हमारे एक रिश्तेदार हैं। उनकी जाति ही ब्राह्मण नहीं है, काम भी पंडिताई का ही है। कथा बांचते हैं, पूजा- अनुष्ठान करवाते हैं। कल घर आए थे। बोले कि परोपकार का जमाना ही नहीं है। मैंने पूछा- क्या हुआ। उन्होंने जो बताया उसके मुताबिक उन्होंने एक लड़के को मंदिर में पूजा-पाठ के लिए लगवाया था। मंदिर से तो उसकी कमाई जो हुई सो हुई, उसने इनके दो यजमानों को भी पटा लिया। दोनों यजमान इनके हाथ से निकल गए। तबसे ये उससे चिढ़े हुए हैं।
हमारे घर के पंडित हैं पंडित रामराज जी। 80 के दशक से घर से जुड़े हैं। बरसों से हमारे यहां ही रहते हैं। बाबूजी के बहुत अभिन्न रहे हैं, इस नाते परिवार के सदस्य भी हैं और पुरोहित भी। हमारे एक नाना थे, पंडित नाना। मेरी मां के मामा थे। बहुत पुरानी बात है कि उन्होंने पंडित रामराज जी से एक बड़े सेठ के अनुष्ठान में चलने के लिए कहा। बाबूजी ने नाना को मना किया कि रामराज जी को मत ले जाइएगा, हो सकता है कि ये आपके यजमान को हथिया लें। नाना अकड़कर बोले-आप नहीं जानते, वे 30 सालों से हमारे यजमान हैं। बाबूजी ने कहा- आपको आगाह करना मेरा फर्ज था, बाकी आप जानें। खैर.. नाना जी हमारे पंडित जी को ले गए। अनुष्ठान पूरा होते होते पंडित रामराज जी ने उन यजमान के पूरे परिवार को पटा लिया। बाद में नाना के हाथ से वह यजमानी छूट गई।
मुझे लगता है कि हमारे उन रिश्तेदार और पंडित नाना जैसे ही किसी जले भुने पेपर सेटर ने ही पुलिस की परीक्षा में अवसर का लाभ उठाने वाले के उत्तर के विकल्पों में पंडित का नाम दिया रहा होगा, जो इन दिनों विवाद की वजह बना हुआ है। अवसरवादी के लिए पंडित का विकल्प हो सकता है कि उसने दिया हो, जिसने देखा हो कि देश भर में सफाई कर्मचारियों की भर्ती में सबसे ज्यादा फार्म ब्राह्मणों ने ही भरे थे। आज भी कई जगह सफाई कर्मचारी जाति से ब्राह्मण हैं। अवसर मिला तो सफाई कर्मचारी बन गए।
हमारे गांव में महापात्र ब्राह्मणों के कुछ परिवार हैं। आजीविका का साधन मुख्य रूप से मृत्यु भोज ही था। एक परिवार के एक नौजवान ने एक दिन कंधे पर हल रखा और बैलों को खेतों में ले गया। हल जोतने लगा। गांव में हाहाकार मच गया। क्योंकि ऐसी मान्यता थी कि अगर ब्राह्मण हल का मूठ पकड़ लेगा तो अकाल पड़ जाएगा। यानी ब्राह्मण को हल चलाने की नौबत न आए, इसकी जिम्मेदारी पूरा गांव लेता था, लेकिन मेरे गांव का वह ब्राह्मण माना नहीं। बोला कि हल चलाएंगे, खेती करेंगे, मेहनत करेंगे तो खाएंगे। उसने भी मेहनत के लिए अवसर निकाला और लाभ लिया।
इन दिनों पंडित जी लोग बहुत सांसत में हैं। पहले घूसखोर पंडित नाम की वेब सीरीज को लेकर हंगामा हुआ और अब पंडित को पुलिस की परीक्षा में अवसरवादी बताया जा रहा है। इस हिसाब से देखा जाए तो प्रधानमंत्री मोदी जी तो पूरे देशवासियों को ही पंडित बनाना चाहते थे, क्योंकि उन्होंने कोरोना काल में आपदा में अवसर तलाशने का महामंत्र दिया था।
लोग कह रहे हैं कि जान बूझकर पंडितों पर हमले किए जा रहे हैं। हम तो कहते हैं कि आज से नहीं बरसों से पंडित जी की सांसत हो रही है। रोटी कपड़ा और मकान फिल्म में भी अरुणा ईरानी कहती हैं-
पंडित जी मेरे मरने के बाद बस इतना कष्ट उठा लेना।
मेरे मुंह में गंगाजल की जगह थोड़ी मदिरा टपका देना।
अब मदिरा ही टपकाना है तो पंडित जी क्यों टपकाएं, बार वाला क्यों न टपकाए। साथ पीने वाला क्यों न टपकाए, फंसे तो बेचारे पंडित जी। फिल्मों में पंडित जी कभी पोंगा पंडित हुए तो कभी चालू पंडित। अक्सर हास्य के पात्र ही हुए। हां अर्जुन पंडित में सनी देओल के किरदार ने पंडित को जरूर दबंग दिखाया।
ब्राह्मणों, ठाकुरों, लालाओं और बनियों का सबसे ज्यादा बेड़ा गर्क किया हमारे पसंदीदा साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद ने। उनकी हर कथा के खलनायक यही होते थे।
मेरा जन्म भी एक ब्राह्मण परिवार में हुआ है। मैंने कभी भी अपने घर वालों को, नाते रिश्तेदारों को किसी पर जुल्म ढाते हुए नहीं देखा है। नौकरी में आरक्षण का मामला छोड़ दें तो कभी ब्राह्मण होने का नुकसान भी नहीं हुआ है। हां कुछ लोग जरूर ब्राह्मणों और ब्राह्मणवाद को एक करार देते हुए पीछे पड़े हुए हैं। जबकि ब्राह्मणों के बारे में कहा जाता है कि उनमें कभी एकता नहीं हो सकती। एक कहावत कही जाती है-
ब्राह्मण, कुत्ता, हाथी, नहीं जाति के साथी।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हमारे गुरुजी एक श्लोक कहते थे- पंडितः पंडितम् दृष्टवा श्वान इव गुर्गुरायते। यानी पंडित पंडित को देखकर कुत्ते की तरह गुर्राता है।
ब्राह्मण दशकों से राजनीति की बिसात पर है। कभी बीएसपी पंडित जी प्रणाम करती है तो कभी समाजवादी पार्टी पुचकारती है। यूजीसी को लेकर पंडित जी लोग वैसे भी घबराए हुए हैं और बीजेपी सरकार की तरफ देखकर मन ही मन में गा रहे हैं- अच्छा सिला दिया तूने मेरे प्यार का। उधर बीजेपी मानकर बैठी है- जाएगा तू कहां..?
मैंने कभी जाति आधारित बातें नहीं कीं, पहले कभी कोई पोस्ट नहीं की, लेकिन जिस तरह समाज में सवर्णों और खासकर ब्राह्मणों के खिलाफ माहौल बनाया जा रहा है, वह ठीक नहीं है। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो ब्राह्मणों का हर जगह, हर प्रदेश में सम्मान है। पंडित जी के साथ हंसी-मजाक, छेड़छाड़ तो चलती ही रहती है। जैसे किसी घासीराम ने पंडित जी को छेड़ते हुए पंडित जी दंडवत की जगह कहा- दंडित जी पंडवत। पंडित जी ने भी अक्षरों में बदलाव करते हुए कहा- बेटा आसीराम, घाशीर्वाद।
बचपन में जितनी कहानियां सुनी-पढ़ी थी। जितने आख्यान पढ़े-सुने थे, सबमें यही था- प्राचीन काल में एक दरिद्र ब्राह्मण रहता था, भिक्षा मांगकर अपना परिवार चलाता था। मनुस्मृति में भी ब्राह्मण को अधिकांश जगह पर भिक्षार्थी ही फ्रेम किया गया है। ब्राह्मणों में पठन-पाठन का चलन था तो बहुत से लोग आगे बढ़ गए। पीढ़ियां संवर गईं। आज अगर सवर्णों और खासकर ब्राह्मणों पर हमले हो रहे हैं तो इसे कालचक्र ही समझिए। बस एक शेर से समझिए-
खूब हनकर मारिए है चोट से रिश्ता घना।
ओखली के धान हैं उजले ही होते जाएंगे।
( देश के प्रसिद्ध टीवी जॉर्नलिस्ट अब शिक्षक बने विकास मिश्र की कलम से यह पोस्ट है, पोस्ट चूंकि पंडित आधारित है, इस नाते तस्वीर भी उनकी उसी वेशभूषा में हैं)
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