-पार्टी में 2011में टीएमसी युवा नेता के तौर पर जब नहीं मिला तो कुछ करने का किया था निर्णय
पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक कहावत बड़ी मशहूर है कि यहां हवाएं भी राजनीति की खुशबू लेकर चलती हैं। लेकिन पिछले कुछ सालों में बंगाल की इन हवाओं ने जो रुख बदला है, उसने बड़े-बड़े सियासी पंडितों के चश्मे उतार दिए हैं। कल्पना करिए कि एक ऐसा नेता जो कभी ममता बनर्जी का दायां हाथ हुआ करता था, जो टीएमसी के संगठन की रीढ़ था, वही नेता एक दिन अपनी 'दीदी' के सामने खड़ा हो जाता है। सिर्फ खड़ा ही नहीं होता, बल्कि उन्हें उनके ही गढ़ में चुनौती देता है और हरा देता है।हम बात कर रहे हैं सुवेंदु अधिकारी की। वही शुभेंदु जिन्होंने 2021 में नंदीग्राम में ममता बनर्जी को मात दी थी और अब 2026 के सियासी रण में भवानीपुर जैसी हाई-प्रोफाइल सीट पर ममता को शिकस्त देकर यह साबित कर दिया कि बंगाल की राजनीति का नया 'ध्रुव' अब कौन है।यह सिर्फ एक चुनाव जीतने या हारने की बात नहीं है. यह कहानी है उस रंजिश की जो अब पूरी तरह से निजी हो चुकी है। शुभेंदु अधिकारी ने न केवल ममता को हराया है, बल्कि उन्होंने तृणमूल कांग्रेस के उस अभेद्य किले को भी ढहा दिया है जिसे ममता ने सालों की मेहनत से बनाया था। बंगाल में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक बदलाव के तहत, शुभेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, जिससे तृणमूल कांग्रेस के 15 साल के शासन का अंत हो गया। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 294 सदस्यीय विधानसभा में 207 सीटें जीतकर मजबूत जनादेश दिया, जबकि टीएमसी 80 सीटों तक सिमट गई। इस कहानी की जड़ें 21 जुलाई 1993 की उस घटना में छिपी हैं, जिसने ममता बनर्जी के राजनीतिक जीवन को एक नई दिशा दी थी। कोलकाता में 'राइटर्स चलो' आंदोलन के दौरान हुई पुलिस फायरिंग का दिन। ममता बनर्जी उस वक्त यूथ कांग्रेस की नेता थीं। वह राइटर्स बिल्डिंग की तरफ एक विशाल मार्च की अगुआई कर रही थीं। पुलिस की गोलीबारी में 13 प्रदर्शनकारी मारे गए थे। इस घटना ने बंगाल की राजनीति को हिलाकर रख दिया। अंततः यह ममता के आंदोलन का एक भावनात्मक और राजनीतिक प्रतीक बन गया।
तब से ममता बनर्जी हर साल 21 जुलाई को शहीद दिवस मनाती हैं। तृणमूल कांग्रेस के गठन के बाद इस आयोजन का महत्व और कद बढ़ता गया।साल बीतते रहे और यह बंगाल के सबसे बड़े सालाना सियासी आयोजनों में से एक बन गया। पार्टी आज भी बेहद भव्य स्तर पर इसका आयोजन करती है।
अब साल 2011 को देखें।यही वो साल है, जहां से शुभेंदु अधिकारी से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण अध्याय शुरू हुआ था। उस साल ब्रिगेड परेड ग्राउंड और धर्मतल्ला में ममता बनर्जी की अगुआई में एक विशाल जनसभा हुई थी। अपार भीड़ थी।माहौल भावनात्मक था। उस समय तक ममता वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ एक केंद्रीय शक्ति के रूप में उभर चुकी थीं और बंगाल में परिवर्तन की लहर तेज हो गई थी।
उस समय शुभेंदु अधिकारी यूथ तृणमूल कांग्रेस के अध्यक्ष थे और पार्टी के अंदर एक महत्वपूर्ण संगठनात्मक चेहरे बन चुके थे।खासकर पूर्वी मिदनापुर और आसपास के इलाकों में जमीनी स्तर पर पार्टी को मजबूत करने में उनकी बड़ी भूमिका थी।लेकिन जानकारों की मानें तो उसी दिन शुभेंदु ने अंदर ही अंदर एक गहरे अलगाव का अनुभव किया।
उस रैली में शुभेंदु के अंदर कुछ बदल गया। हालांकि वह आधिकारिक तौर पर यूथ तृणमूल के अध्यक्ष थे, लेकिन उन्हें महसूस हुआ कि उन्हें धीरे-धीरे हाशिए पर धकेला जा रहा है।कार्यक्रम का प्रबंधन, मंच से घोषणाएं और पूरा समन्वय कुणाल घोष संभाल रहे थे। कुणाल उस वक्त पार्टी में काफी प्रभावशाली थे और ममता के बेहद करीबी माने जाते थे।
शुभेंदु मंच पर मौजूद तो थे, लेकिन उन्हें लगा कि उनकी कोई वास्तविक भूमिका ही नहीं है। कुणाल घोष घोषणाएं कर रहे थे, भीड़ में जोश भर रहे थे और पूरे कार्यक्रम का संचालन कर रहे थे।जबकि संगठन में बड़ा पद होने के बावजूद शुभेंदु शांत और निष्क्रिय बैठे रह गए। कई लोगों को लगा कि उन्हें सिर्फ वहां बैठने के लिए ही बिठाया गया था, असली कमान दूसरों के हाथ में थी। शुभेंदु जैसे राजनीतिक रूप से महत्वाकांक्षी और सक्रिय नेता के लिए वह पल भावनात्मक रूप से काफी भारी था. उन्हें अपना अपमान महसूस हुआ। फिर भी उन्होंने सार्वजनिक रूप से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। शायद कोई और नेता होता तो तुरंत विरोध दर्ज कराता। लेकिन शुभेंदु उस दिन चुप रहे। बाहर से कुछ नहीं दिखा, लेकिन अंदर ही अंदर दूरियों के बीज बोए जा चुके थे।उन्हें लगा कि कुणाल घोष का कद बढ़ रहा है और ममता ने खुद इसे अपनी मूक सहमति दी है।उसी पल से उनके मन में आहत स्वाभिमान के अंकुर फूटने लगे।
शुभेंदु को ममता बनर्जी, पार्टी लीडरशिप और अपने खड़े किए गए आंदोलन के बीच रहकर भी अकेलापन महसूस क्यों हो रहा था? इसका जवाब ममता बनर्जी की सियासत की शैली में भी छिपा है। ममता सड़क के आंदोलनों और जनता की लामबंदी से उभरी नेता हैं. वह पूर्ण राजनीतिक वफादारी और आंदोलन के भावनात्मक विमर्श पर केंद्रीय नियंत्रण को महत्व देती हैं। उनके आसपास का पॉलिटकल स्पेस अक्सर बहुत बारीकी से मैनेज किया जाता है। इस सबके बीच, मजबूत स्वतंत्र जनाधार वाले युवा नेता कई बार अपने प्रभाव को जाहिर करने के लिए पार्टी के अंदर ही प्रतिस्पर्धा करने लगते हैं।
शुभेंदु का व्यक्तित्व हमेशा से जिद्दी और स्वाभिमानी रहा है। एक बार जब उन्हें कोई बात चुभ जाती है, तो उसे भूलना उनके लिए मुश्किल होता है।वह घटना उनके मन में घर कर गई।
इसके बाद उन्हें एक और झटका लगा। शुरू में राजीव बनर्जी को युवा तृणमूल कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया जाना था। उन्हें कथित तौर पर आश्वासन भी मिल गया था। राजीव अपनी ऑस्ट्रेलिया यात्रा तक टालने के लिए तैयार थे। लेकिन आखिरी समय में पांसा पलटा और सौमित्र खान को यह जिम्मेदारी दे दी गई। इससे शुभेंदु उस संगठनात्मक स्पेस से बाहर हो गए। यह उनके लिए एक और बड़ा मानसिक झटका था।
उसी दौर में मुकुल रॉय तृणमूल कांग्रेस के सबसे शक्तिशाली नेताओं में से एक के रूप में उभर रहे थे। मुकुल और उनके बेटे शुभ्रांशु रॉय का प्रभाव युवा और संगठनात्मक राजनीति में बढ़ गया था। उस समय अभिषेक बनर्जी का उतना दबदबा नहीं था, जितना आज है। पार्टी में मुकुल रॉय की हैसियत बहुत बड़ी थी।धीरे-धीरे शुभेंदु को अपने और मुकुल रॉय के बीच का फर्क समझ आने लगा। उन्हें लगा कि वह पार्टी में नंबर दो की स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं, लेकिन वह जगह पहले से ही मुकुल रॉय के पास थी, जो ममता के बेहद करीबी थे और जिला संगठनों पर नियंत्रण रखते थे। एक समय था जब लोग खुलकर कहते थे- "ममता बनर्जी मुख्यमंत्री का चेहरा हैं, लेकिन मुकुल रॉय तृणमूल कांग्रेस के संगठनात्मक मुखिया हैं।" इसी बीच अभिषेक बनर्जी भी यूथ लीडरशिप स्ट्रक्चर में धीरे-धीरे उभरने लगे थे।पार्टी के अंदर यह चर्चा शुरू हो गई थी कि ममता का राजनीतिक उत्तराधिकारी कौन होगा- मुकुल रॉय या अभिषेक बनर्जी? दोनों खेमों के बीच एक मूक सत्ता संघर्ष साफ दिख रहा था।आखिर में मुकुल रॉय ने टीएमसी छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया। उससे पहले भाजपा नेताओं ने उन्हें खुलेआम निशाना बनाया था और "भाग ममता भाग, भाग मुकुल भाग" जैसे नारे लगाए थे। हालांकि उस समय अभिषेक बनर्जी के खिलाफ ऐसे नारे लगाने जैसी स्थिति नहीं थी। इन बदलते घटनाक्रमों के बीच शुभेंदु को अहसास होने लगा कि शायद एक दिन उन्हें भी तृणमूल छोड़नी पड़ेगी। बीजेपी नेता उनसे संपर्क करने लगे थे, लेकिन उनके पिता शिशिर अधिकारी एक पुराने कांग्रेसी और अनुभवी नेता थे। वो नहीं चाहते थे कि शुभेंदु भाजपा में जाएं। बताते हैं कि ममता बनर्जी ने खुद शुभेंदु को रोकने की कोशिश की थी। उन्होंने मतभेदों को सुलझाने के लिए शिशिर अधिकारी की मदद भी ली। शिशिर ने मध्यस्थता की कोशिश की, लेकिन तब तक असली टकराव ममता से नहीं, बल्कि पार्टी में अभिषेक बनर्जी के बढ़ते कद से बन चुका था. मुकुल रॉय तृणमूल में अपना कद घटने पर भाजपा की ओर बढ़ गए थे। कई लोगों का मानना था कि मुकुल रॉय ने विभिन्न आरोपों के दबाव में बीजेपी के सामने सरेंडर कर दिया था।
लेकिन शुभेंदु का मामला अलग था। बीजेपी उन्हें केवल एक दल बदलू नेता के रूप में नहीं बल्कि ममता बनर्जी के संभावित विकल्प के रूप में देख रही थी।भाजपा के रणनीतिकारों का मानना था कि शुभेंदु बंगाल में ममता विरोधी राजनीति का चेहरा बन सकते हैं। ठीक वैसे ही जैसे दशकों पहले एलके आडवाणी ने ममता बनर्जी को कांग्रेस के विकल्प के रूप में देखा था।
तृणमूल छोड़ने से पहले टीएमसी ने दीघा में एक भव्य सम्मेलन आयोजित किया था। पूर्वी मिदनापुर को शुभेंदु अधिकारी का गढ़ माना जाता था। उन्होंने इस आयोजन में पूरी जान झोंक दी थी।उन्हें उम्मीद थी कि इतने बड़े सफल आयोजन के लिए उन्हें पहचान मिलेगी, लेकिन सम्मेलन एक संगठनात्मक कार्यक्रम के बजाय केवल तृणमूल समर्थकों के उत्सव जैसा बनकर रह गया। वहां भी शुभेंदु को लगा कि उन्हें वह सम्मान और महत्व नहीं मिला, जिसके वह हकदार थे. इन अनुभवों ने टीएमसी से उनके अलगाव को और गहरा बना दिया। शुभेंदु ने दिसंबर 2020 में बीजेपी जॉइन की। भारतीय राजनीति में दल-बदल कोई नई बात नहीं है। वाजपेयी -आडवाणी के दौर में भी गोविंद बल्लभ पंत के पुत्र केसी पंत जैसे कई बड़े कांग्रेसी नेता बीजेपी में आए थे. लेकिन हर नेता का सफर अलग होता है. कुछ नेता नए दल में कभी ढल नहीं पाते, जबकि कुछ अपनी नई पहचान में ऐसे रच-बस जाते हैं कि लोग उनका पुराना ठिकाना भूल जाते हैं. सुषमा स्वराज इसका बेहतरीन उदाहरण हैं। सुषमा ने लोकदल-जनता पार्टी से राजनीतिक सफर शुरू किया और फिर बीजेपी की सबसे मुखर आवाज बन गईं।
शुभेंदु अधिकारी की जड़ें कांग्रेस और तृणमूल में थीं। युवावस्था में उनका आरएसएस से भी कुछ परोक्ष जुड़ाव रहा था. उनका असली उत्थान नंदीग्राम आंदोलन से हुआ, जहां भूमि अधिग्रहण के खिलाफ वह एक केंद्रीय नायक बनकर उभरे. नंदीग्राम ने उन्हें जननेता बना दिया।
19 दिसंबर 2020 को जब अमित शाह की मौजूदगी में शुभेंदु भाजपा में शामिल हुए, तो यह बंगाल की राजनीति का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ. उसके बाद 2021 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने ममता बनर्जी को नंदीग्राम में हरा दिया और विपक्ष के नेता बन गए।
बीजेपी में आने के बाद धीरे-धीरे उनकी आरएसएस से करीबी बढ़ीं।जब वह आरएसएस के गणवेश में एक कार्यक्रम में शामिल हुए तो खूब चर्चा हुई क्योंकि संघ के बड़े कार्यक्रमों में बिना संगठनात्मक पृष्ठभूमि वाले नेताओं को इतना महत्व कम ही मिलता है। बाद में शुभेंदु ने 25 जुलाई 2023 को मोहन भागवत के साथ एक कार्यक्रम अटेंड किया। इससे यह संदेश निकला कि संघ परिवार ने उन्हें पूरी तरह स्वीकार कर लिया है।
वक्त बीतने के साथ शुभेंदु अधिकारी पश्चिम बंगाल में हिंदुत्व की सबसे प्रखर आवाजों में से एक बन गए। वह ध्रुवीकरण, नागरिकता और घुसपैठ जैसे मुद्दों पर खुलकर बोलते हैं, जो बीजेपी-आरएसएस की मूल विचारधारा से मेल खाता है. उनकी संगठनात्मक क्षमता खासकर नंदीग्राम और ग्रामीण इलाकों में पकड़ ने उन्हें एक ताकतवर क्षेत्रीय ताकत बना दिया है.
बंगाल की राजनीति में हमेशा से एक और गहरी परत रही है- बंगाली अस्मिता, बहुलवाद और सांस्कृतिक विविधता. यह एक बड़ा राजनीतिक प्रश्न खड़ा करता है कि बंगाल के सामाजिक और सांस्कृतिक ढांचे में अति-हिंदुत्व की राजनीति को किस हद तक स्वीकार किया जाएगा? इस विषय पर आज भी बहस जारी है।इन सबके बावजूद बीजेपी और संघ परिवार के अंदर शुभेंदु अधिकारी ने अपनी स्थिति को काफी मजबूती से स्थापित कर लिया है। दिलचस्प यह है कि राजनीति से परे, वह अपनी बंगाली संस्कृति से गहराई से जुड़े हुए हैं।वह मछली के शौकीन हैं। यहां तक कि दिल्ली में जब मंत्री थे, तब उनके आवास पर कोलकाता से नियमित रूप से मछली जाती थी।
शुभेंदु स्वामी विवेकानंद के अनन्य भक्त हैं।पूरी गहनता से उनके साहित्य का अध्ययन करते हैं। उन्होंने शादी नहीं की है. बंगाल में बीजेपी के चुनिंदा नेताओं में वह ऐसे नेता हैं, जिन्हें राज्य और केंद्र दोनों ही सरकारों में काम करने का अनुभव हासिल है।
इस सबके बावजूद, सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यह है- क्या शुभेंदु अधिकारी की हार्डलाइन हिंदुत्व वाली राजनीति को बंगाल का व्यापक समाज आखिरकार कितना स्वीकार करेगा? यह एक ऐसा सवाल है जिसका जबाव केवल वक्त और आने वाले चुनाव ही दे पाएंगे। ( बंगाल से अशोक झा की रिपोर्ट )
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