आज ज्योति दा को 113वीं जन्म जयंती पर दिया जा रहा लाल सलाम
-जिसने अपने पार्टी केसिद्धांत और निर्देश पर ठुकरा दी थी पीएम की कुर्सी
- ज्योति बसु एक ऐसा नाम, जो भारतीय राजनीति में सिद्धांत, अनुशासन और एक “ऐतिहासिक भूल” के कारण हमेशा रहेगा याद
अशोक झा/ कोलकाता: आज बंगाल ही नहीं देशभर में सवामपंथी विचार को मानने वाले अपने प्रिय कॉमरेड बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु को लाल सलाम कर रहे है। कारण आज उनका 113वीं जन्म जयंती है। ज्योति दा की यह यह कहानी केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस राजनीति की है, जिसमें नैतिकता, अनुशासन और जनसेवा सर्वोपरि होते हैं। ज्योति बसु इस बात के जीवंत प्रमाण हैं कि इतिहास में जगह केवल सत्ता से नहीं, बल्कि सही फैसलों से बनती है। ज्योति दा के नाम से पुकारे जाने वाले ज्योतिरेंद्र बासु का जन्म कलकत्ता के बंगाली कायस्थ परिवार में 8 जुलाई 1914 को हुआ था। डॉक्टर पिता निशिकांत बसु और गृहणी मां हेमलता बसु की तीसरी और सबसे छोटी संतान के रूप में उनका बचपन बंगाल प्रांत के ढाका जिले के बार्दी में गुजरा, लेकिन स्कूली पढ़ाई कोलकाता में हुई। कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद वे 1935 में कानून की पढ़ाई करने के लिए इंग्लैंड चले गए।
वामपंथ की ओर आकर्षण: इंग्लैंड में ज्योति बसु के जीवन में उल्लेखनीय बदलाव आए। वहीं कम्युनिस्ट पार्टी की ओर आकर्षित हुए और आजादी के ल़िए काम कर रहे संगठनों से भी जुड़े। 1940 में वे बैरिस्टर बन कर भारत लौटे, कलकत्ता हाईकोर्ट में वकील बने और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया से जुड़ने के बाद1946 में बंगाल की राजनीति में सक्रिय हो गए। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापकों में शामिल रहे बसु 1977 में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहे। आज जब बंगाल में कुर्सी पाने की होड़ में पार्टी में हंगामा मचा हुआ है। देशभर में कई राजनीतिक दलों के नेता कुर्सी के लिए पार्टी से अलग हो गए। वही
भारतीय राजनीति में कुछ कहानियां कुर्सियों से नहीं, फैसलों से बनती हैं। यह कहानी उन्हीं में से एक है। यह उस नेता की कहानी है, जिसने सत्ता के सबसे ऊंचे शिखर पर बैठने का अवसर केवल इसलिए ठुकरा दिया क्योंकि उसके लिए पद से बड़ा उसकी पार्टी का अनुशासन था। विडंबना यह रही कि इसी निर्णय ने उसे राजनीति की नैतिक ऊंचाइयों पर स्थापित कर दिया। यह कहानी है ज्योति बसु की, एक ऐसा नाम, जो भारतीय राजनीति में सिद्धांत, अनुशासन और एक “ऐतिहासिक भूल” के कारण हमेशा याद किया जाएगा।
साल 1996 की गर्मी भारतीय राजनीति के लिए अनिश्चितता और संभावनाओं का अवसर लेकर आई थी। आम चुनाव हो चुके थे, नतीजे सामने थे, लेकिन सत्ता का स्पष्ट केंद्र कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला था। कांग्रेस सत्ता से बाहर थी, भाजपा के पास पर्याप्त संख्या नहीं थी, और ऐसे में तीसरा मोर्चा, जो बाद में यूनाइटेड फ्रंट के नाम से जाना गया, सरकार बनाने की स्थिति में था।
इस राजनीतिक उथल-पुथल के बीच एक नाम बार-बार उभर रहा था, वह था ज्योति बसु। वी.पी. सिंह से लेकर हरकिशन सिंह सुरजीत तक, कई बड़े नेताओं की पहली पसंद वही थे। एक ऐसा नेता, जिसने पश्चिम बंगाल में दो दशकों से अधिक समय तक स्थिर सरकार चलाई थी और जो प्रशासनिक अनुभव, राजनीतिक संतुलन और वैचारिक स्पष्टता का अद्भुत संगम था।अब आते हैं उस क्षण पर, जिसने ज्योति बसु को भारतीय राजनीति में एक अलग स्थान दिला दिया। 1996 में जब केंद्र में सरकार बनाने की प्रक्रिया चल रही थी, तब तीसरे मोर्चे के नेताओं ने सर्वसम्मति से उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए चुना। ज्योति बसु खुद भी इस जिम्मेदारी को निभाने के लिए तैयार थे। ऐसा लग रहा था कि देश को एक अनुभवी और संतुलित नेता मिलने वाला है।
लेकिन तभी उनकी पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक हुई। लंबी चर्चा के बाद पार्टी ने फैसला किया कि वे सरकार में शामिल नहीं होंगे, क्योंकि उनके पास पर्याप्त बहुमत नहीं है। यह निर्णय उनके व्यक्तिगत विचारों के विपरीत था, लेकिन उन्होंने बिना किसी विरोध के पार्टी का फैसला स्वीकार कर लिया।
यही वह क्षण था, जब एक नेता ने देश के सर्वोच्च पद को पार्टी अनुशासन के लिए त्याग दिया। बाद में ज्योति बसु ने स्वयं इस निर्णय को “ऐतिहासिक भूल” कहा। उनका मानना था कि यह देश की सेवा करने का एक बड़ा अवसर था, जिसे गंवा दिया गया। इसके बावजूद उन्होंने कभी पार्टी के खिलाफ आवाज नहीं उठाई। यह उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता थी।
ज्योति बसु केवल सिद्धांतवादी नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक नेता भी थे। उन्होंने समझा कि केवल विचारधारा से समाज नहीं चलता, विकास के लिए व्यावहारिक कदम जरूरी होते हैं।
ज्योति बसु केवल एक नाम नहीं थे, बल्कि एक विचार थे। उन्होंने बैरिस्टर की आरामदायक जिंदगी छोड़कर मजदूरों और किसानों के बीच अपनी पहचान बनाई। रेलवे कर्मचारियों के साथ हड़तालों में हिस्सा लिया, बंगाल के अकाल के दौरान राहत कार्य किए और तेभागा आंदोलन में किसानों के अधिकारों के लिए खड़े हुए। उनकी राजनीति केवल भाषणों तक सीमित नहीं थी, बल्कि जमीन से जुड़ी हुई थी। 1977 से वे पश्चिम बंगाल में एक स्थिर और प्रभावी शासन का चेहरा बन चुके थे।
लंदन की गलियों में मार्क्सवादी विचारधारा को करीब से समझा
8 जुलाई 1914 को कलकत्ता के एक समृद्ध परिवार में जन्मे ज्योति बसु का बचपन सुविधाओं में बीता। उनके पिता एक प्रतिष्ठित डॉक्टर थे। पढ़ाई में तेज होने के कारण वे कानून की पढ़ाई के लिए लंदन गए। वहीं उनका जीवन निर्णायक मोड़ पर पहुंचा। लंदन की गलियों में उन्होंने मार्क्सवादी विचारधारा को करीब से समझा और आर्थिक असमानता की कठोर सच्चाइयों को देखा। यही अनुभव उनके जीवन की दिशा बदलने वाला साबित हुआ। 1940 में भारत लौटने पर उनके सामने एक सफल वकील बनने का रास्ता खुला था, लेकिन उन्होंने उसे ठुकरा दिया। अदालतों की बजाय उन्होंने मजदूरों की बस्तियों और कारखानों का रुख किया। कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़कर उन्होंने अपना जीवन गरीबों और शोषितों के संघर्ष को समर्पित कर दिया। यह दशक उनके राजनीतिक जीवन का प्रशिक्षण काल था। बंगाल अकाल और स्वतंत्रता आंदोलन के बीच उन्होंने जनता के बीच काम करना सीखा। 1946 में वे पहली बार विधानसभा पहुंचे। वे उन नेताओं में थे, जो सदन के भीतर जितनी मजबूती से अपनी बात रखते थे, सड़क पर उतनी ही ताकत से संघर्ष करते थे।
बैरिस्टर का काम छोड़ गरीबों और शोषितों के संघर्ष में जुट गये: 1964 में कम्युनिस्ट आंदोलन के विभाजन के समय उन्होंने Communist Party of India (Marxist) का साथ चुना। इसके बाद उनका राजनीतिक जीवन संघर्षों से भरा रहा। उन्होंने जेल यात्राएं कीं, हमलों का सामना किया और 1970 के दशक में उन पर गोलियां तक चलाई गईं, जिसमें उनका एक साथी मारा गया। इसके बावजूद वे अपने रास्ते से नहीं डिगे। 1975 की आपातकाल के दौरान उन्होंने लोकतंत्र के पक्ष में मजबूती से आवाज उठाई। 1977 का साल उनके जीवन का निर्णायक पड़ाव बना। आपातकाल के बाद हुए चुनावों में पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा सत्ता में आया और ज्योति बसु मुख्यमंत्री बने। इसके बाद उन्होंने जो इतिहास रचा, वह भारतीय राजनीति में अद्वितीय है। वे लगातार 23 वर्षों तक इस पद पर बने रहे। यह एक रिकॉर्ड है।उनके शासन की सबसे बड़ी पहचान भूमि सुधार कार्यक्रम ‘ऑपरेशन बर्गा’ था। इसके तहत बंटाईदार किसानों को अधिकार दिए गए और जमीन पर उनका नियंत्रण सुनिश्चित किया गया। लगभग 10 लाख एकड़ जमीन गरीबों में वितरित की गई। इसके अलावा उन्होंने पंचायत व्यवस्था को मजबूत किया, जिससे ग्रामीण स्तर पर लोकतंत्र को नई ताकत मिली। उनके शासन में गांवों के गरीबों को पहली बार यह भरोसा हुआ कि सत्ता उनके दरवाजे तक पहुंच सकती है।
ज्योति बसु भारतीय वामपंथी राजनीति के उन नेताओं में थे, जिन्होंने केवल विचारधारा की बात नहीं की, बल्कि उसे जमीन पर लागू करके दिखाया। उन्होंने Communist Party of India (Marxist) के एक अनुशासित कार्यकर्ता के रूप में शुरुआत की और जीवनभर उसी संगठन और उसकी विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध रहे। मजदूर आंदोलनों से लेकर किसानों के संघर्ष तक, वे हमेशा “लाल झंडे” यानी वामपंथी राजनीति के प्रतीक के साथ खड़े रहे। पश्चिम बंगाल में उनका लंबा कार्यकाल (1977–2000) इस बात का प्रमाण है कि उन्होंने वामपंथी नीतियों, खासतौर पर भूमि सुधार (ऑपरेशन बर्गा) और पंचायत सशक्तीकरण, को व्यावहारिक रूप में लागू किया। यही कारण है कि वे केवल सैद्धांतिक कम्युनिस्ट नहीं, बल्कि एक “प्रयोगधर्मी” वामपंथी नेता माने जाते हैं।
पश्चिम बंगाल में उन्होंने औद्योगिक निवेश को बढ़ावा दिया और बड़े उद्योग समूहों के साथ संवाद स्थापित किया। उनका मानना था कि रोजगार सृजन के लिए उद्योग आवश्यक हैं।
1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद जब देश के कई हिस्सों में दंगे भड़के, तब पश्चिम बंगाल अपेक्षाकृत शांत रहा। यह उनके प्रशासनिक कौशल और सांप्रदायिक सौहार्द के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का परिणाम था। उन्होंने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि कानून-व्यवस्था से किसी प्रकार का समझौता नहीं किया जाएगा। उनका निजी जीवन भी उतना ही सादा और अनुशासित था। वे विधायक रहते हुए अपने भत्ते का एक बड़ा हिस्सा पार्टी को दे देते थे और बेहद साधारण जीवन जीते थे। उनके जीवन में दिखावे या विलासिता के लिए कोई जगह नहीं थी।
उनकी सादगी के कई उदाहरण मिलते हैं। एक प्रसंग में, जब उनकी आर्थिक स्थिति को देखते हुए उन्हें अधिक भत्ता देने का प्रस्ताव रखा गया, तो उन्होंने इसे ठुकरा दिया। उनके लिए यह केवल व्यक्तिगत ईमानदारी नहीं, बल्कि एक वैचारिक प्रतिबद्धता थी। ज्योति बसु का जीवन “डिक्लासिंग” यानी वर्ग-त्याग का एक जीवंत उदाहरण था। उन्होंने अपने सामाजिक और आर्थिक विशेषाधिकारों को छोड़कर खुद को पूरी तरह मजदूरों और किसानों के साथ जोड़ लिया। यही कारण था कि वे केवल नेता नहीं, बल्कि जनता के अपने आदमी माने जाते थे। साल 2000 में उन्होंने स्वेच्छा से मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया। वे पद से चिपके रहने वाले नेता नहीं थे। 17 जनवरी 2010 को उनके निधन के बाद भी उनकी समाज के प्रति प्रतिबद्धता कायम रही। उन्होंने अपना शरीर चिकित्सा अनुसंधान के लिए दान कर दिया। ज्योति बसु की “ऐतिहासिक भूल” आज भी राजनीतिक बहस का विषय है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि उसी निर्णय ने उन्हें एक नैतिक ऊंचाई प्रदान की। उन्होंने दिखाया कि राजनीति केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि मूल्यों और अनुशासन का क्षेत्र भी है। उनकी विरासत हमें यह सिखाती है कि एक सच्चा नेता वही होता है, जो अपने सिद्धांतों से समझौता न करे, चाहे उसके सामने कितनी भी बड़ी कुर्सी क्यों न हो। ज्योति बसु प्रधानमंत्री नहीं बन सके, लेकिन उन्होंने जो सम्मान और विश्वसनीयता हासिल की, वह कई प्रधानमंत्रियों के लिए भी दुर्लभ है।
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