- अब इसकी ओर आंख दिखाने वाले की बंद कर दी जाएगी सांसे
- मेजर जनरल जी.डी. बख्शी ने कहा यह नया भारत है, यहां जैसा को तैसा दिया जाएगा जवाब
- ऑपरेशन सिंदूर में भारत ने दिखाया भारत का शौर्य
अशोक झा/ सिलीगुड़ी: आज सिलीगुड़ी कॉरिडोर को सिर्फ उसकी चौड़ाई से नहीं आंका जा सकता। यहां स्थायी सैन्य ठिकाने हैं। आधुनिक निगरानी तंत्र है। मिसाइल सुरक्षा है। वायुसेना की मजबूत मौजूदगी है। चौबीसों घंटे सक्रिय लॉजिस्टिक नेटवर्क है। यानी यह इलाका अब किसी कमजोर गलियारे की तरह नहीं, बल्कि एक ऐसे सैन्य प्लेटफॉर्म की तरह काम कर रहा है जहां से जरूरत पड़ने पर रक्षा भी की जा सकती है और जवाबी कार्रवाई भी। इसीलिए सेना अब इसे 'चिकन नेक' नहीं बल्कि 'एलीफेंट ट्रंक' कह रही है। संदेश साफ है। भारत अब सिर्फ अपनी सबसे संवेदनशील सीमा की रक्षा नहीं कर रहा, बल्कि उसने उसे इतनी मजबूती दे दी है कि पूर्वी मोर्चे पर किसी भी दुस्साहस की कीमत दुश्मन को बहुत भारी पड़ सकती है। इस बात की पुष्टि खपरैल के ग्रैंड कासा में सुरक्षा, रणनीति और संबंधों पर आयोजित 'सुरक्षा और संबंध' कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में प्रतिष्ठित पैनलिस्ट के तौर पर आर्मी वेटरन, लीडर और रणनीतिकार मेजर जनरल जी.डी. बख्शी और पूर्व भारतीय राजनयिक, रणनीतिक विचारक व ग्लोबल एडवाइजर दीपक वोहरा शामिल थे। कार्यक्रम का संचालन शौर्य चक्र विजेता और भारतीय सेना के पूर्व अधिकारी कर्नल वेम्बु शंकर ने किया।समाज के गणमान्य लोगों के अलावा, IG BSF मनोज त्यागी ज, IG SSB वंदन सक्सेना, DIG BSF श्री MP सिंह, 2nd कमांडेंट SSB श्री नवीन राय और कई अन्य लोग भी इस कार्यक्रम में मौजूद थे। यह क्षेत्र करीब 22 किमी चौड़ा और करीब 60 किमी लंबा इलाका है. यहां एक तरफ बांग्लादेश है तो दूसरी तरफ भूटान और करीब 130 किमी की दूरी पर चीन की सैन्य मौजूदगी है. इसी इलाके से भारत के पूर्वोत्तर के आठ राज्य देश के अन्य हिस्सों से भौगोलिक रूप से जुड़े हैं. इस इलाके की इसी संवेदनशील स्थिति के कारण इसे चिकन नेक कहा जाता है. यानी अगर इस पतले गलियारे पर किसी दुश्मन का कब्जा हो जाए तो पूर्वोत्तर का जमीनी संपर्क बाकी भारत से टूट सकता है। लेकिन सवाल है कि क्या भारत इतने सालों तक इस खतरे को सिर्फ देखता रहा है? जवाब है- बिल्कुल नहीं। पिछले एक दशक में इस पूरे इलाके की तस्वीर बदल चुकी है। अब सेना के बड़े अधिकारी इसे 'चिकन नेक' नहीं बल्कि 'एलीफेंट ट्रंक' यानी हाथी की सूंड़ कह रहे हैं।
आखिर क्यों बदल गई चिकन नेक की परिभाषा?: दशकों तक रक्षा विशेषज्ञ सिलीगुड़ी कॉरिडोर को भारत की सबसे बड़ी रणनीतिक कमजोरी बताते रहे. वजह साफ थी. यह गलियारा बेहद संकरा है. किसी बड़े युद्ध की स्थिति में अगर यहां दुश्मन दबाव बना देता तो पूर्वोत्तर तक सेना, हथियार, ईंधन और जरूरी सामान पहुंचाना मुश्किल हो सकता था. लेकिन अब सेना का आकलन बदल चुका है. पूर्वी कमान के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि आज यह इलाका सिर्फ एक रास्ता नहीं, बल्कि पूरी तरह सैन्य शक्ति से लैस एक रणनीतिक क्षेत्र बन चुका है. अब यहां केवल रक्षा तैयारी नहीं है, बल्कि जरूरत पड़ने पर जवाबी कार्रवाई की क्षमता भी मौजूद है. इसलिए सेना इसे 'हाथी की सूंड़' की संज्ञा दे रही है। हाथी की सूंड़ मजबूत भी होती है, लचीली भी और जरूरत पड़ने पर बेहद घातक भी।
2014 के बाद क्यों बदली पूरी तस्वीर?: असल बदलाव पिछले एक दशक में हुआ. केंद्र सरकार ने पूर्वी सीमा को लेकर अपनी रणनीति पूरी तरह बदल दी. पहले जहां ध्यान केवल सीमा की निगरानी तक सीमित था, वहीं अब पूरे इलाके को सैन्य दृष्टि से मजबूत करने पर फोकस किया गया. नई सड़कें बनीं. रेलवे नेटवर्क को मजबूत किया गया. सैन्य लॉजिस्टिक्स बढ़ाए गए. आधुनिक निगरानी प्रणाली लगाई गई. एयरबेस की क्षमता बढ़ाई गई. मिसाइल सिस्टम तैनात किए गए. सेना की स्थायी मौजूदगी बढ़ाई गई। इसका नतीजा यह हुआ कि जिस इलाके को कभी भारत की कमजोरी माना जाता था, वही अब उसकी सबसे मजबूत रक्षा ढाल बनता जा रहा है।
तीन सैन्य ठिकानों ने बदल दिया पूरा समीकरण: भारत ने सिलीगुड़ी कॉरिडोर के आसपास तीन बड़े सैन्य ठिकानों का ऐसा सुरक्षा घेरा बनाया है, जिससे किसी भी दिशा से आने वाले खतरे का तुरंत जवाब दिया जा सके. पहला, ठिकाना असम के धुबरी के पास बामुनी में स्थित लाचित बरफुकन मिलिट्री स्टेशन है। यह पूर्वी क्षेत्र के लिए बड़ा लॉजिस्टिक हब बन चुका है. यहां से सैनिकों की आवाजाही, हथियारों की आपूर्ति, गोला-बारूद और सैन्य उपकरणों का संचालन किया जाता है।
दूसरा, अहम ठिकाना बिहार के किशनगंज फॉरवर्ड बेस में बनाया गया है। यह कॉरिडोर के पश्चिमी हिस्से की सुरक्षा करता है और जरूरत पड़ने पर सेना को बेहद कम समय में पूर्वोत्तर की ओर भेजने की क्षमता देता है। तीसरा, और सबसे संवेदनशील ठिकाना पश्चिम बंगाल के चोपड़ा फॉरवर्ड बेस में तैयार किया गया है. यह अंतरराष्ट्रीय सीमा के बेहद करीब है। यहां से बांग्लादेश सीमा और कॉरिडोर के सबसे संकरे हिस्से पर लगातार नजर रखी जाती है. सीमा सुरक्षा बल (BSF) और सेना मिलकर यहां चौबीसों घंटे निगरानी करते हैं।
बांग्लादेश की हर गतिविधि पर पैनी नजर: बीते कुछ समय में बांग्लादेश की राजनीति में आए बदलाव के बाद भारत ने अपनी पूर्वी सीमा पर अतिरिक्त सतर्कता बरतनी शुरू कर दी है. सीमा पर इलेक्ट्रॉनिक निगरानी बढ़ाई गई है। सैनिकों की तैनाती मजबूत हुई है और जरूरत पड़ने पर तुरंत कार्रवाई के लिए क्विक रिस्पॉन्स सिस्टम विकसित किया गया है। चोपड़ा फॉरवर्ड बेस इसी रणनीति का सबसे अहम हिस्सा है। यहां से किसी भी संदिग्ध गतिविधि का तुरंत पता लगाया जा सकता है। सेना का दावा है कि अब सीमा पर सामरिक सरप्राइज की संभावना पहले के मुकाबले बेहद कम हो गई है। यानी अगर बांग्लादेश की ओर से कोई छोटी सी सैन्य हिमाकत भी होती है तो भारतीय सेना के पास जवाब देने के लिए पहले से तैयार बहुस्तरीय व्यवस्था मौजूद है। असली नजर तो चीन पर ही है: हालांकि बांग्लादेश को लेकर चर्चा ज्यादा होती है, लेकिन भारतीय सेना की सबसे बड़ी चिंता आज भी चीन है। सिक्किम और भूटान के बीच स्थित चुंबी वैली लंबे समय से चीन की रणनीतिक गतिविधियों का केंद्र रही है। यह इलाका सिलीगुड़ी कॉरिडोर के काफी करीब पड़ता है। इसलिए भारत ने यहां अपनी सैन्य ताकत लगातार बढ़ाई है। पूर्वी मोर्चे पर तैनात त्रिशक्ति कोर को अत्याधुनिक हथियारों से लैस किया गया है। यहां एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम, ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल और हासीमारा एयरबेस से उड़ान भरने वाले राफेल लड़ाकू विमान पूरे क्षेत्र को सुरक्षा कवच प्रदान करते हैं. यानी अगर चीन चुंबी वैली के जरिए दबाव बनाने की कोशिश करता है तो उसे सिर्फ जमीनी सेना ही नहीं, बल्कि हवा और मिसाइलों से भी जवाब मिलेगा।अब सड़क और रेल भी हथियार: आधुनिक युद्ध केवल सैनिकों से नहीं जीते जाते. सबसे बड़ी ताकत होती है लॉजिस्टिक्स। भारत ने इसी क्षेत्र में सबसे ज्यादा निवेश किया है. कॉरिडोर तक पहुंचने वाली रणनीतिक सड़कों का चौड़ीकरण किया गया है. रेलवे लाइनों का आधुनिकीकरण किया जा रहा है. भविष्य के लिए भूमिगत रेल नेटवर्क की योजना पर भी काम चल रहा है ताकि युद्ध की स्थिति में सप्लाई चेन प्रभावित न हो. इसके अलावा म्यांमार के रास्ते कालादान मल्टी-मॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट पर भी तेजी से काम किया जा रहा है. इसका मकसद साफ है। अगर किसी कारणवश सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर दबाव बढ़ता है तो पूर्वोत्तर तक पहुंचने के लिए भारत के पास वैकल्पिक रास्ता भी मौजूद रहे।
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