- बंगाल में लोगों के बीच दोहरी खुशी , एक ओर जमाई षष्ठी तो दूसरी ओर बंगाल दिवस
- पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार तथा उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में मनाया जा रहा पर्व
अशोक झा/ कोलकाता: शनिवार को बंग समाज की ओर से पारंपरिक पर्व जमाई षष्ठी पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। जमाई षष्ठी विशेष रूप से पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार तथा उत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों में पारंपरिक एवं सांस्कृतिक उत्सव के रूप में मनाई जाती है। इस दिन घरों में उत्सव जैसा वातावरण होता है, जहाँ कन्या के माता-पिता अपने जमाई को ससम्मान आमंत्रित कर उनका भव्य स्वागत करते हैं।परंपरा के अनुसार, उत्सव का आरम्भ देवी षष्ठी की पूजा से होता है, जिसमें सास अपने परिवार के सुख-समृद्धि और संतति के कल्याण की कामना करते हुए देवी से आशीर्वाद की प्रार्थना करती हैं। पूजा के पश्चात सास द्वारा अपने दामाद का स्वागत किया जाता है, जिसमें आरती, तिलक और कलाई पर पवित्र पीले धागे को बाँधने की परंपरा प्रमुख मानी जाती है, जो सुरक्षा और सौभाग्य का प्रतीक है। सुबह स्नान और पूजा-पाठ के बाद श्रद्धालु काली मंदिर सहित अन्य मंदिरों में पूजा-अर्चना करने पहुंचे। ज्येष्ठ महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाए जाने वाले इस लोक उत्सव की परंपरा सदियों से चली आ रही है। इस वर्ष जमाई षष्ठी का आयोजन आज 20 जून 2026, शनिवार को किया जा रहा है। जमाई षष्ठी को अरण्य षष्ठी के नाम से भी जाना जाता है। यह विशेष रूप से सास और दामाद के रिश्ते से जुड़ा पर्व माना जाता है, लेकिन इसमें बेटी और नाती-पोतों की भी अहम भूमिका होती है। इस दिन सास मां षष्ठी देवी की पूजा कर अपनी बेटी, दामाद और नाती-नातिनों के सुख, समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करती हैं।
बंगाल में 'बारह महीने में तेरह त्योहार' वाली कहावत को यह पर्व भी खास बनाता है। जिन परिवारों में बेटी, दामाद और ससुराल पक्ष के रिश्ते जुड़े होते हैं, वहां जमाई षष्ठी का आयोजन उत्साह के साथ किया जाता है। लेकिन इस परंपरा की शुरुआत आखिर कैसे हुई, इसके पीछे भी एक लोक मान्यता और धार्मिक कथा जुड़ी हुई है।
पुराने समय में विवाह के बाद बेटियां लंबे समय तक अपने मायके नहीं आ पाती थीं। मान्यता के अनुसार पहले जब तक बेटी संतानवती नहीं होती थी, तब तक कई माता-पिता अपनी बेटी के ससुराल जाने से बचते थे। उस समय कम उम्र में विवाह होने के कारण कई महिलाओं को मातृत्व से जुड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ता था।
ऐसे समय में बेटी से मिलने और उसके सुख-दुख को जानने के लिए जमाई षष्ठी की परंपरा शुरू होने की बात कही जाती है। इस दिन बेटी और दामाद को घर बुलाकर माता-पिता अपनी बेटी का हाल जान पाते थे। साथ ही यह कामना भी की जाती थी कि बेटी अपने ससुराल में सुख और शांति से रहे।
जमाई षष्ठी की कथा मां षष्ठी देवी से जुड़ी हुई है। लोककथा के अनुसार एक महिला अपने घर में बनने वाले भोजन को छिपाकर खा लिया करती थी और खाने की कमी का दोष बिल्ली पर लगा देती थी। वह कहती थी कि बिल्ली रोज घर का खाना चुरा ले जाती है।
मां षष्ठी का वाहन बिल्ली मानी जाती है। अपनी सवारी पर बिना वजह आरोप लगाए जाने से मां षष्ठी नाराज हो गईं। कहा जाता है कि देवी के श्राप के कारण उस महिला के बच्चों का जन्म के बाद निधन होने लगा।
बार-बार संतान खोने के कारण उसके ससुराल वाले भी नाराज हो गए और उसे घर से निकाल दिया। दुखी होकर वह जंगल में जाकर रोने लगी। तभी मां षष्ठी एक वृद्ध महिला के रूप में उसके सामने आईं और उसे मां षष्ठी की पूजा करने की सलाह दी।
महिला ने अपनी गलती स्वीकार की और पूरी श्रद्धा के साथ मां षष्ठी की आराधना की। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर देवी ने उसके बच्चों को जीवनदान दे दिया।
लोककथा के अनुसार काफी समय तक बेटी से दूर रहने के कारण उसके माता-पिता भी चिंतित थे। उन्होंने ज्येष्ठ महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को बेटी और दामाद को घर बुलाया। बेटी और दामाद के आने के बाद सभी गलतफहमियां दूर हो गईं। तभी से यह दिन जमाई षष्ठी के रूप में प्रसिद्ध हो गया।
समय के साथ इस पर्व के तौर-तरीकों में बदलाव आया है, लेकिन इसका भाव आज भी वही है। अब जमाई षष्ठी परिवार के साथ मिलकर खुशी मनाने का अवसर बन गया है। इस दिन घर में हंसी-मजाक, पारंपरिक भोजन और रिश्तों की गर्माहट देखने को मिलती है।
सुबह सास मां षष्ठी की पूजा करती हैं और बेटी, दामाद तथा नाती-नातिनों के लिए मंगलकामना करती हैं। इसके बाद दोपहर में विशेष भोजन का आयोजन किया जाता है। पारंपरिक रूप से घर में तरह-तरह के पकवान बनाए जाते हैं।
हालांकि बदलते समय के साथ कई परिवार अब घर की जगह रेस्तरां में जाकर भी जमाई षष्ठी मनाते हैं। इस मौके पर उपहारों के आदान-प्रदान की परंपरा भी निभाई जाती है। यह पर्व आज भी बंगाली समाज में रिश्तों के सम्मान, प्रेम और पारिवारिक जुड़ाव का प्रतीक बना हुआ है।
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