कथा पढ़ी जाती हैं। फिर सभी मिलकर आरती की जाती हैं जिसमे सर्प्रथम गणेश जी की आरती फिर शिव जी की आरती फिर माता गौरी की आरती की जाती हैं।
पूजा के बाद भगवान् की परिक्रमा की जाती हैं।
रात भर जागकर पांच पूजा एवं आरती की जाती हैं।
सुबह आखरी पूजा के बाद माता गौरा को जो सिंदूर चढ़ाया जाता हैं, उस सिंदूर से सुहागन स्त्री सुहाग लेती हैं।
ककड़ी एवं हलवे का भोग लगाया जाता हैं। उसी ककड़ी को खाकर उपवास तोड़ा जाता हैं।
अंत में सभी सामग्री को एकत्र कर पवित्र नदी एवं कुण्ड में विसर्जित किया जाता हैं।
पूजन समाग्री
फुलेरा विशेष प्रकार से फूलों से सजा होता
गीली काली मिटटी अथवा बालू रेत
केले का पत्ता
सभी प्रकार के फल एवं फूल पत्ते
बैल पत्र, शमी पत्र, धतूरे का फल एवं फूल, अकाँव का फूल, तुलसी, मंजरी
जनैव, नाडा, वस्त्र, माता गौरी के लिए पूरा सुहाग का सामान जिसमे चूड़ी, बिछिया, काजल, बिंदी, कुमकुम, सिंदूर, कंघी, माहौर, मेहँदी आदि मान्यतानुसार एकत्र की जाती हैं। इसके अलावा बाजारों में सुहाग पुड़ा मिलता हैं जिसमे सभी सामग्री होती हैं।
घी, तेल, दीपक, कपूर, कुमकुम, सिंदूर, अबीर, चन्दन, श्री फल, कलश।
अमृत- घी, दही, शक्कर, दूध, शहद ।
हरतालिका तीज व्रत कथा
शिव जी ने माता पार्वती को विस्तार से इस व्रत का महत्व समझाया है । माता गौरा ने सती होने के बाद हिमालय के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया। बचपन से ही पार्वती भगवान शिव को वर के रूप में चाहती थी, जिसके लिए पार्वती जी ने कठोर तप किया। उन्होंने कड़कती ठण्ड में पानी में खड़े रहकर, गर्मी में यज्ञ के सामने बैठकर यज्ञ किया। बारिश में जल में रहकर कठोर तपस्या भी की। बारह वर्षों तक निराहार पत्तों को खाकर पार्वती जी ने व्रत किया। उनकी इस निष्ठा से प्रभावित होकर भगवान् विष्णु ने हिमालय से पार्वती जी का हाथ विवाह हेतु मांगा। जिससे हिमालय बहुत प्रसन्न हुए और पार्वती को विवाह की बात बताई, जिससे पार्वती दुखी हो गईं और अपनी व्यथा सखी से कही और जीवन त्याग देने की बात कहने लगी। जिस पर सखी ने कहा यह वक्त ऐसी सोच का नहीं हैं और सखी पार्वती को हरकर वन में ले गई। जहां पार्वती ने छिपकर तपस्या की। जहां पार्वती को शिव ने आशीवाद दिया और पति रूप में मिलने का वर दिया। हिमालय ने बहुत खोजा पर पार्वती ना मिली। बहुत वक्त बाद जब पार्वती मिली तब हिमालय ने इस दु:ख एवं तपस्या का कारण पूछा तब पार्वती ने अपने दिल की बात पिता से कही, इसके बाद पुत्री हठ के करण पिता हिमालय ने पार्वती का विवाह शिव जी से तय किया। इस प्रकार से सती अर्थात पारवती जी को शिव जी पुनः सुहाग के रूप में प्राप्त हुए।
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