- आज से श्रीहरि 119 दिनों के लिए चले जाएंगे योगनिद्रा में
आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी या हरिशयनी एकादशी कहा जाता है। हिंदू धर्म में देवशयनी एकादशी का विशेष महत्व माना गया है क्योंकि इस दिन श्रीहरि भगवान विष्णु चार माह के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं और इसके साथ चातुर्मास की शुरुआती है। फिर चार महीने तक शादी-विवाह, सगाई, मुंडन जैसे शुभ या मांगलिक कार्य नहीं किए जाते।इस साल देवशयनी एकादशी का व्रत 25 जुलाई 2026, शनिवार का रखा जाएगा। लेकिन एकादशी व्रत के कुछ नियम होते हैं और इन नियमों का पालन सिर्फ व्रत के दिन ही नहीं, बल्कि व्रत से एक दिन पहले शुरू हो जाता है. यानी देवशयनी एकादशी व्रत के नियम आज से ही लागू हो गए हैं। इसलिए भूलकर भी ऐसी कोई गलती न करें जिससे व्रत का फल समाप्त हो जाए। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है। इसके साथ ही कहा जाता है कि एकादशी की पूजा का पूरा फल तभी मिलता है, जब पूजा के बाद व्रत कथा सुनी या पढ़ी जाए।कथा के बिना पूजा अधूरी मानी जाती है। ऐसे में आज भगवान विष्णु की पूजा के बाद आप यहां से देवशयनी एकादशी की व्रत कथा का श्रवण कर सकते हैं। देवशयनी एकादशी की व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या महत्व है और इस व्रत की विधि क्या है। तब भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि इस एकादशी को पद्मा या देवशयनी एकादशी कहा जाता है। उन्होंने बताया कि यह कथा स्वयं ब्रह्माजी ने नारद मुनि को सुनाई थी। इस व्रत को करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं और व्यक्ति के पापों का नाश होता है।राजा मांधाता के राज्य में पड़ा भयंकर अकाल
बहुत समय पहले सूर्यवंश में राजा मांधाता नाम के एक न्यायप्रिय और धर्मपरायण राजा राज करते थे. उनकी प्रजा सुखी थी और राज्य में कभी किसी चीज की कमी नहीं थी. लेकिन एक समय ऐसा आया जब लगातार तीन साल तक वर्षा नहीं हुई. पूरे राज्य में भयंकर अकाल पड़ गया. खेत सूख गए, अन्न की कमी हो गई और लोगों का जीवन कठिन हो गया.
प्रजा की परेशानी देखकर राजा मांधाता समाधान की तलाश में वन गए. वहां उनकी मुलाकात महर्षि अंगिरा से हुई. राजा ने उनसे अकाल का कारण और उससे बचने का उपाय पूछा. तब ऋषि ने कहा कि आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पद्मा यानी देवशयनी एकादशी का विधि-विधान से व्रत करें. उन्होंने बताया कि इस व्रत के प्रभाव से भगवान विष्णु प्रसन्न होंगे और राज्य की सभी परेशानियां दूर हो जाएंगी।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवशयनी एकादशी की यह कथा श्रद्धा से सुनने या पढ़ने से भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है. ऐसा माना जाता है कि यह व्रत और कथा जीवन के दुखों को दूर करने, पापों का नाश करने और सुख-समृद्धि का मार्ग खोलने वाली है। इसलिए इस दिन पूजा के साथ इस कथा का श्रवण करना विशेष रूप से शुभ माना जाता है। ( अशोक झा की कलम से )
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