- भाजपा और सुरजापुरी विकास परिषद के निशाने पर
अशोक झा/ सिलीगुड़ी: सीमांचल किशनगंज लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस से सांसद मोहम्मद जावेद के संस्कृत को 'बाहर से आई भाषा' बताए जाने वाले बयान पर बीजेपी और सुरजापुरी विकास परिषद की ओर से तीखी प्रतिक्रिया दी गई है। बीजेपी ने इसे तुष्टीकरण की राजनीति और भारतीय अस्मिता व सभ्यता का अपमान करार दिया तो सुरजापुरी विकास परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष भाई ताराचंद ने माफी की मांग की है।
संस्कृत भाषा पर कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद के बयान की बीजेपी ने आलोचना की। बिहार के किशनगंज निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा सदस्य जावेद को यह कहते हुए सुना गया, 'बिहार में उर्दू दूसरी भाषा है। हम दूसरी भाषा को इस तरह खत्म नहीं होने देंगे। हम चाहते हैं कि उर्दू, जो हिंदुस्तान के लोगों की भाषा है और बाहर से नहीं आई है, उसे बचाया जाए।' उन्होंने कहा, 'संस्कृत बाहर से आई, अंग्रेजी बाहर से आई। हिंदी और उर्दू हमारी भाषाएं हैं। वे हिंदुस्तान में पैदा हुईं।'इन टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया देते हुए, बीजेपी प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने 'एक्स' पर एक पोस्ट में कहा कि ऐसी सोच केवल उन्हीं लोगों की हो सकती है जो सनातन में विश्वास नहीं करते। उन्होंने 'एक्स' पर एक वीडियो संदेश में कहा, 'जो लोग बाबर को अपना आदर्श मानते हैं, उनके लिए संस्कृत एक विदेशी भाषा है। हर भारतीय भाषा भारत की है। यह बयान स्पष्ट रूप से तुष्टीकरण की मानसिकता को दर्शाता है।'
भंडारी ने कहा, 'उन्होंने राम मंदिर को बेकार कहा, और अब वे संस्कृत को विदेशी भाषा कह रहे हैं। ऐसी सोच मुगलों की थी। वे आक्रमणकारियों को अपना आदर्श मानते हैं और भगवान श्री राम को काल्पनिक कहते हैं।' बीजेपी के एक और प्रवक्ता, शहजाद पूनावाला ने कहा कि कांग्रेस का भारत, उसकी अस्मिता और सभ्यता का अपमान करने का इतिहास रहा है। उन्होंने कहा, 'हमने न केवल सैम पित्रोदा को यह कहते हुए सुना है कि भारतीय अफ्रीकी और चीनी जैसे दिखते हैं, बल्कि अब एक कांग्रेस सांसद ने दावा किया है कि संस्कृत बाहर से आई है। हर कोई जानता है कि संस्कृत एक भारतीय भाषा है। यह भारत की भाषा है और भारत की सभ्यतागत विरासत से पैदा हुई है।'
पूनावाला ने वीडियो जारी कर अपने बयान में कहा कि कांग्रेस के वे सदस्य जिनके नेता विदेश से आए हैं, उन्हें यह दावा करना बंद कर देना चाहिए कि संस्कृत भारत के बाहर से आई है। बीजेपी प्रवक्ता का इशारा सोनिया गांधी के इतालवी मूल की ओर माना जा रहा है। पूनावाला ने कहा, 'उनके नेता आयातित हैं, उनकी पार्टी आयातित ताकतों और विदेशी ताकतों, अंग्रेजों द्वारा बनाई गई थी। वे ऐसे दावे कर रहे हैं। कांग्रेस की स्थापना एलन ऑक्टेवियन ह्यूम द्वारा की गई थी। इसके कई विदेशी अध्यक्ष रहे हैं।' उन्होंने कहा, 'सोनिया गांधी खुद इटली से आई हैं और राहुल गांधी को भारत के बजाय विदेश में रहना ज्यादा पसंद है। उन्हें भारतीय पहचान, भारतीय संस्कृति और भारतीय सभ्यता का अपमान करना बंद कर देना चाहिए।' भाई ताराचंद ने तुरंत माफी मांगने की मांग की है। उन्होंने अवैध घुसपैठिए,सरकारी जमीन की लूट,सुरजापुरी को उनका हक दिलाने की माँग की। मै खुद इस सीमांचल के संस्कृत के प्रकांड विद्वान रहे स्वर्गीय पंडित यधोधर झा का पुत्र हूं। मैने उनसे जो कुछ सिखा और जाना हूं वह आपको बता रहा हूं। निर्णय आपको करना है कि संस्कृत देशी या विदेशी भाषा है।
संस्कृत भारत के साहित्यिक ,सांस्कृतिक ,धार्मिक ,आध्यात्मिक ,नैतिक ,राजनैतिक और ऐतिहासिक जीवन की व्यवस्था भी इसी भाषा में मिलती है | यह ग्रीक ,लैटिन ,जर्मन ,गोथिक आदि अनेक भारोपीय परिवार की भाषाओ की जननी है | भारत के सभी प्रांतीय भाषाओं मे संस्कृत शब्द प्राप्त होते है | यहां तक की बङ्ग्ला और दक्षिणभारत की सभी प्रान्तीय भाषाओं में अधिकांश शब्द संस्कृत भाषा के ही है
संस्कृत वेद से पूर्व भी रही होगी लेकिन उसका कोई प्रमाण हमारे पास अभी तक नहीं है। इस भाषा को बोलने वाले आर्य थे । आर्य किसी जाति विशेष का नाम नहीं है । यह शब्द श्रेष्ठमानव के लिए प्रयुक्त होता है । ऋग्वेद की तिथि निर्धारण करना अत्यधिक मुष्किल कार्य है किंतु फिर भी विद्वानों के अनुसार ईसापूर्व 3500ई . में सम्भवतः ऋग्वेद की रचन हुई होगा । संस्कृत के रूप में समय - समय परपरिवर्तन आए । त्रग्वेद की भाषा वैदिक संस्कृत है । वह संस्कृत से भिन्न है । वैदिक साहित्य के बाद अर्थात् रामायण की भाषा को लौकिक संस्कृत कहा जाता है । संस्कृत शब्द का प्रयोग भाषा विशेष के अर्थ में सर्वप्रथम रामायण में दिखाई देता है । सुन्दर काण्ड में हनुमान यह विचार करते हैं कि सीताजी से किस भाषा में वार्तालाप किया जाए । यदि संस्कृत भाषा में बात करूंगा तो सीता मुझे रावण समझ कर डर जायेंगी ।यदि वाचं प्रदास्यामि द्विजातिरिव संस्कृताम् |रावणं मन्यमाना मां सीता भीता भविष्यति ।
जब भाषा का सर्वसाधारण में प्रचार कम होने लगा तब पालि प्राकृत अपभ्रंश आदि बोलचाल की भाषा बन गई । उस समय महाकवि दण्डी ने प्राकृत भाषा से भेद दिखलाने के समय संस्कृत का प्रयोग भाषा के लिए किया। प्राचीन व्याकरणों ने इसका नाम संस्कृत इसलिए रखा है क्योंकि सम्। पूर्वक धातु से निष्पन्न होकर क्त प्रत्यय लगने के पश्चात् यह भाषा संस्कृत | कहलाई क्योंकि यह शुद्ध संस्कारयुक्त भाषा है । पाणिनि आदि व्याकरण के नियमों
के संस्कार से युक्त होने के कारण यह पवित्र भाषा संस्कृत भाषा । केहलाने लगी । संस्कृत भाषा का क्रमिक विकास हुआ । ऐतिहासिक अध्ययनों से विदित होता है कि भारत में आर्य भाषा ने दो रूपों में अपना विकास किया । उसका पहला रूप हमें तत्कालीन जन सामान्य की भाषा के रूप में और दूसरा । साहित्य की भाषा के रुप में मिलता है । बोलचाल की भाषाएँ प्रादेशिक भाषाएं थीं । प्रादेशिक भाषाओं के प्रबल पक्षपाती जैन और बौद्ध के लोकभाषा संबन्धी उद्योगों ने बहुत चाहा कि वे संस्कृत के प्रभाव को अपने अंदर सीमित कर लें , किंतु इसके विपरीत संस्कृत का निरंतर विकास होता गया । पाणिनि व्याकरण भी संस्कृत को बांध न सकी । उसका निरंतर विकास होता गया । ईसा की प्रथम शताब्दी के आस पास के संस्कृत नाटकों का अध्ययन करके हमें पता चलता है कि अभिजात वर्ग की भाषा संस्कृत थी और निम्न वर्ग के पात्र तथा स्त्रियां प्राकृत भाषा का प्रयोग करती थीं। भारत के विभिन्न भागों में जैसे उत्तरी भारत में जहाँ एक ओर अनार्य संस्कारों का पूर्णतया आर्य करण होकर एक समुचित संस्कृति का जिसे हिंदू संस्कृति कहा जा सकता था। प्रतिष्ठित हो चुकी थी , वहां दूसरी ओर धर्म , दर्शन और कथाओं के निर्माण के लिए संस्कृत को ही एक मत से अपनाया जाने लगा। यह क्रम ईसा पूर्व की पहली सहस्राब्दी तक चलता रहा । आर्यभाषा की विशेषता यह थी कि उसने अपने आँचल के नीचे भारत के जन साधारण को समेट लिया था। दक्षिण -भारत में आर्यभाषा के दोनों रुप संस्कृत और प्राकृत अभी तक पूर्ण स्थान नहीं बना सके थे । किंतु धीरे-धीरे सुसभ्य द्रविड़ों ने उसको अपना बना लिया जिसके फलस्वरूप तेलगू , कन्नड़ और मलयालम तीनों भाषाओं का साहित्य संस्कृत के तत्सम और तद्भव शब्दों से भर गया। लौकिक क्षेत्र में आने से पूर्व संस्कृत का नाम देव वाणी था। व्याकरण ग्रन्थों की रचना के बाद शिक्षित समाज जिस भाषा का प्रयोग करता था वह संस्कृत थी और अशिक्षित जन सामान्य की बोलचाल की भाषा ' प्राकृत ' कही जाने लगी । ब्राह्मण धर्म के अनुयायी समाज ने संस्कृत को अपनाया और महावीर , गौतम जैसे ब्राह्मण धर्म विरोधी , समाज सुधारकों ने प्राकृत की परंपरा को आगे बढ़ाया। किंतु आगे चलकर जैन बौद्ध सभी धर्मों के अनुयायियों ने सैद्धांतिक मत की स्थापना के लिए संस्कृत भाषा में ग्रंथ रचना करना प्रारंभ किया।
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