- सनातन परंपरा में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान माना गया है पूजनीय
- गुरु की अवधारणा एक शिक्षक की पारंपरिक धारणा से कहीं ऊपर
अशोक झा/ सिलीगुड़ी: इस साल गुरु पूर्णिमा का पर्व 29 जुलाई यानि आज बुधवार को मनाया जा रहा है। वहीं इस दिन प्रीति और आयुष्मान योग बन रहे हैं। जिससे इस दिन का महत्व और भी बढ़ गया है। पूर्णिमा का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। यह दिन गुरु के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और समर्पण व्यक्त करने का अवसर माना जाता है। आपको बता दें कि सनातन परंपरा में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान पूजनीय माना गया है, क्योंकि वही अपने शिष्य को ज्ञान, संस्कार और जीवन का सही मार्ग दिखाते हैं। वैदिक पंचांग के अनुसार आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाने वाली गुरु पूर्णिमा का विशेष संबंध महर्षि वेदव्यास से भी माना है। इसी कारण इसे व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। गुरु का अर्थ: गुरु शब्द का अर्थ है वह जो अंधकार का नाश कर प्रकाश लाता है। गुरु के द्वारा दिया गया ज्ञान मन के गहनतम अंधकारमय कोनों को भी प्रकाशित कर देता है। गुरु की अवधारणा एक शिक्षक की पारंपरिक धारणा से कहीं ऊपर है। कोई भी विद्या तब तक अपूर्ण है जब तक कि वह गुरु के माध्यम से प्राप्त न हो। यही कारण है कि भारत में किसी भी विद्या को ग्रहण करने के लिए चाहे वह प्राचीन दर्शन, योग और ध्यान हो या फिर कला, संस्कृति, युद्ध कौशल, शास्त्रीय नृत्य व संगीत का क्षेत्र हो एक गुरु की नितांत आवश्यकता होती है। ज्ञान, समृद्धि और प्रतिभा के विकास में गुरु की भूमिका: एक सच्चा गुरु एक निष्ठावान साधक को इस भौतिक संसार से परे समाधि की गहन अवस्था तक ले जाने में सक्षम होता है। एक आदर्श गुरु ने सदैव ऐसे ही शिष्य की खोज की है, जिसका मन पल्लवित होने के लिए तत्पर रहता है और जिसका हृदय पूर्ण समर्पण के भाव से खुला होता है। जब जीवन में गुरु का आगमन होता है तो हमारी दृष्टि एक बड़ी वास्तविकता को देखने में सक्षम हो पाती है। "गुरु बिनु ज्ञान न होय, गुरु बिनु दिशा न होय।" भारतीय संस्कृति में गुरु को गोविंद यानी साक्षात ईश्वर से भी ऊंचा स्थान दिया गया है। गुरु ही वह मार्गदर्शक है जो मनुष्य के जीवन से अज्ञानता के घोर अंधकार को मिटाकर उसे ज्ञान, सत्य और सदाचार के प्रकाश की ओर ले जाता है। आषाढ़ मास की पूर्णिमा को देश भर में गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व बेहद श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस अवसर पर देश-दुनिया में शिष्य अपने-अपने गुरुओं का पूजन कर उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर रहे हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि गुरु पूर्णिमा को 'व्यास पूर्णिमा' क्यों कहा जाता है? और इसी पावन तिथि पर भगवान शिव के 'आदिगुरु' बनने का क्या रहस्य है? आइए जानते हैं इस पावन पर्व का गहरा ऐतिहासिक, पौराणिक और आध्यात्मिक महत्व। महर्षि वेदव्यास जी का जन्मोत्सव: इसलिए कहलाती है 'व्यास पूर्णिमा' पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, आषाढ़ पूर्णिमा के दिन ही महाभारत, श्रीमद्भागवत, 18 पुराणों के रचयिता और वेदों को चार भागों में विभाजित करने वाले महाज्ञानी महर्षि कृष्णद्वैपायन व्यास (वेदव्यास जी) का जन्म हुआ था। महर्षि वेदव्यास जी को मानव जाति का आदिगुरु माना जाता है, क्योंकि उन्होंने ही मनुष्यों को वेदों के परम ज्ञान से परिचित कराया था। यही कारण है कि इस पावन दिन को 'व्यास पूर्णिमा' के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन गुरु की पूजा करने से साक्षात व्यास जी की कृपा प्राप्त होती है। जब भगवान शिव बने 'आदिगुरु' गुरु पूर्णिमा का संबंध देवाधिदेव महादेव से भी गहराई से जुड़ा है। सनातन परंपरा के अनुसार, भगवान शिव को संसार का प्रथम गुरु यानी 'आदिगुरु' माना गया है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इसी पावन तिथि पर भगवान शिव ने हिमालय पर तपस्या में लीन सप्तर्षियों (सात ऋषियों) को योग, तंत्र और ब्रह्मांड के परम ज्ञान का उपदेश दिया था। इस प्रकार शिव जी गुरु रूप में प्रकट हुए और उन्होंने शिष्यों को अज्ञानता से मुक्ति का मार्ग दिखाया। ऋतु परिवर्तन और आध्यात्मिक महत्व आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टि से भी आषाढ़ पूर्णिमा का विशेष महत्व है। इस समय से वर्षा ऋतु का प्रारंभ होता है। प्राचीन काल में साधु-संत और परिव्राजक इस दिन से चार महीने के लिए एक ही स्थान पर रुककर 'चातुर्मास' व्रत की शुरुआत करते थे। इन चार महीनों में वे एक जगह ठहरकर शिष्यों को वेदाध्ययन, ध्यान और साधना की शिक्षा देते थे। यह समय नई फसलों के आगमन और प्रकृति के पुनर्जीवन का भी प्रतीक माना जाता है। कैसे करें गुरु पूजन? गुरु पूर्णिमा के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि के बाद साफ वस्त्र धारण करें। इसके बाद अपने गुरु के चित्र या उनकी साक्षात उपस्थिति में उनके चरणों को प्रणाम करें। उन्हें तिलक लगाएं, फूल, फल, वस्त्र और दक्षिणा अर्पित कर उनका आशीर्वाद लें। यदि गुरु समीप न हों, तो महर्षि वेदव्यास जी या भगवान शिव को गुरु मानकर उनका ध्यान व पूजन करना चाहिए।आज के समय में गुरु की शिक्षा का अर्थ केवल धार्मिक या आध्यात्मिक उपदेश नहीं है। यदि कोई शिक्षक हमें ईमानदारी सिखाता है, माता-पिता संयम सिखाते हैं, कोई वरिष्ठ अधिकारी कार्यनिष्ठा सिखाता है या कोई मित्र हमें बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा देता है तो वह भी हमारे जीवन में गुरु की भूमिका निभा रहा है। इसलिए गुरु पूर्णिमा केवल आश्रमों या विद्यालयों तक सीमित पर्व नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के प्रति कृतज्ञता का दिन है जिसने हमें बेहतर मनुष्य बनने में सहायता की। बदलते समय में गुरु की शिक्षाओं का स्वरूप भी बदल सकता है, लेकिन उनका मूल कभी नहीं बदलता। आज यदि गुरु संयम की बात करते हैं तो उसका अर्थ डिजिटल दुनिया में भी संयमित भाषा और जिम्मेदार व्यवहार है। यदि वे सत्य की बात करते हैं, तो उसका अर्थ फेक न्यूज साझा न करना भी है। यदि वे सेवा का संदेश देते हैं तो उसका अर्थ समाज और प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाना भी है। यही परंपरा की जीवंतता है कि उसके मूल्य समय के साथ नए रूप में सामने आते रहते हैं।
इस पर्व को सफल करने के लिए आपको करना होगा जीवन में बदलाव: गुरु पूर्णिमा का वास्तविक अर्थ तभी सार्थक होगा, जब यह पर्व केवल एक दिन का उत्सव न रह जाए। यदि अगले दिन से हमारे व्यवहार में थोड़ा अधिक धैर्य, थोड़ी अधिक विनम्रता, थोड़ा अधिक अनुशासन और थोड़ा अधिक संवेदनशीलता दिखाई दे, तभी यह पर्व सफल माना जाएगा। गुरु को सबसे बड़ी गुरु दक्षिणा महंगे उपहार नहीं, बल्कि श्रेष्ठ आचरण से मिलती है। अंततः सच्चा शिष्य वही है, जिसके जीवन को देखकर लोग उसके गुरु का सम्मान करें। गुरु की महानता उनके प्रवचनों से नहीं, बल्कि उनके शिष्यों के चरित्र से पहचानी जाती है। आज आवश्यकता नए गुरुओं की कम और सच्चे शिष्यों की अधिक है। यदि हम इस गुरु पूर्णिमा पर केवल एक शिक्षा को भी ईमानदारी से अपने जीवन में उतारने का संकल्प लें तो यही हमारी सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी और यही इस पर्व की वास्तविक सार्थकता भी।
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