अशोक झा/ सिलीगुड़ी: गुप्त नवरात्रि में देवी सती की दस महाविद्याओं की कृपा पाने के लिए तंत्र-मंत्र से जुड़े लोग विशेष साधना करते हैं। हिन्दी पंचांग में एक साल में चार बार नवरात्रियां आती हैं। पहली चैत्र मास में, दूसरी आषाढ़ में, तीसरी आश्विन में और चौथी माघ मास में। चैत्र और आश्विन मास में प्रकट नवरात्रि रहती है, जबकि आषाढ़ और माघ मास में आने वाली नवरात्रि को गुप्त नवरात्रि कहते हैं। आषाढ़ गुप्त नवरात्रि का आज 23 जुलाई को समापन हो गया।
माँ धूमावती,अन्य देवियों के विपरीत, माँ धूमावती को एक वृद्ध, विधवा और संन्यासिनी के रूप में दर्शाया जाता है। उनके इस विग्रह में सुनहरा वृद्ध चेहरा, बाहर निकले हुए दाँत और गले में मुंडमाला (खोपड़ियों की माला) तथा रुद्राक्ष की मालाएँ दिखाई दे रही हैं, जो श्मशान और जीवन की नश्वरता से उनके संबंध को दर्शाती हैं। वह ब्रह्मांडीय शून्यता, प्रलय और सांसारिक मोह-माया से मुक्ति का प्रतीक हैं। उनका यह रूप भक्तों को बाहरी सुंदरता से परे परम सत्य को देखने की प्रेरणा देता है।
गुप्त नवरात्रि में साधना-सिद्धि का दुर्लभ अवसर है। उन्होंने गुप्त नवरात्रि के आध्यात्मिक और तांत्रिक महत्व का वर्णन किया। यह काल मां आदिशक्ति की उपासना, मंत्र-जप और साधना-सिद्धि का दुर्लभ अवसर है। श्रद्धा और नियमपूर्वक की गई देवी आराधना से साधक को विशेष आध्यात्मिक शक्ति और देवी कृपा प्राप्त होती है। श्रीयंत्र को मां त्रिपुरासुंदरी का साक्षात स्वरूप बताते हुए कहा कि शास्त्रोक्त विधि से इसकी उपासना करने पर सुख, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। साथ ही सद्गुरु से प्राप्त मंत्र दीक्षा को साधना का आधार बताते हुए नियमित मंत्र-जप का महत्व भी समझाया। कथा में प्रतिदिन जनप्रतिनिधि, प्रशासनिक अधिकारी और बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हो रहे हैं। 25 जुलाई को आने वाली देवशयनी एकादशी से पहले पड़ने वाली भड़ली नवमी को अबूझ मुहूर्त माना जाता है। इसलिए इस दिन विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश, नया व्यापार या अन्य शुभ कार्य बिना मुहूर्त निकाले किए जा सकते हैं। पंडित अभय झा के मुताबिक, भड़ली नवमी गुप्त नवरात्रि की अंतिम तिथि है। इस दिन भगवान गणेश, भगवान शिव और माता दुर्गा की विशेष आराधना का महत्व बताया गया है। साथ ही जरूरतमंद लोगों को धन, अन्न, वस्त्र, छाता, जूते-चप्पल जैसी उपयोगी वस्तुओं का दान करना चाहिए।भगवान गणेश की पूजा में सबसे पहले भगवान को पंचामृत से स्नान कराएं। इसके बाद उन्हें नए वस्त्र और फूलों की माला पहनाकर चंदन का तिलक लगाएं। ॐ गं गणेशाय नमः मंत्र का जप करें। गणेश जी को दूर्वा के साथ लड्डू का भोग अर्पित करें। धूप-दीप जलाकर आरती करें। भगवान शिव की पूजा में तांबे के लोटे से शिवलिंग पर जल अर्पित करें। इसके बाद पंचामृत से अभिषेक करें और फिर दोबारा जल चढ़ाएं। पंचामृत दूध, दही, घी, मिश्री और शहद से तैयार किया जाता है। अभिषेक के बाद शिवलिंग पर चंदन लगाएं और बिल्व पत्र, फूल, धतूरा और आंकड़े के फूल अर्पित करें। दीपक जलाकर ॐ उमामहेश्वराय नमः मंत्र का रुद्राक्ष की माला से जप करें। शिव जी के साथ माता पार्वती की भी पूजा करें और उन्हें लाल चुनरी, लाल फूल अर्पित करें। देवी दुर्गा को माता पार्वती का ही स्वरूप माना जाता है।
पति-पत्नी को इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा एक साथ करनी चाहिए। ऐसा करने से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है और वैवाहिक जीवन में प्रेम व सामंजस्य बढ़ता है।
भड़ली नवमी पर माता दुर्गा की विशेष आराधना भी की जाती है। पूजा में माता को लाल चुनरी अर्पित करें। इसके बाद छोटी कन्याओं को सात्विक भोजन कराएं और उन्हें दक्षिणा व उपहार देकर सम्मानित करें। इस दिन कन्या पूजन का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है।।इस तिथि पर भगवान हनुमान के सामने दीपक जलाकर सुंदरकांड और हनुमान चालीसा का पाठ करना भी शुभ माना जाता है। इच्छानुसार ॐ रां रामाय नमः मंत्र का जप किया जा सकता है। शिवलिंग पर जल और दूध अर्पित करते हुए ॐ नमः शिवाय मंत्र का जप करें। बाल गोपाल को माखन-मिश्री और तुलसी अर्पित करें। किसी मंदिर में पूजा सामग्री का दान करें और संभव हो तो माता दुर्गा के किसी प्राचीन या प्रसिद्ध मंदिर में दर्शन-पूजन करें।
गुप्त नवरात्रि में होती है महाविद्याओं की साधना: आषाढ़ गुप्त नवरात्रि में देवी सती के दस महाविद्या स्वरूपों की साधना की जाती है। यह साधना मुख्य रूप से तंत्र-मंत्र से जुड़े साधक करते हैं। इन दस महाविद्याओं में मां काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला देवी शामिल हैं। दो ऋतुओं के संधिकाल में आती है नवरात्रि: नवरात्रि का पर्व ऋतुओं के परिवर्तन से भी जुड़ा माना जाता है। जब एक ऋतु समाप्त होती है और दूसरी शुरू होती है, उस समय को संधिकाल कहा जाता है। वर्ष में चार बार ऐसे संधिकाल में नवरात्रि आती है। आषाढ़ की गुप्त नवरात्रि गर्मी और वर्षा ऋतु के बीच पड़ती है। इस दौरान पूजा-पाठ के साथ स्वास्थ्य का ध्यान रखने और संतुलित खान-पान अपनाने की भी सलाह दी जाती है।देवशयनी एकादशी से शुरू होता है चातुर्मास: 0भड़ली नवमी के दो दिन बाद 25 जुलाई को देवशयनी एकादशी रहेगी। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं और देवउठनी एकादशी पर जागते हैं। इस वर्ष तिथियों के घट-बढ़ के कारण देवउठनी एकादशी 20 और 21 नवंबर दोनों दिन रहेगी। भगवान विष्णु के विश्राम काल को चातुर्मास कहा जाता है। इस अवधि में विवाह, सगाई, मुंडन, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। करीब चार महीने तक शुभ मुहूर्त नहीं रहते, इसलिए देवशयनी एकादशी से पहले आने वाली भड़ली नवमी पर पूजा, दान और धर्म-कर्म का विशेष महत्व माना जाता है।
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