- राष्ट्रीय सुरक्षा, विधि का शासन और इस्लामी नैतिकता
- असम के तर्ज पर बंगाल ने भी उठाए है कदम,मिल रही वाहवाही तो टीएमसी कर रही विरोध
अशोक झा/ कोलकाता: बंगाल में असम के तर्ज पर अब सीमांत क्षेत्रों में जमीन खरीदना मुश्किल होगा। इसके लिए सरकार से अनुमति लेनी होगी।कोलकाता के ऐतिहासिक भूकैलाश मंदिर परिसर (खिदिरपुर) के आसपास बने अवैध ढांचों को पूरी तरह से ध्वस्त करने का आदेश दिया गया है। न्यायालय का आदेश: कलकत्ता उच्च न्यायालय ने कोलकाता नगर निगम को स्पष्ट निर्देश दिया है कि मंदिर की पवित्रता और ऐतिहासिकता को बनाए रखने के लिए उसके आसपास बने सभी अवैध निर्माणों को आंशिक रूप से नहीं, बल्कि पूरी तरह से जमींदोज किया जाए। विवादित एवं विचाराधीन स्थल मालदा में स्थित 650 साल पुरानी अदीना मस्जिद को लेकर भी विवाद गहराया हुआ है। हिंदू संगठनों का दावा है कि यह ढांचा आदिनाथ शिव मंदिर को तोड़कर बनाया गया था। फिलहाल यह पूरा मामला उच्च न्यायालय में विचाराधीन है और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासन वहां मुस्तैद है। इस सब के बंगाल सरकार कई महत्वपूर्ण कदम उठा रही है। असम विधानसभा ने एक अन्य संशोधन विधेयक के अनुसार 250 साल से अधिक पुराने धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों के 5 किलोमीटर के दायरे में जमीन खरीदने पर विशेष पाबंदी लगाई गई है। अब असम में केवल मूल निवासी या स्थानीय समुदाय ही जमीन खरीद सकते हैं। सरकार के नए कानून के मुताबिक जो व्यक्ति 1 जनवरी 2006 तक अपने परिवार के साथ तीन पीढ़ियों (लगभग 75 साल) से उस क्षेत्र में रह रहा हैं उसे मूल निवासी की श्रेणी में रखा गया है। इसमें मोरन, मटक, छूटिया, कोच राजबॉंग्शी और अहोम को स्थानीय जनजातीय तथा चाय बागान, आदिवासी व अन्य को वंचित समूह को शामिल किया गया है। जिलाधिकारी अनधिकृत लोगों को हटा सकता हैं लेकिन अनुसूचित जाति, जनजाति और स्थानीय समुदायों पर यह नियम लागू नहीं होगा।
भाजपा नीत केंद्र और राज्य सरकारों के द्वारा हाल के दिनों में जनसांख्यिकी बदलने के विरोध में कड़े और व्यापक कदम उठाया जा रहा हैं। कुछ बाहरी शक्तियों के इशारे पर देश के सीमावर्ती इलाको में जनसांख्यिकी को बदलकर देश की एकता, अखंडता और राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालने की सोची समझी साजिश पर काम किया जा रहा हैं। भारत नेपाल की सीमा जिसमे पश्चिम बंगाल, असम प्रदेश शामिल हैं में इस प्रकार के कानून की सख्त जरूरत हैं। इसके अलावा बांग्लादेश की सीमा से सटी प्रदेशो में भी इस प्रकार का कदम आवश्यक हैं। इसके खिलाफ भाजपा सरकारों का कदम काफी सराहनीय हैं। असम और पश्चिम बंगाल की सरकारों की तरह ही अन्य भाजपा और अन्य दलों द्वारा शासित प्रदेशों में भी सरकार इस तरह का कदम देशहित में उठा सकती हैं। भारत बांग्लादेश -पाकिस्तान सीमा के पास कुछ धार्मिक स्थलों को गिराए जाने की हालिया खबरों ने सार्वजनिक बहस छेड़ दी है। ऐसी घटनाओं से स्वाभाविक रूप से तीव्र भावनाएं उत्पन्न होती हैं क्योंकि पूजा स्थलों का श्रद्धालुओं के लिए गहरा आध्यात्मिक महत्व होता है। साथ ही, सरकारों का राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा करने और कानून लागू करने का दायित्व भी होता है। जब ये दोनों चिंताएं परस्पर विरोधी प्रतीत होती हैं, तो मामले को शांतिपूर्वक, सम्मानपूर्वक और कानूनी सिद्धांतों एवं नैतिक मूल्यों के अनुरूप सुलझाना महत्वपूर्ण हो जाता है।प्रत्येक देश का यह दायित्व है कि वह अपनी सीमाओं की रक्षा करे, अपने नागरिकों की सुरक्षा करे और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखे। राष्ट्रीय सुरक्षा किसी भी सरकार के प्राथमिक दायित्वों में से एक है। सुरक्षा के अभाव में लोगों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, आर्थिक अवसर और धार्मिक स्वतंत्रता जैसे अन्य अधिकारों का आनंद लेना कठिन हो जाता है। यही कारण है कि संविधान और कानूनी प्रणालियाँ अक्सर सार्वजनिक सुरक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के लिए आवश्यक होने पर व्यक्तिगत अधिकारों पर उचित प्रतिबंध लगाने की अनुमति देती हैं, बशर्ते ऐसे कदम कानून के अनुसार उठाए जाएँ।इस्लाम व्यवस्था, न्याय और वैध अधिकार के महत्व को भी मान्यता देता है। कुरान कहता है, "ऐ ईमान वालो! अल्लाह का हुक्म मानो, रसूल का हुक्म मानो और तुममें से जो अधिकारी हैं उनका हुक्म मानो।" शास्त्रीय इस्लामी विद्वानों ने समझाया है कि सार्वजनिक प्रशासन के मामलों में वैध अधिकार का पालन सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने में सहायक होता है। इस्लाम न्याय और उचित प्रक्रिया पर भी बल देता है। कुरान कहता है, "ऐ ईमान वालो! अल्लाह के साक्षी बनकर न्याय के लिए दृढ़ रहो, चाहे वह तुम्हारे अपने विरुद्ध हो या तुम्हारे माता-पिता और रिश्तेदारों के विरुद्ध ।" यह आयत मुसलमानों को याद दिलाती है कि निर्णय भावनाओं या व्यक्तिगत पसंद के बजाय साक्ष्य और न्याय पर आधारित होने चाहिए।भूमि, सार्वजनिक संपत्ति या निर्माण से संबंधित स्वामित्व के मामले न्यायालयों में कानूनी साक्ष्यों के आधार पर जांचे जाते हैं। इस्लामी कानून भी विवादों के समाधान में साक्ष्यों को बहुत महत्व देता है। पैगंबर मुहम्मद ने कहा, "प्रमाण प्रस्तुत करने का भार दावेदार पर होता है। यह सिद्धांत सदियों से इस्लामी न्यायिक प्रक्रिया का मार्गदर्शक रहा है। संपत्ति या स्वामित्व से संबंधित दावों को अनुमान या भावनाओं के बजाय विश्वसनीय साक्ष्यों द्वारा समर्थित होना चाहिए। इस्लाम यह भी सिखाता है कि पूजा स्थलों की स्थापना वैध और नैतिक तरीकों से की जानी चाहिए। कुरान विश्वासियों को दूसरों की संपत्ति का अनुचित रूप से उपभोग करने या लेने के खिलाफ चेतावनी देता है; "एक दूसरे के धन का अनुचित रूप से उपभोग न करो ।" इसी कारण से, प्राचीन न्यायविदों का आम तौर पर मानना था कि मस्जिद का निर्माण उस भूमि पर किया जाना चाहिए जो वैध रूप से प्राप्त की गई हो और जिस पर स्वामित्व का कोई विवाद न हो। अल्लाह की पूजा के लिए समर्पित स्थान स्वयं न्याय और स्पष्ट कानूनी अधिकारों पर आधारित होना चाहिए, न कि विवादित दावों या अवैध कब्जे पर। इस बात का सभी को विशेष रूप से ध्यान देना होगा।
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