मुझे मोक्ष नही राम लाला का मंदिर चाहिए।
"महंत पूज्य राम चन्द्र जी परमहंस"
जिन्हें फक्कड़ बाबा के नाम से भी जाना जाता था।
ये राम जन्म भूमि के वो नींव के पत्थर हैं जिन्होंने 12 दिसंबर 1949 को रात के समय राम जन्मभूमि जहाँ उस टाइम मस्जिद थी वहाँ कड़ी सुरक्षा के बावजूद श्री राम की मूर्ति स्थापित कर दी थी।
तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने मूर्ति को हटाने के आदेश दिए परन्तु बाबा जी का इतना प्रभाव था कि अयोध्या के तत्कालीन डीएम ने मूर्ति हटाने से मना कर दिया...!
फिर बाबा ने कोर्ट जा कर याचिका लगाई कि मूर्ति को बिना पूजा के नहीं रहने दे सकते औेर पूजा की अनुमति कोर्ट से ले आए।
उस वक्त फक्कड़ बाबा ने जो केस कोर्ट में दाखिल किया था उसी का नतीजा है कि....
5 अगस्त 2020 को राम जन्म भूमि पूजन किया गया।
परमहंस रामचंद्र दास जी को अबोध जीव-जंतुओं से बेहद प्रेम था। पैसा रहा तो बंदरों को भी काजू- बादाम खिलाते थे और न रहा तो मांगकर चना खिलाते थे। इसी तरह गायों के लिए पूरे ठेले का अमरूद ही गिरवा देते थे।
(परमहंस रामचंद्र दास जी को इतना ज्ञान था जो सभी के लिए आश्चर्य का विषय रहता था. परमहंस को मायावती भी बहुत मानती थीं। समय-समय पर मायावती परमहंस के लिए भेंट भेजती रहती थीं.
एक बार जब परमहंस अस्पताल में थे, तो मायावती उन्हें देखने अस्पताल पहुंच गईं थीं। दरअसल बिहार के एक मंदिर में परमहंस रामचंद्र दास ने न सिर्फ एक दलित पुजारी को नियुक्त किया, बल्कि उससे खाना बनवाकर खुद खाए। उनकी इस पहल से मायावती उनकी मुरीद हो गईं।
अपने जीवन के अंतिम काल में 14 जून 2003 को लखनऊ पीजीआई में उन्होंने तीन अभिलाषाएं बताईं थीं।
पहला- राम मंदिर, कृष्ण मंदिर और काशी विश्वनाथ मंदिर.
दूसरा- देश में गोहत्या बंदी और
तीसरा अखंड भारत को देखना.
1934 में ही रामजन्मभूमि आंदोलन से जुड़ने वाले परमहंस हमेशा कहते थे- ‘मुझे मोक्ष नहीं, मंदिर की कामना है’.
परमहंस रामचंद्र दास और इकबाल अंसारी की दोस्ती
1949 में जब परमहंस रामचंद्र दास ने विवादित स्थल पर पूजा करने की कोर्ट से इजाजत मांगी तो मुस्लिम पक्ष की ओर से इकबाल अंसारी भी विरोध में कोर्ट चले गए। अपने-अपने आराध्यों के लिए दोनों ही कोर्ट गए, लेकिन बरसों तक पैरवी करते-करते दोनों ऐसे दोस्त बन गए जिसकी अब मिसाल दी जाती है।
रामजन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत परमहंस रामचंद्र दास अपने तेवर के लिए भी जाने जाते रहे हैं।
1985 को कर्नाटक के उडुपी में हुई दूसरी धर्मसंसद में उन्होंने ऐलान किया था कि 8 मार्च 1986 को महाशिवरात्रि तक जन्मभूमि पर लगा ताला नहीं खोला गया तो ताला खोलो आंदोलन को वे ताला तोड़ो आंदोलन में बदल देंगे। उनके तल्ख तेवर के चलते ही 1 फरवरी 1986 को ही ताला खोल दिया गया।
1989 में प्रयाग महाकुंभ में परमहंस रामचंद्र दास के नेतृत्व में तीसरी धर्म संसद हुई जिसमें शिला पूजन और शिलान्यास का संकल्प लिया गया।
इस संकल्प ने आंदोलन को और तेज कर दिया। 9 नवंबर 1989 को अयोध्या में राम जन्मभूमि का शिलान्यास कर दिया गया।
हजारों साधु-संतों की मौजूदगी में कामेश्वर नाम के एक दलित युवक के हाथों राम मंदिर के लिए पहली ईंट रखवाई गई थी।
जनवरी 2002 में अयोध्या से दिल्ली तक चेतावनी संत यात्रा निकाली गई। इसकी अगुवाई भी परमहंस रामचंद दास ने ही की।
2003 की जुलाई में तबीयत बिगड़ने पर उन्हें लखनऊ पीजीआई ले जाया गया। लेकिन अंतिम समय में परमहंस रामचंद्र दास ने अयोध्या में रहने की इच्छा जताई।
तब 29 जुलाई को उन्हें लखनऊ से अयोध्या ले जाया गया। 31 जुलाई की सुबह अयोध्या के दिगम्बर अखाड़े में 92 वर्ष की अवस्था में परमहंस रामचंद्र दास का निधन हो गया।
उनके निधन की खबर से पूरे अयोध्या में देशभर के संत समाज का जमावड़ा लगने लगा। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, महंत अवैद्यनाथ जैसी हस्तियां अंतिम संस्कार में पहुंचीं थीं।
सरयू तट पर ही परमहंस रामचंद्र दास की समाधि बनाई गई है।
विश्व हिंदू परिषद बजरंग दल में कार्य करते हुए पूज्य स्वामी जी के दर्शनों का सोभाग्य मुझे भी कई बार मिला। पूज्य परमहंस रामचंद्र दास के चरणों में मेरा शत शत नमन।
*ऋषि कण्डवाल की कलम से*
#Ayodhya #ShriRamMandir
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