मंदिर के सामने डीजे बजाने के विवाद से कैसे नेपाल में भड़की सांप्रदायिक हिंसा
अशोक झा/ नेपाल बोर्डर : नेपाल में बिगड़ती स्थिति को देखते हुए प्रशासन ने प्रभावित इलाकों में अनिश्चितकालीन कर्फ्यू लगा दिया है। कर्फ्यू के चलते क्षेत्र में सभी शैक्षणिक परीक्षाएं रद्द कर दी गई हैं, वहीं भारत-नेपाल सीमा से सटे इलाकों में ट्रेन और बसों की आवाजाही पूरी तरह ठप हो गई है। सबसे ज्यादा प्रभाव सीमावर्ती जिलों में देखा जा रहा है। हिंसा की आग नो मेंस लैंड तक पहुंची है। एसएसबी को सतर्क किया गया है।
सुनसरी से जनकपुर तक दंगे का खौफनाक असर:
हिंसा का सबसे विकराल रूप सुनसरी, सरलाही, जनकपुर और धनुषा जिलों में देखने को मिल रहा है। शुरुआत में स्थानीय स्तर पर उपजे इस विवाद को संभालने में नेपाल प्रशासन नाकाम साबित हुआ, जिसके बाद हालात बेकाबू होते चले गए। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए प्रधानमंत्री बालेन शाह ने काठमांडू में तत्काल सर्वदलीय बैठक बुलाई है। हिंसा पर काबू पाने और शांति बहाल करने के मकसद से सरकार ने गृह मंत्री सुदान गुरुंग को प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर रहे है। जगह-जगह कर्फ्यू लगा है, लेकिन जनता का गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा है। ये बवाल 1 हफ्ते तक खिंच चुका है और अब नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह और गृह मंत्री सुदान गुरुंग की शामत आ गई है।इस पूरे बवाल की शुरुआत 15 साल के मासूम गणेश यादव के हत्याकांड से हुई थी।
कौन था 15 साल का गणेश यादव?: गणेश यादव नेपाल के औराही रूरल म्युनिसिपैलिटी-2 का रहने वाला महज 15 साल का एक सीधा-साधा लड़का था। सुनसरी जिले से शुरू हुए सांप्रदायिक तनाव के बाद जब हिंसा की लपटें सिराहा के गोलबाजार तक पहुंचीं तो वहां भड़के विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस और भीड़ के बीच तीखी झड़प हो गई। इसी झड़प में गोली लगने से 15 साल के गणेश यादव की मौत हो गई।
एक मासूम बच्चे की इस तरह जान चले जाने के बाद स्थानीय लोगों और रिश्तेदारों का सब्र पूरी तरह टूट गया। गणेश की मौत के बाद से ही पूरे इलाके में शोक और गुस्से की लहर दौड़ गई। लोग इंसाफ की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आए और सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।
गृह मंत्री को रोक लिया, बनिनिया चौक बना अखाड़ा!
गणेश यादव की हत्या के बाद लोगों का गुस्सा इस कदर भड़का कि गृह मंत्री सुदान गुरुंग के लिए भी स्थितियां संभालना मुश्किल हो गया। नेपाल न्यूज के मुताबिक, जब पीड़ित परिवार को ये खबर मिली कि गृह मंत्री सुदान गुरुंग धनुषा जिले में स्थित गणेश के दुखी परिवार से मिलने आ रहे हैं तो स्थानीय लोग भड़क उठे। हजारों की संख्या में लोग धनुषा के बनिनिया चौक पर इकट्ठा हो गए और गृह मंत्री का रास्ता रोक दिया। हाथों में तख्तियां और दिल में आक्रोश लिए प्रदर्शनकारियों ने साफ चेतावनी दे दी कि जब तक गणेश यादव को इंसाफ नहीं मिलता और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई नहीं होती, तब तक वो गृह मंत्री सुदान गुरुंग को इस इलाके में कदम भी नहीं रखने देंगे। बालेन शाह सरकार और गृह मंत्री के खिलाफ जमकर नारेबाजी हुई और हालात इतने नाजुक हो गए कि सुरक्षाकर्मियों के पसीने छूट गए।
सुनसरी से शुरू हुआ दंगा, 4 जिलों में लगा कर्फ्यू:
'द काठमांडू पोस्ट' के मुताबिक, ये पूरा विवाद सुनसरी जिले में दो समुदायों के बीच हुए आपसी झगड़े से शुरू हुआ था, जिसने देखते ही देखते उग्र रूप ले लिया. सबसे पहले सुनसरी के दीवानगंज में 24 साल के ओम प्रकाश मेहता की गोली मारकर हत्या कर दी गई. इस हिंसा की आग धीरे-धीरे तराई के अन्य जिलों तक फैल गई। रविवार की घटना में गंभीर रूप से घायल हुए 20 साल के जया प्रकाश मेहता ने भी विराटनगर के न्यूरो अस्पताल में इलाज के दौरान दम तोड़ दिया।ओम प्रकाश, जया प्रकाश और गणेश यादव की मौत के बाद हालात इतने भयावह हो गए कि प्रशासन ने तुरंत हरकत में आते हुए चार जिलों, सुनसरी, सप्तरी, सिराहा और धनुषा में अनिश्चितकालीन कर्फ्यू का ऐलान कर दिया। अशांति को रोकने के लिए नेपाल पुलिस, आर्म्ड पुलिस फोर्स और नेपाली आर्मी की भारी टुकड़ियों को जमीन पर उतार दिया गया है।
जनकपुरधाम में सेना को 'लाइव एम्युनिशन' के इस्तेमाल की छूट!: हिंसा की ये आंच मधेश प्रदेश की प्रांतीय राजधानी जनकपुर तक पहुंच चुकी है। जनकपुरधाम में प्रदर्शनकारियों ने बाजार पूरी तरह बंद करवा दिए और पुलिस के साथ जगह-जगह हिंसक झड़पें हुईं. स्थिति को बेकाबू होते देख चीफ डिस्ट्रिक्ट ऑफिसर प्रेम प्रसाद लुइटेल ने जनकपुरधाम सब-मेट्रोपॉलिटन सिटी के सभी वार्डों में अनिश्चितकालीन कर्फ्यू लागू कर दिया।
प्रशासन ने स्पष्ट सीमा तय करते हुए उत्तर में लक्ष्मीनिया से दक्षिण में नागरैन तक और पूर्व में बेलौनी रोड से पश्चिम में सिनुरजोड़ा और दूधमती ब्रिज तक पूरी तरह पाबंदी लगा दी है। सबसे बड़ा कदम ये उठाया गया है कि जिला प्रशासन ने नेपाली सेना को कर्फ्यू का सख्ती से पालन कराने के लिए जरूरत पड़ने पर 'लाइव एम्युनिशन' यानी असली गोलियों का इस्तेमाल करने तक की छूट दे दी है, हालांकि उन्हें केवल न्यूनतम आवश्यक बल प्रयोग करने के निर्देश दिए गए हैं।अगर नेपाल के पिछले तीन-चार दशकों के इतिहास पर नजर डालें, तो साफ दिखता है कि नेपाल में हिंसा की ये कहानी कोई नई नहीं है. हर युग में, लगभग हर सरकार के दौर में नेपाल ने भयंकर हिंसक दौर देखे हैं।1990 का जनांदोलन : लोकतंत्र की बहाली के लिए हुए इस आंदोलन में जनता और शाही सेना के बीच भयंकर खूनी संघर्ष हुआ था, जिसके बाद राजा बीरेंद्र को संवैधानिक राजतंत्र की बात माननी पड़ी थी। माओवादी गृहयुद्ध : ये नेपाल के इतिहास का सबसे काला दौर था. माओवादी विद्रोहियों और सरकारी सेना के बीच चले 10 साल लंबे गृहयुद्ध में करीब 13,000 बेगुनाह लोगों ने अपनी जान गंवाई और लाखों लोग बेघर हो गए। 2006 का दूसरा जनांदोलन: राजा ज्ञानेंद्र के प्रत्यक्ष शासन के खिलाफ हुए इस विशाल जनआंदोलन में भारी हिंसा हुई, जिसके बाद आखिरकार नेपाल से राजशाही का हमेशा के लिए खात्मा हो गया। 2015 का मधेस आंदोलन: नए संविधान के विरोध में भारत सीमा से सटे तराई इलाके में महीनों तक हिंसक प्रदर्शन और नाकेबंदी चली, जिसने देश को तोड़कर रख दिया.
2025 का 'Gen Z' आंदोलन: पिछले साल ही भ्रष्टाचार के खिलाफ भड़के युवाओं के आंदोलन ने हिंसक रूप ले लिया था. सरकारी इमारतों में आगजनी हुई, भारी पुलिस कार्रवाई हुई और आखिर में तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था.क्या कभी शांत हो पाएगा नेपाल?: 2025 में 'Gen Z' विरोध प्रदर्शनों के बाद सत्ता में आए नए प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वो नेपाल को इस पुराने हिंसक चक्रव्यूह से कैसे बाहर निकालें. तराई में भड़की मौजूदा सांप्रदायिक हिंसा केवल दो समूहों की आपसी लड़ाई नहीं है, बल्कि ये नेपाल के उन गहरे घावों का नतीजा है जिनका इलाज आज तक नहीं किया गया है।नेपाल जब तक अपने इन 3 श्रापों यानी राजनीतिक कुर्सी का खेल, हिंसक विरोध की संस्कृति और क्षेत्रीय भेदभाव से निजात नहीं पाएगा, तब तक बुद्ध की जन्मभूमि कहे जाने वाले इस देश में शांति का सपना अधूरा ही रहेगा. भारत के लिए भी अपने पड़ोसी देश में यह अशांति चिंता का विषय है, क्योंकि दोनों देशों की सीमाएं खुली हैं और नेपाल की अस्थिरता का सीधा असर भारत के बॉर्डर इलाकों पर पड़ता है।
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