जिनके हाथ में फोन है उनकी उम्र 84 साल है और जो फोन में दिख रहे हैं उनकी उम्र है 93 साल। 84 साल वाली बुआ हैं और 93 साल वाले उनके भतीजे। बुआ अपने 93 साल के भतीजे से कह रही हैं कि तुम बूढ़े हो गए हो। भतीजे का हंसते हुए जवाब आता है कि फुआ तुम भी बुढ़ा गई हो। लंबी बात होती है, हंसी -ठहाका होता है। सुरलहरी भी चलती है, आंखें भी भीगती हैं।
ये हैं अम्मा। हमारी किरन दीदी की सासू माता। मेरठ में दीदी के साथ ही रहती हैं। उम्र भले ही 84 साल की हो गई हो,लेकिन पूरी तरह जीवंत हैं। नाम भी जयंती है। अपना पूरा काम कर लेती हैं। सीढ़ियों से छत पर भी चली जाती हैं। बहुत ही गुणवंती हैं। कॉटन की साड़ी पहनती हैं, लेकिन उसे अपने हाथों से प्रेस करके पहनती हैं। किसी से भी फोन पर बात होती है तो गाना जरूर सुनाती हैं। सुर भी उनका बहुत अच्छा है। जन्मदिन हो या शादी की सालगिरह, अम्मा का फोन आता है तो खूब आशीर्वाद देती हैं और गाना जरूर सुनाती हैं।
पिछले दिनों मैं मेरठ गया था। अम्मा से मुलाकात हुई। खूब बातें हुईं, अम्मा ने गाने भी सुनाए। फिर बोलीं-ए बाबू तनिक कमलाकर बाबू के फोन कइके हमें देखाइ देता। अम्मा हमारे कमलाकर मामा यानी बड़का मामा से वीडियो कॉल पर बात करना चाह रही थीं। मैंने कॉल लगाई, थोड़ी देर में मामा लाइन पर आ गए। अम्मा का मायका और मामा का गांव एक ही है। अम्मा उनकी बुआ लगती हैं। अम्मा कहने लगीं- तू त बुढ़ाइ गइला। हंसते हुए मामा बोले- तुहू कहां जवान रहि गइलू बुआ। बुआ और भतीजे में खूब बातें हुईं। पुरानी बातें भी हुईं। अम्मा ने गाना सुनाया- हाल क्या है दिलों का न पूछो सनम, आपका मुस्कुराना गजब ढा गया...।
हमारे पंक्तिपावन समाज में रिश्ते आपस में गुंथे होते हैं। अम्मा मामा की बुआ लगती हैं तो एक रिश्ते से समधन भी। मामा के भतीजे की शादी अम्मा के देवर की बेटी से हुई है। जब बारात वहां पहुंची थी तो मामा समधी बनकर आए थे, तब अम्मा ने उन्हें गारी गाकर सुनाई थी। अम्मा मामा को वही प्रसंग याद दिला रही थीं। पूछ रही थीं कि याद है मैंने तुम्हें गारी गाकर सुनाई थी। मामा बोले- हां बिल्कुल याद है। दोनों लोग भावुक भी हुए। अम्मा ने पूछा- अब कब भेंट होगी। मामा बोले- ईश्वर जब चाहेंगे तब भेंट होगी। फिर हंसते हुए बोले- नहीं तो ईश्वर के यहां तो भेंट होगी ही।
84 साल की बुआ और 93 साल के भतीजे ने करीब 10 मिनट बात की होगी। बातें करते करते शायद बचपन में या फिर किशोरावस्था में जैसे पहुंच गए थे। शायद बरसों बाद उन दोनों लोगों की बात हो रही होगी। मैं सुन रहा था उनकी बात। सोच रहा था कि उम्र की सांध्य बेला में आखिर इंसान को चाहिए क्या..? थोड़ा सा साथ, पुराने साथियों से थोड़ी बात और हो सके तो समय समय पर अपनों से मुलाकात। देख रहा था कि मामा और उनकी बहू से बातचीत के बाद अम्मा के चेहरे पर चमक बढ़ गई थी। यह बात सही है कि मोबाइल के स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताना घातक है, लेकिन अगर यह अपनी पुरानी यादों को ताजा करने का, पुराने साथियों से बातचीत का माध्यम बनता है तो ये इसकी अच्छाई भी है।
(देश के प्रसिद्ध पत्रकार विकास मिश्र की फेसबुक वॉल से साभार)

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