आचार्य संजय तिवारी
कांग्रेस की वर्किंग कमेटी कुछ नया नहीं कर रही। जन्म से अब तक कांग्रेस तुष्टिकरण करती रही है। भारत और भारतीयता इसकी नस में नहीं। वंदेमातरम् इसको कभी भी रास नहीं आया। यह अलग बात है कि भारत की संसद से राष्ट्रगान घोषित किए जाने के बाद भी नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और खड़गे जी के साथ श्रीमती सोनिया गांधी समेत कांग्रेस पार्टी ने फिर से इसे सम्पूर्णता से गाने से इनकार कर दिया। स्वाधीन भारत की संसद का यह अपमान देश जरूर देख रहा है।
तथ्यों को समझने के लिए इतिहास में झाँकना जरूरी है ताकि प्रमाणित हो सके कि भारत और भारतीयता के तत्व कांग्रेस के लिए कितने महत्वहीन रहे हैं।
बंकिम बाबू का आनंद मठ 1882 में प्रकाशित हो गया। इसके दसवें वर्ष जब इस उपन्यास से लेकर वन्देमातरम गीत को कांग्रेस के मंच पर 1892 में कलकत्ता अधिवेशन में गाने की बात आई उसी समय इसका विरोध शुरू हो गया। यद्यपि वन्देमातरम उसी समय बंगाल में जन गीत बन चुका था किंतु कांग्रेस के कुछ नेताओं और मुसलमान प्रतिनिधियों को यह पसंद नहीं था। फिर 1905 से 1908 में बंगाल आंदोलन का दौर आया। वन्देमातरम इस आंदोलन का आधार गीत बन गया। अंग्रेजी हुकूमत ने इसका प्रभाव कम करने के लिए मुसलमानों को खूब उकसाया। बावजूद इसके 1906 में कलकत्ता के कांग्रेस अधिवेशन में इसे गाया गया। इसके बाद तो वंन्देमातरम गीत भारत ही भारत की स्वाधीनता का गान बन गया। इस गीत ने क्रांतिकारियों को अपार ऊर्जा दी। फांसी पर झूलने वाले हर बलिदानी ने इसे ही गाया ।
भारत की स्वाधीनता के बाद अब जबकि भारत की संसद ने इसे राष्ट्रगान का दर्जा देकर इसके लिए प्रोटोकॉल निर्धारित कर दिए हैं तब भारत के मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस की आज की वर्किंग कमेटी ने इसके संपूर्ण भाग को गाने से मना कर दिया है। समझ आता है, बात साफ़ है, मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए कांग्रेस ऐसा कर रही है। 1947 से पहले 'वंदे मातरम्' गीत का मुख्य विरोध ब्रिटिश शासन द्वारा और बाद में 1930 के दशक में मुस्लिम लीग व मोहम्मद अली जिन्ना द्वारा किया गया था। अंग्रेजों ने इसे गाने पर प्रतिबंध लगाया था, वहीं राजनीतिक मंचों पर इस पर विवाद 1937 में सबसे प्रमुख रूप से उभरा था।औपनिवेशिक शासन के दौरान इस गीत को गाने या 'आनंदमठ' उपन्यास को रखने पर अंग्रेजों द्वारा जेल भेजने की धमकी दी जाती थी, जो निरंतर जारी रहा। 1937 के कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में मुस्लिम लीग ने इस आधार पर इसका विरोध किया कि इसमें भारत को देवी के रूप में देखा गया है। इस विवाद के समाधान के लिए जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति बनी, जिसने बीच का रास्ता निकालते हुए इसके शुरुआती दो छंदों को ही राष्ट्रीय कार्यक्रमों के लिए स्वीकार किया।
1940 में मुस्लिम लीग के तीखे विरोध और जिन्ना के बयानों के बाद, राजनीतिक और सामाजिक मेल-मिलाप के मंचों पर इस पूरे गीत को न गाने के निर्देश तय किए गए, ताकि बढ़ते सांप्रदायिक तनाव को रोका जा सके।
सबसे महत्वपूर्ण घटना 1923 में घटी। यह संयोग है कि आज ही विष्णु दिगम्बर पलुस्कर की जयंती है। आपने इस महान देशभक्त शास्त्रीय संगीतकार का नाम कम ही सुना होगा। इसलिए आज इनका एक किस्सा सुन लीजिए, यकीन मानिए इसके बाद आप इनका नाम कभी नहीं भूलेंगे। ये उन दिनों की बात है जब कांग्रेस के अधिवेशन का शुभारंभ वंदेमातरम के गायन से होता था।1923 का अधिवेशन आंध्र प्रदेश में काकीनाड़ा में हुआ था और खिलाफत आंदोलन के नेता मोहम्मद अली जौहर (आज़म खान की यूनिवर्सिटी वाले) उस समय गांधी जी की कृपा से कांग्रेस के अध्यक्ष थे। अधिवेशन में जब महान शास्त्रीय गायक विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ने वन्देमातरम गीत प्रारम्भ किया, तो मोहम्मद अली जौहर ने इसे इस्लाम विरोधी बताकर रोकना चाहा इस पर पलुस्कर ने कहा कि - "ये कांग्रेस का मंच है, कोई मस्जिद नहीं" और इसके बाद उन्होंने पूरे सुरों के साथ वन्दे मातरम गाया। इस बात से मौलाना जौहर इतने बेइज्जत हुए कि मुंह छुपाते हुए मंच से उतर गये। पलुस्कर जी जैसी हिम्मत अगर आज़ादी के बाद भी दिखाई गई होती तो वंदेमातरम गीत को आज इस तरह से अपमान सहन न करना पड़ता। कांग्रेस पार्टी ने अपने इस तुष्टिकरण के निर्णय से विभाजन की एक नींव डाल दी है। भारत को बहुत सतर्क रहना होगा।
#वंदेमातरम्
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