अशोक झा/ कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के राजा बाजार इलाके में शुक्रवार को सड़क पर जुमे की नमाज पढ़ने को लेकर तनाव की स्थिति पैदा हो गई। पुलिस द्वारा सड़क खाली कराने की कोशिश के दौरान नमाजियों और पुलिसकर्मियों के बीच बहस और नारेबाजी हुई।इस दौरान वहां मौजूद लोगों और पुलिस की टीम के बीच हंगामा शुरू हो गया। पुलिस नमाजियों को सड़क से हटाने की कोशिश कर रही थी, जबकि नमाजी सड़क पर ही नमाज पढ़ने को लेकर अड़े हुए थे। इस दौरान दोनों पक्षों में कहासुनी हुई। मौके पर मौजूद नमाजियों ने खूब नारेबाजी की।।गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन और सुवेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री के रूप में शपथग्रहण के बाद यह पहली नामज हो रही थी। सुवेंदु अधिकारी ने पद संभालते ही सड़कों पर किसी भी तरह की धार्मिक गतिविधियों पर रोक लगाने की ऐलान कर चुके हैं। सरकार की ओर से आदेश जारी किया गया था कि सड़क पर किसी भी तरह का धार्मिक आयोजन नहीं हो सकता है। चाहे वह किसी भी धर्म से जुड़ा हो। नमाजियों ने पुलिस के खिलाफ की नारेबाजी:
कोलकाता के राजा बाजार में मुस्लिम समुदाय कई सालों से सड़कों पर नमाज पढ़ते आए हैं। लेकिन सरकार के आदेश के बाद शुक्रवार को इलाके में पहुंची पुलिस ने नमाजियों को सड़क पर नमाज न पढ़ने की हिदायत दी। हालांकि, नमाजी पुलिस को नजरअंदाज करते हुए अपनी बातों पर अड़े रहें। इस दौरान मुस्लिम समुदाय के लोगों ने जमकर नारेबाजी की।
इलाके में सुरक्षाबलों की तैनाती: स्थिति को तनावपूर्ण होता देख प्रशासन ने मौके पर बड़ी संख्या में जवानों को नैतान कर दिया है। इनमें सीआरपीएफ के जवान भी शामिल हैं। पुलिस ने कहा कि जो उपद्रवी थे उनकी पहचान कर उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। पुलिस ने कहा कि किसी को भी कानून हाथ में लेने की इजाजत नहीं दी जाएगी। रिपोर्ट के मुताबिक, शुक्रवार को पूरे शहर में शांतिपूर्ण तरीके से मस्जिदों में नमाज हुई। हाालंकि, कोलाकाता के राजा बाजार में थोड़ा बवाल देखा गाय। पुलिस ने फिलहाल राजा बाजार के सड़क को खाली करा दिया है और फिलहाल वहां ट्रैफिक सामान्य है। ‘सड़कों पर नमाज की कोई जगह नहीं’: लंबे समय से बंगाल में सियासी जमीन तलाश रही बीजेपी ने इस बार टीएमसी को हराकर सरकार बनाने में सफल रही। पार्टी के विधायक अर्जुन सिंह ने मीडिया से बातचीत में साफ शब्दों में कहा था कि राज्य में किसी भी सार्वजनिक स्थल या सड़कों पर नमाज की इजजात नहीं होगी। उन्होंने कहा कि नमाज मस्जिदों में होना चाहिए न की सड़कों पर। लोगों को मस्जिद में इबादत करनी चाहिए।भारत अपनी विविधता के लिए हमेशा से जाना जाता रहा है, जहाँ विभिन्न धर्म, संस्कृति और समुदाय एक साथ रहते हैं। इनमें मुस्लिम सबसे बड़े अल्पसंख्यक समूहों में से एक हैं। हालाँकि, उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति कई वर्षों से चिंता का विषय रही है। इस वास्तविकता को समझने का एक महत्वपूर्ण प्रयास सच्चर समिति की रिपोर्ट के माध्यम से किया गया, जो आज भी एक महत्वपूर्ण संदर्भ बिंदु है। आइए, सच्चर समिति द्वारा उजागर की गई मुस्लिम समुदाय के सामने आने वाली चुनौतियों को सरल शब्दों में समझते हैं। 2005 में गठित सच्चर समिति ने इस बात पर प्रकाश डाला कि कई मुस्लिम बच्चे कम उम्र में ही स्कूल छोड़ रहे थे। साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत से कम थी, और बहुत कम छात्र उच्च शिक्षा प्राप्त कर पा रहे थे। कल्पना कीजिए उस बच्चे की जिसे अपने परिवार का सहारा देने के लिए कम उम्र में ही स्कूल छोड़ना पड़ता है। यह कई लोगों के लिए एक हकीकत थी, और आज भी है। शिक्षा के बिना अवसर सीमित हो जाते हैं, और यह चक्र चलता रहता है। मुस्लिमों में साक्षरता दर घटने के साथ, यह पाया गया कि वे अधिकतर अनौपचारिक नौकरियों में लगे हुए हैं, जैसे छोटी दुकानें, कार्यशालाएँ, दिहाड़ी मजदूरी आदि। हालाँकि इन नौकरियों में मेहनत और कौशल की आवश्यकता होती है, लेकिन इनमें अक्सर स्थिरता या दीर्घकालिक विकास नहीं मिलता। इसी कारण से, सरकारी नौकरियों और औपचारिक क्षेत्रों में भी उनकी उपस्थिति काफी कम थी। इस असंतुलन के कारण समुदाय के लिए आर्थिक रूप से आगे बढ़ना कठिन हो गया। इससे यह भी पता चला कि वित्तीय ज्ञान की कमी के कारण, मुसलमानों की वित्तीय सेवाओं तक पहुँच कम थी। कई छोटे व्यवसायी अपने व्यवसाय को बढ़ाने के लिए संघर्ष कर रहे थे, क्योंकि वे अपने लिए उपलब्ध वित्तीय सेवाओं से अनभिज्ञ थे।कई मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में, उन्हें स्वच्छता की कमी, सीमित स्वास्थ्य सेवाएँ और कमज़ोर बुनियादी ढाँचे जैसी अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इन सभी समस्याओं के कारण रिपोर्ट में "विकास का अंतर" बताया गया है। सच्चर की रिपोर्ट के निष्कर्षों के बाद, सरकार ने इन अंतरों को दूर करने के लिए कई कदम उठाए। इनमें से एक महत्वपूर्ण कदम अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय को सुदृढ़ करना था, जो अल्पसंख्यकों के लिए कल्याणकारी योजनाओं को तैयार करने और लागू करने वाला केंद्रीय निकाय बन गया। ये योजनाएँ मुख्य रूप से शिक्षा, कौशल, वित्तीय सहायता और बुनियादी ढाँचे पर केंद्रित हैं।समुदाय में साक्षरता बढ़ाने के उद्देश्य से, मंत्रालय ने मौजूदा छात्रवृत्ति योजनाओं को और मजबूत किया ताकि जरूरतमंद परिवारों तक इनकी पहुंच सुनिश्चित हो सके। स्कूल छोड़ने वाले छात्रों की संख्या और उच्च शिक्षा में कम भागीदारी जैसी समस्याओं को दूर करने के लिए, प्री-मैट्रिक छात्रवृत्ति योजना, पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति योजना और योग्यता-सह-आय छात्रवृत्ति योजना जैसी कई योजनाएं बनाई गईं, जिनमें बुनियादी शिक्षा के साथ-साथ व्यावसायिक और तकनीकी पाठ्यक्रम भी शामिल हैं।शिक्षा से रोजगार मिलना अनिवार्य है, इस बात को समझते हुए सरकार ने कई कौशल विकास कार्यक्रम शुरू किए हैं, जैसे नई मंजिल योजना (शिक्षा को कौशल प्रशिक्षण से जोड़ना, विशेष रूप से मदरसा छात्रों के लिए) और सीखो और कमाओ (रोजगार के लिए तैयार कौशल प्रदान करना) ही प्रमुख लक्ष्य है।
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