- वर्ष 2023 से 25 तक सरकार के खाते में जमा हुए 8 करोड़ रुपए और तीन वर्षों में नदियों से 800 करोड़ रुपए का बालू
- नदियों से अवैध बालू का खनन जारी, माफियाओं को न एनजीटी न प्रशासन का डर
- नियमों की उड़ाई जा रही धज्जियां, कई गांव कटाव के चपेट में
अशोक झा/ किशनगंज: राजस्थान को पिंक सिटी कहा जाता है। क्योंकि साल 1876 में जब ब्रिटेन के 'प्रिंस ऑफ वेल्स' (प्रिंस अल्बर्ट एडवर्ड) भारत आए थे, तब जयपुर के राजा सवाई राम सिंह द्वितीय ने उनके स्वागत में पूरे शहर को गुलाबी रंग से रंगवा दिया था। राज्य को बालुओं यानि रेत का शहर कहा जाता है। बिहार सरकार के खान एवं भूतत्व विभाग की ई-नीलामी प्रक्रिया के तहत किशनगंज जिले के बालू घाटों (क्लस्टर) की बंदोबस्ती मुख्य रूप से बांका जिले की कंपनी महादेव एनक्लेव प्राइवेट लिमिटेड से जुड़े लोगों (अशोक चांदक और राघव चांदक) द्वारा वर्ष 2023 में ली गई है। उसके बाद "चिकन नेक" के किशनगंज जिले में बालू से तेल तो छोड़िए घी निकालने का काम शुरू हुआ। इस खेल में ऊपर से नीचे तक के अधिकारियों की मिलीभगत से सरकार के खाते में जमा हुए मात्र 10 करोड़ और बालू की निकासी करीब 800 करोड़ रुपए से ज्यादा की हुई। नदियों से बालू के चल रहे इस खेल के खिलाफ पटना उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की गई है। जिसका केस नंबर: CWJC-5655/2026 है। इस मामले में 27 जुलाई को सुनवाई है। सरकार और विभागीय अधिकारियों को इस गड़बड़ झाले में जवाब देना है। सरकार की मंशा साफ रही तो ईडी से किशनगंज जिले में 2023 से 25 तक अवैध बालू खनन की जांच करवाकर उचित कार्रवाई कर राज्य सरकार के राजस्व के खजाने को भरा जा सकता है।
कैसे हुआ पूरा खेल: किशनगंज जिले में बालू खनन के लिए कुल 5 क्लस्टर बनाए गए हैं, जिनमें पर्यावरण स्वीकृति और कागजी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही नियमानुसार खदान संचालन की अनुमति दी जाती है। मुख्य नियमों में मानसून के दौरान खनन पर रोक, तय गहराई तक ही खुदाई और भारी मशीनों की जगह मजदूरों का उपयोग शामिल है। मानसून प्रतिबंध: बरसात के मौसम (नदियों में जलस्तर बढ़ने और मछलियों के प्रजनन काल के कारण आमतौर पर 15 जून से 15 अक्टूबर तक) में बालू के उठाव पर पूरी तरह रोक रहती है।खोदाई की गहराई: नदी के तल से केवल 3 मीटर (लगभग 10 फीट) या उससे कम गहराई तक ही बालू निकालने की अनुमति होती है।
मशीनों का प्रयोग: पर्यावरण को बचाने के लिए नदियों के अंदर पोकलेन या जेसीबी जैसी भारी मशीनों से खनन प्रतिबंधित है; केवल पारंपरिक और मैनुअल (मजदूरों द्वारा) तरीकों की अनुमति है। परिवहन और प्रशासनिक नियम
ई-चालान अनिवार्य: बालू ले जाने वाले प्रत्येक वाहन के पास बारकोड या क्यूआर कोड वाला वैध ई-चालान होना आवश्यक है। जीपीएस और ढंकना: ट्रकों और ट्रैक्टरों में जीपीएस लगाना तथा उड़ने से रोकने के लिए बालू को ढंककर ले जाना अनिवार्य है। दूरी के नियम: पुलों, जल संरचनाओं और तटबंधों से कम से कम 1 किलोमीटर की दूरी के भीतर खनन सख्त वर्जित है। इन सभी नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए कलस्टर एक ओर पांच में लगभग 10 करोड़ की राशि जमाकर पूरे जिला के सभी कलस्टरों जिसमें 38 नदियों के बने घाटों से बालू निकालने, बेचने और स्टॉक करने का खेल शुरू हुआ। यह खेल 2023 से 25 तक अनवरत चलता रहा। वर्ष 2026 में इस बात का खुलाशा हुआ कि कलस्टर 2, 3 और चार में ठेका की राशि जमा ही नहीं हुई है। क्योंकि अबतक इन कलस्टरों का पर्यावरणीय स्वीकृति नहीं मिल पाई थी। हद तो यह है कि इन घाटों से बालू निकालने के लिए बालू स्टॉक के लिए के लाइसेंस भी दे दिए गए।
कैसे हो रही एनजीटी की अवहेलना: नदियों से बालू निकासी के रोक के बावजूद बालू को निकाला ही नहीं जाता बल्कि नदी के किनारे ही उसे स्टॉक कर बेचा जा रहा है। नदियों से बालू निकालने के लिए भारी मशीनें: जेसीबी और पोकलैंड से नदी की धारा और तलहटी को भारी नुकसान पहुंचता है।
सक्शन और ड्रेजर: पानी की गहराई से बालू खींचने वाली सक्शन पाइप और ड्रेजर मशीनें प्रतिबंधित हैं। मानसून प्रतिबंध: पर्यावरण की रक्षा के लिए हर साल 15 जून से 15 अक्टूबर तक नदियों से बालू के खनन पर पूरी रोक रहती है। उसके बाबजूद नदियों से रात के अंधेरे में बालू निकाला जाता है। गाइडलाइंस फॉर सैंड माइनिंग ने इसे अनिवार्य नियम का रूप दिया। नए नियमों के तहत शुरुआती वर्षों में चार सर्वे करना जरूरी है। इसके तहत अप्रैल में मॉनसून से पहले, खनन बंद होने से पहले, माॅनसून के बाद और वित्त वर्ष की समाप्ति पर मार्च के अंत में यह सर्वेक्षण करना होगा। इन सर्वेक्षणों से माॅनसून से पहले निकाली गई मात्रा, माॅनसून के बाद प्राकृतिक रूप से वापस जमा हुई रेत और पूरे वित्त वर्ष के कुल खनन का आकलन करने की बात है। तीसरे वर्ष से आगे यह प्रावधान है कि तीन सर्वे ही पर्याप्त होंगे। इस तरह 2020 की गाइडलाइन ने रीप्लनिशमेंट स्टडी को स्पष्ट, समयबद्ध और अनिवार्य बनाया है।इसका क्या पालन सरजमीन पर किया गया या सिर्फ फाइलों में। नदी का जो भी पर्यावरणीय, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक लाभ समाज को मिलता है, वह किसी भी तरह से प्रभावित नहीं होना चाहिए और जितनी रेत नदी के किसी स्ट्रेच से निकल सकती है, उतनी ही निकाली जानी चाहिए। रेत खनन और बाद में प्राकृतिक तौर पर उसकी भरपाई को समझने के लिए वैज्ञानिक तीन वर्ष की मांग करते हैं। इसके बाद ही उनकी समझ यह बन सकती है कि किसी स्ट्रेच में कितना सरप्लस बालू और वहां क्या भरपाई की संभावना जताई गई है।
ग्रामीणों का आरोप : महानंदा नदी से सटे सखुआडली ग्राम पंचायत की दुर्दशा और बढ़ते अवैध बालू खनन पर रोक लगाने की मांग को लेकर समाजसेवी नासिर आलम ने ठाकुरगंज के विधायक गोपाल कुमार अग्रवाल को एक विस्तृत मांगपत्र दिया है। उन्होंने कहा कि अनियमित बालू उठाव से न केवल ग्रामीण सड़कों को नुकसान हो रहा है, बल्कि पर्यावरण और स्थानीय संपदा पर भी संकट बढ़ रहा है। उन्होंने विधायक से आग्रह किया कि प्रशासन को सख्त निर्देश देकर इस पर तत्काल रोक लगाई जाए। बालू के डंपर की ढुलाई से सिलीगुड़ी मुरलीगछ मार्ग के पुल क्षतिगस्त हो गए है। वहाँ नदी के किनारे ही भारी मात्रा में बालू जमा किया गया है जिसके निकासी के लिए बिना विभागीय अनुमति से डायवर्सन रास्ता बनाया गया है। इसी प्रकार खरना ओर भागखरना के ग्रामीणों का आरोप है कि महानंदा नदी से बालू निकालने के चक्कर में गाँव के किनारे तक खनन किया गया है। हद तो यह है कि नदी के किनारे ही बालू का स्टॉक किया गया है। यह पूरी तरह अवैध और नियमों के खिलाफ है। इसी प्रकार कुकुरबाघी पंचायत के ग्रामीणों का कहना है कि यहां खनन विभाग की मिली भगत से टेंडर लेने वाले को ही स्टॉक का लाइसेंस दिया गया। वहां काटा भी लगाया गया। भारी विरोध के बाद काटा तो हटाया गया लेकिन लगे बॉर्ड विभाग की कारगुजारी को दर्शाता है। लोगों का कहना है कि अवैध खनन से निकाली गई बालू का परिवहन प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत बनी ग्रामीण सड़क से किया जा रहा है। जबकि सड़क की भार क्षमता सीमित है, इसके बावजूद 10 से 16 चक्का तक के भारी वाहन नियमित रूप से चल रहे हैं। जिससे सड़क को भारी नुकसान और ग्रामीणों की जान-माल को खतरा उत्पन्न हो रहा है। डीएम-एसपी को दिये आवेदन के साथ डिजिटल साक्ष्य भी संलग्न ग्रामीणों ने अवैध खनन के वीडियो फुटेज और घटनास्थल पर मौजूद पुलिस पदाधिकारी के फोटो पेन ड्राइव में संलग्न किए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया है कि बंगाल-बिहार सीमा क्षेत्र पर घटनास्थल बिहार के गलगलिया थाना क्षेत्र में ही स्थित है। प्रशासन से कार्रवाई की मांग ग्रामीणों ने जिलाधिकारी व पुलिस कप्तान से अवैध बालू खनन की निष्पक्ष जांच, दोषियों पर विधिसम्मत कार्रवाई, थाना स्तर की भूमिका की जांच, जनसुरक्षा एवं पर्यावरण संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाने तथा प्रधानमंत्री ग्राम सड़क पर भारी वाहनों के संचालन पर तत्काल रोक लगाने की मांग की है। जिला के एसपी और डीएम का कहना है कि ठाकुरगंज में विभिन्न नदियों में अवैध खनन की शिकायत करते हुए सौंपे गये आवेदन की जांच कर आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए गये हैं। खनन विभाग से समन्वय स्थापित कर थाना पुलिस को कार्रवाई करने के लिए कहा गया है। किसी भी प्रकार का अवैध खनन करने वालों की जांच कर कार्रवाई की जायेगी। लेकिन क्या इसपर कोई अमल हो पाया है? यह एक यक्ष प्रश्न सरकार ओर विभाग को मुंह चिढ़ा रहा है।
दुनियाभर के घुमक्कड़ पत्रकारों का एक मंच है,आप विश्व की तमाम घटनाओं को कवरेज करने वाले खबरनवीसों के अनुभव को पढ़ सकेंगे
https://www.roamingjournalist.com/