- रथयात्रा से जुड़ी परंपरा को जानने के लिए शामिल हो इस अनंत यात्रा में
अशोक झा/ सिलीगुड़ी: पुरातन परंपराओं और अटूट आस्था की भूमि है ओडिशा की पुरी नगरी. यहां स्थित जगन्ननाथ मंदिर के भव्य गर्भगृह में भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और लाडली बहन सुभद्रा के साथ विराजते हैं. साल के 364 दिन भक्त भगवान के द्वार जाते हैं, लेकिन आषाढ़ मास आते ही एक अनूठा चमत्कार होता है. जब भगवान जगन्नाथ स्वयं अपने सिंहासन से उतरकर, मंदिर की चौखट लांघकर, आम जनता के बीच सड़क पर आ जाते हैं और इसे जगन्नाथ रथ यात्रा कहा जाता है. यह यात्रा जगन्नाथ मंदिर से गुंडीचा मंदिर तक जाती है जिसे भगवान जगन्नाथ की मौसी का घर भी कहा जाता है. पंचांग के अनुसार इस साल 16 जुलाई 2026 को शुरू होगी और 24 जुलाई 2026 को समाप्त होगी. आइए जानते हैं कि भगवान जगन्नाथ साल में एक बार ही क्यों गर्भगृह से बाहर निकलकर यात्रा पर जाते हैं।
साल में एक बार गर्भगृह से बाहर आते हैं भगवान जगन्नाथ
भगवान जगन्नाथ को 'पतित पावन' कहा जाता है- यानी जो गिरते हुओं को उठा ले और हर आत्मा का उद्धार करे. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एक दौर ऐसा भी था जब समाज के कुछ वंचित वर्गों को मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति नहीं थी. तब भगवान ने सोचा- 'यदि मेरे बच्चे मेरे पास नहीं आ सकते, तो क्या हुआ? मैं खुद उनके पास जाऊंगा। जगन्नाथ रथयात्रा में एक ऐसा नजारा देखने को मिलता है, जो देश के किसी और बड़े धार्मिक कार्यक्रम में नहीं दिखता। ओडिशा के गजपति महाराज (पुरी के पारंपरिक राजा) भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा के रथों के सामने सोने के हत्थे वाली झाड़ू से साफ-सफाई करते हैं।
इस भव्य यात्रा से पहले एक विशेष परंपरा निभाई जाती है, जिसे 'छेरा पहरा' कहा जाता है। इस रस्म में पुरी के गजपति महाराज स्वयं सोने के हैंडल वाली झाड़ू से रथ के सामने की जमीन की सफाई करते हैं।धार्मिक मान्यता है कि इस परंपरा के माध्यम से यह संदेश दिया जाता है कि भगवान के सामने हर व्यक्ति समान है और सेवा भाव सबसे बड़ा धर्म है।
जगन्नाथ रथ यात्रा 2026 कब होगी?: हिंदू पंचांग के अनुसार जगन्नाथ रथ यात्रा आषाढ़ शुक्ल द्वितीया तिथि को निकाली जाती है। साल 2026 में यह पवित्र रथ यात्रा 16 जुलाई 2026 से शुरू होगी। इस दिन भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा अपने-अपने विशाल रथों पर सवार होकर गुंडिचा मंदिर की ओर प्रस्थान करेंगे।रथ यात्रा के दौरान लाखों श्रद्धालु भगवान के दर्शन और रथ खींचने के लिए पुरी पहुंचते हैं। यह उत्सव कई दिनों तक चलता है और भगवान की वापसी यात्रा यानी बहुड़ा यात्रा के साथ इसका समापन होता है।क्यों जाते हैं हर साल मौसी के घर?
पुरी में प्रचलित लोकमान्यताओं के अनुसार, जब भगवान जगन्नाथ पहली बार अपनी मौसी के यहां पहुंचे तो उनका बड़े प्रेम और स्नेह से स्वागत किया गया. मौसी ने भगवान से आग्रह किया कि वे हर वर्ष उनसे मिलने अवश्य आया करें. कहा जाता है कि भगवान ने भी उनके स्नेह का मान रखते हुए प्रतिवर्ष आने का आश्वासन दिया. तभी से रथयात्रा के दौरान भगवान के मौसी के घर जाने की परंपरा चली आ रही है. इसे शास्त्रीय तथ्य के बजाय पुरी की प्राचीन लोकमान्यता के रूप में ही देखा जाता है।
.कितने दिन रुकते हैं भगवान?
रथयात्रा के दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा अपने-अपने रथों पर सवार होकर श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं. यहां तीनों विग्रह लगभग सात दिन तक विराजमान रहते हैं. इस दौरान लाखों श्रद्धालु गुंडिचा मंदिर पहुंचकर दर्शन करते हैं. सात दिन पूरे होने के बाद भगवान बहुदा यात्रा के साथ श्रीमंदिर लौटते हैं.
7 दिन का प्रवास: कैसे बीतते हैं भगवान के दिन?
रथयात्रा का पहला दिन भगवान के श्रीमंदिर से प्रस्थान और गुंडिचा मंदिर पहुंचने का होता है. दूसरे दिन विशेष अनुष्ठान के बाद तीनों विग्रहों को रथ से उतारकर आडप मंडप में विराजमान कराया जाता है. इसके बाद कई दिनों तक विशेष पूजा, श्रृंगार, भोग और दर्शन की परंपरा चलती है. देश-विदेश से आने वाले लाखों श्रद्धालु इन दिनों भगवान के दर्शन कर स्वयं को धन्य मानते हैं.इसी प्रवास के दौरान हेरा पंचमी का पर्व भी मनाया जाता है. लोकमान्यता है कि माता लक्ष्मी भगवान जगन्नाथ को वापस श्रीमंदिर बुलाने के लिए गुंडिचा मंदिर पहुंचती हैं. यह रथयात्रा का सबसे भावुक और लोकप्रिय प्रसंग माना जाता है. सात दिन पूरे होने पर बहुदा यात्रा शुरू होती है. भगवान अपने रथों पर सवार होकर श्रीमंदिर लौटते हैं. वापसी के दौरान उनका रथ मौसी मां (अर्धशोशिनी) मंदिर पर रुकता है, जहां उनका विशेष स्वागत किया जाता है।
क्या खाते हैं भगवान?: बहुदा यात्रा के दौरान मौसी मां मंदिर में भगवान जगन्नाथ को पोडा पीठा का भोग लगाया जाता है. यह ओडिशा का प्रसिद्ध पारंपरिक पकवान है, जिसे चावल, गुड़, दाल, नारियल और घी से तैयार कर धीमी आंच पर पकाया जाता है. लोकमान्यता है कि स्नान पूर्णिमा के बाद भगवान अस्वस्थ हो जाते हैं. ऐसे में मौसी मां उन्हें स्नेहपूर्वक पोड़ा पीठा खिलाती हैं. यह भोग केवल भोजन नहीं, बल्कि मौसी के वात्सल्य, सेवा और अपनत्व का प्रतीक माना जाता है।
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