कहा, जब वेश बदलकर रामजन्मभूमि के मैदान में पहुंची, देखा सारा समाज साथ है
बंगाल की पावन भूमि पर खिलेगा वात्सल्य ग्राम की बगिया
आपको राष्ट्र कार्य के लिए स्वयं को करना होगा समर्पित, बच्चों को दे शिक्षा के साथ संस्कार
अशोक झा/ सिलीगुड़ी:
संतानों के मन में शिक्षा के साथ संस्कारों के बीज बोना चाहिए।वह इसलिए कि सिलसिला ये बाद मेरे यूँ ही चलना चाहिए मैं रहूं या ना रहूँ भारत ये रहना चाहिए। यह कहना है दीदी मां साध्वी ऋतम्भरा का। वह अपने तीन दिवसीय चिकननेक प्रवास के दौरान उत्तरबंग मारवाड़ी पैलेस में आशीर्वचन एवं प्रवचन के दौरान कही। यह कार्यक्रम परम शक्ति पीठ सेवा प्रकल्प और वात्सल्य सेवा केन्द्र, सिलीगुड़ी द्वारा आयोजित की गई थी। दीदी मां साध्वी ऋतम्भरा ने कहा कि यह गीत नहीं जीवन वह कड़वा सच है जिसे सभी को याद रखना चाहिए। यह देश भारत भूमि जिसे हजारों वर्षों तक सनातन विरोधियों ने कुचला,मसला तोड़ा मरोड़ा लेकिन खत्म नहीं कर पाए। क्योंकि उनके मन में भी था कि सिलसिला....। हमारे आराधिका मूर्तियां तोड़ी गई।आराधक को उसे खाने के लिए कहा गया। हजारों ने अपने इष्ट को लेकर कुएं और नदियों में छलांग लगा दिया। हजारों हमारी मातृ शक्तियों ने जौहर की। अपने अस्तित्व को बचाने के लिए आग में स्नान किया। पंजाब में गुरु पुत्रों को दिवाल में चुनवा दिया गया। बड़े भाई को ऐसा करते देख छोटा रोने लगा तो बड़े भाई ने कहा कि तू डरकर रो रहा है ठीक बात नहीं है? तो छोटे ने कहा कि हम डर से नहीं यह सोच कर रो रहे है कि अगर हम आपसे पहले पैदा होते तो यह सौभाग्य पहले हमे मिलता। ऐसे थे हमारे वीर स्वाधीनता सेनानी। साध्वी ऋतम्भरा ने कहा कि मैं आज सिलीगुड़ी और बंगाल के समाज को यह कहने आया हूं कि आप बच्चों को शिक्षा दे, व्यापार दे पर राष्ट्रभक्ति का संस्कार भी दें। ऐसा इसलिए कि सिलसिला ये बाद....।
साध्वी ऋतम्भरा ने कहा कि आज इस मंच से मेरे अयोध्या आंदोलन का जिक्र किया गया। राम मंदिर आंदोलन की प्रमुख चेहरा साध्वी ऋतंभरा ने कहा कि 500 साल के संघर्ष की यात्रा के बाद हमने ये पाया है कि हमारे रामलला मंदिर में विराजेंगे। मैं आपको बता दूं कि भारत के बहुत सारे ऐसे भी लोग रहे, जिन्होंने इस संकल्प की पूर्ति के लिए जूते नहीं पहने, पगड़ी नहीं पहनी।कुछ लोगों ने अन्य का त्याग किया। कई स्त्रियों ने बाल खोलकर रखे। उनका संकल्प था कि जब भगवान का मंदिर बनेगा, तो वे अपने संकल्प को तोड़ेंगे।
उन्होंने आगे कहा, 'ये हमारे लिए गर्व की बात है कि हमारी पीढ़ी को इस सौभाग्य को देखने का मौका मिल रहा है। पूरी दुनिया के सनातिनों को इसकी बधाई दी गई। उन्होंने आगे वो गीत भी सुनाया, जिसे वह अक्सर गाया करती थीं. रामलला का द्वारा, प्राणों से भी प्यारा, एक सभी की मंजिल, एक ही नाम , सभी का नारा- जय श्रीराम जय श्री राम।
आंदोलन की सच्ची घटना: दीदी मां साध्वी ऋतम्भरा ने कहा कि 90 की सच्ची घटना है जब भेष बदल कर मैं अयोध्या जा रही थी। मेरे आह्वान पर 50 हजार से ज्यादा बेटियों ने बाइक से अयोध्या कारसेवा के लिए कूच किया था। ट्रेन में मै लोगों की बात सुन रहा था। लोग कह रहे थे यह सब राजनीति है मंदिर नहीं बनने वाला।मैने भी उनकी हा में हा मिलना शुरू किया।इतने में पीछे से एक व्यक्ति चिल्लाया आप हिन्दू हो क्या.? मैने कहा कि हां मै हिंदू की बेटी हूं। उसने कहा कि अगर हिंदू हो तो जाकर साध्वी ऋतम्भरा को सुनो मानसिकता बदल जाएगी। मै स्वयं पर गौरवान्वित हो रही थी कि चलो समाज मुझे सुन रहा है। लखनऊ पहुंची तो भेष बदल भगवा पहनी बाहर निकली तो पुलिस वाले स्वागत के लिए खड़े थे। मै उन्हें चकमा देकर लखनऊ की गलियों में जय श्री राम के नारे लगाने लगी। देखा कि सभी गलियों से लोग निकलने लगे नारे लगाने लगे।मेरे कहने का अर्थ है कि मन में लगन सबकी है राष्ट्र सेवा करने की पर उसे नेतृत्व देने वाले का इंतजार रहता है।उसे आपको पूरा करना होगा। उन्होंने कहा कि कुछ स्थान अपने इतिहास और प्रमाण स्वयं प्रस्तुत करते हैं और इस्लाम जगत को उदारता दिखाते हुए ऐसे विवाद समाप्त करने चाहिए। साध्वी ऋतंभरा ने बंगाल का जिक्र करते हुए कहा कि इस पावन धरा जी शक्ति की भूमि है यहां हिंदुओं पर अत्याचार हुआ, लेकिन अंततः हिंदू समाज जागा और उसने अपनी मुक्ति का मार्ग स्वयं तय किया। आज बंगाल में सनातन का ध्वज फहरा रहा है जो आगे इतिहास लिखने वाला है। उन्होंने कहा कि आज इस प्रवचन में विधायक सांसद सहित कई जनप्रतिनिधि बैठे है। यह उस सनातन तेज का आभास कराता है।
वात्सल्य ग्राम बनाने की बात कही: दीदी मां साध्वी ऋतम्भरा ने कहा कि उत्तरबंग में वात्सल्य ग्राम बसाने का यहां के लोगों ने निर्णय लिया है। इससे अच्छी बात क्या हो सकती है।साध्वी ऋतंभरा ने कहा कि हम बालकों के मस्तक को चूमते हैं किंतु बुजुर्गों के चरणों को चूमते हैं। इसका कारण यह है उनके जीवन के अनुभवों को ग्रहण करना। उन्होंने कहा कि साहित्य समाज की अभिव्यक्ति है। लेखक अपने चिंतन से समाज की विसंगतियों को ही नहीं उठाता, उनका समाधान भी देता है। लोगों के नकारात्मक विचारों को सकारात्मक बनाने का चिंतन भी देता है। इसलिए फिर हम कहेंगे कि देश से है प्यार तो हर पल ये कहना चाहिए मैं रहूं या ना रहूँ, भारत ये रहना चाहिए।
देश से है प्यार तो हर पल ये कहना चाहिए मैं रहूँ या ना रहूँ, भारत ये रहना चाहिए ।
सिलसिला ये बाद मेरे यूँ ही चलना चाहिए मैं रहूं या ना रहूँ, भारत ये रहना चाहिए।
मेरी नस-नस तार कर दो और बना दो एक सितार राग भारत मुझपे छेड़ो, झन-झनाओ बार-बार।
देश से ये प्रेम आँखों से छलकना चाहिए मैं रहूँ या ना रहूँ, भारत ये रहना चाहिए।।शत्रु से कह दो ज़रा सीमा में रहना सीख ले ये मेरा भारत अमर है, सत्य कहना सीख ले भक्ति की इस शक्ति को बढ़कर दिखना चाहिए मैं रहूं या ना रहूँ, भारत ये रहना चाहिए। है मुझे सौगंध भारत (सौगंध भारत है मुझे) भूलूँ ना एक क्षण तुझे रक्त की हर बूँद तेरी, है तेरा अर्पण तुझे युद्ध ये सम्मान का है, मान रहना चाहिएमैं रहूँ या ना रहूँ, भारत ये रहना चाहिए।
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