- कभी यह था हिंदू राष्ट्र, अब बोलबम काँवर यात्रा में डीजे को लेकर सांप्रदायिक हिंसा
- वर्ष 2020 से 2026 के बीच निबंधित मदरसे 1200 और बिना रजिस्ट्रेशन के 2400 तक पहुंच गई
- सरकार को तीन साल पहले ही रिपोर्ट में इस प्रकार की घटना को लेकर किया गया था आगाह
- गृहमंत्री ने किया घटनास्थल का दौरा,मृतक के परिजनों से मुलाकात कर शांति बनाए रखने की अपील
नेपाल बोर्डर से अशोक झा: भारत से सटे नेपाल के तराई-मधेस इलाके में सांप्रदायिक तनाव लगातार बढ़ रहा है। सुनसरी जिले में शुरू हुआ विवाद अब धनुषा, सिराहा और सप्तरी जैसे जिलों तक फैल गया है। आज का अपडेट ये है कि हिंसा और पुलिस फायरिंग में अब तक 3 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि कई लोग घायल हैं। नेपाल की एक बड़ी आबादी इस हिंसा के पीछे डेमोग्राफी चेंज को वजह मान रही है। घुसपैठ और रोहिंग्या के कारण पूरा क्षेत्र अब सांप्रदायिक सद्भाव के लिए खतरा उत्पन्न कर रहा है। नेपाल कभी हिंदू राष्ट्र था। लेकिन आज बोलबम काँवर यात्रा के दौरान डीजे बजाने के विरोध के बाद सांप्रदायिक हिंसा की आग में झुलस रहा है। नेपाल के मधेश और तराई क्षेत्र में बढ़ते सांप्रदायिक तनाव को लेकर सुरक्षा एजेंसियों ने सरकार को तीन साल पहले ही चेतावनी दे दी थी, लेकिन उस पर कोई खास कार्रवाई नहीं हुई। अब सुनसरी और मधेश में हुई हालिया हिंसा के बाद यह रिपोर्ट फिर चर्चा में है। नेपाल पुलिस के महानिरीक्षक (आईजीपी) दानबहादुर कार्की ने वीडियो संदेश जारी कर कहा कि नेपाली समाज की सबसे बड़ी पहचान विविधता में एकता है और इसे सुरक्षित रखना सभी नागरिकों की साझा जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि पूर्वी तराई के कुछ इलाकों में धार्मिक सद्भाव बिगाड़ने तथा डर और भय का माहौल बनाने वाली गतिविधियां सामने आई हैं, जिनसे किसी का भी हित नहीं हो सकता।
अचानक बढ़ी मस्जिदों की संख्या: 2020 में नेपाल के अंदर 911 रजिस्टर्ड मदरसे थे 2025 तक इनकी संख्या बढ़कर 1200 से ज्यादा हो गई, जबकि इस दौरान अनरजिस्टर्ड मदरसों की संख्या बढ़कर 2400 तक पहुंच गई है।इसी दौरान नेपाल में 1500 से ज्यादा मस्जिदें भी खड़ी कर दी गईं हैं। आज नेपाल के गृहमंत्री सुदान गुरुंग ने हिंसा प्रभावित इलाकों का दौरा किया है और लोगों को मदरसों और मस्जिदों की जांच की बात कही है, मतलब नेपाल की सरकार अब इस मामले को हलके में नहीं लेना चाहती। कांतिपुर की रिपोर्ट के मुताबिक, नेपाल की सीमा सुरक्षा और दंगा नियंत्रण बल आर्म्ड पुलिस फोर्स (APF) ने तीन साल पहले सरकार को एक सीक्रेट रिपोर्ट सौंपी थी। इसमें कहा गया था कि तराई क्षेत्र में धर्म और जातीय आधार पर लोगों को बांटने की संगठित कोशिशें हो रही हैं।रिपोर्ट में ओली सरकार से तुरंत राजनीतिक और प्रशासनिक कदम उठाने की सिफारिश की गई थी, लेकिन अधिकारियों का कहना है कि उस समय सरकार ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। रिपोर्ट में कहा गया था कि नेपाल को भारत के मणिपुर और दक्षिण एशिया के दूसरे देशों में हुई सांप्रदायिक हिंसा से सबक लेना चाहिए।नेपाल के आईजी आरोप लगा रहे हैं कि भारत से भगाए गए बांग्लादेशी और रोहिंग्या अब नेपाल में घुसने की कोशिश कर रहे हैं। इसके अलावा सिलीगुड़ी रूट से भी बांग्लादेश से रोहिंग्या नेपाल में आ रहे है। आईजी ने बताया ये रोहिंग्या नेपाल के अलग अलग इलाकों में बसने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे डेमोग्राफी चेंज हो रही है, जहां पर मुसलमानों की संख्या ज्यादा हो रही है, वहां पर हिंदुओं के साथ उनका टकराव हो रहा है।
नेपाल में बढ़ रहे घुसपैठिये: नेपाल में अब तक मुसलमानों की आबादी सिर्फ तराई के इलाकों में बढ़ रही थी, लेकिन अब पहाड़ों में भी मुसलमानों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। नेपाल में राजा के शासन के दौरान पहाड़ों पर मुसलमान ना के बराबर थे, लेकिन अब पहाड़ों पर मुसलमानों की तादाद इतनी बढ़ गई कि वहां इज्तिमा का आयोजन किया जा रहा है। इज्तिमा अरबी भाषा का शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ है एक जगह जमा होना या सभा करना। इस्लामी संदर्भ में यह मुख्य रूप से तब्लीगी जमात द्वारा आयोजित बड़े धार्मिक सम्मेलन को कहते हैं।इसी के बहाने बांग्लादेश, पाकिस्तान और सोमालिया से भी मुलसमान नेपाल पहुंच रहे हैं और एक बार मुसलमान नेपाल में घुस जाते हैं, तो वापस नहीं लौटते। यही वजह है कि नेपाल में इज्तिमा बंद करवाने की मांग उठ रही है क्योंकि नेपाल में इसका आयोजन सिर्फ घुसपैठ के लिए होता है ।
घुसपैठियों ने बनाए फर्जी पहचान पत्र: नेपाल के अखबार और टीवी चैनल लगातार इस डेमोग्राफी चेंज पर चिंता जाहिर कर रहे हैं। इस वीडियो में भी पहाड़ों पर सिर्फ बड़े नहीं बच्चे भी नजर आ रहे हैं। यहां पर आए मुसलमानों ने अपने पहचान पत्र भी बना लिए हैं यानी अब ये मुसलमान नेपाल के पक्के नागरिक बन गए हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि नेपाल में बसने के बाद ये मुसलमान लव जिहाद को बढ़ावा दे रहे हैं। मस्जिद और मदरसे ऐसी गतिविधियों के केंद्र बन गए हैं, जिससे नेपाल के लोगों में असंतोष बढ़ रहा है। मुसलमानों की तादाद बढ़ाने के साथ साथ नेपाल में मदरसों और मस्जिदों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या सिर्फ वोटबैंक के लिए इसको संरक्षण मिल रहा है या इसके पीछे कोई बड़ी सोची समझी साजिश?
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