हिंदू नववर्ष या चैत्र शुक्ल प्रतिपदा पर स्वयंसेवक घरों पर लगा रहे
- संघ में मनाए जा रहे छह पर्व की वजह उनको सीधे राष्ट्र भाव से जोड़ना है
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के गौरवशाली शताब्दी वर्ष के पावन अवसर पर सिलीगुड़ी समेत बंगाल प्रांत के सभी शाखाओं में वर्ष प्रतिपदा उत्सव अत्यंत हर्षोल्लास और गरिमा के साथ संपन्न हुआ। इस मौके पर सिलीगुड़ी स्थित उत्तर बंगाल मुख्यालय माधव भवन से भारतीय नववर्ष के सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय महत्व पर प्रकाश डालते हुए समाज के प्रत्येक वर्ग को संगठित होकर राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।संघ के संस्थापक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार का जन्मदिन एवं हिंदू नव वर्ष सामूहिक रूप से मनाया। इस अवसर पर कार्यकर्ता ने 2026 में संघ के 100 पूरे होने के उपलक्ष्य में शताब्दी वर्ष मनाने के पूर्व संगठन के विचारधारा को जिले घर घर तक पहुंचने का संकल्प किया। कहा कि भारत का नाम लेते ही विश्व के मानस पटल पर विशिष्ट पहचान उसकी आध्यात्मिकता, संस्कृति और जीवन दर्शन स्वतः उभर आता है। आज हम सभी भारतीय नववर्ष की पूर्व संध्या पर एकत्रित हुए हैं। यह अवसर केवल एक तिथि परिवर्तन का नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक चेतना और परंपराओं के पुनर्स्मरण का भी है।।चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से भारतीय नववर्ष का आरम्भ होता है। यह दिन अनेक दृष्टियों से अत्यंत पावन और ऐतिहासिक है। मान्यता है कि इसी दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना की थी। भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक के लिए भी इसी दिन का चयन किया गया। भगवान झूलेलाल का जन्म भी इसी दिन हुआ था। इसी तिथि को आर्य समाज की स्थापना हुई और विक्रम संवत का प्रारम्भ भी इसी दिन से माना जाता है। साथ ही, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक परम पूज्य डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार का जन्म भी इसी पावन दिवस पर हुआ था। कहा कि भारतीय नववर्ष नवजीवन, नवचेतना और नवीन ऊर्जा का प्रतीक है। भारतीय काल गणना केवल समय बताने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित कर संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा देती है।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ साल में 6 उत्सव या पर्व संगठन के तौर पर मनाता है और अगर आप पहले से नहीं जानते होंगे तो ये जानकर अचरज में पड़ जाएंगे कि उन पर्वों में सनातनियों के दोनों सबसे बड़े पर्व दीवाली और होली शामिल नहीं हैं। अगर आप इन 6 पर्वों को जानेंगे तो पाएंगे कि इन पर्वों को संघ किसी ना किसी विशेष कारण से मनाता है। जो पूरे सनातन समाज को ही नहीं बल्कि दुनियां को भी एक संदेश देते हैं। ऐसा नहीं है कि उनके होली या दीवाली से कोई परेशानी है, लेकिन ये 6 पर्व पूरे सनातन समाज को एक विशेष सूत्र में बांधते हैं। इन्हीं में से एक है हिंदू नववर्ष या चैत्र शुक्ल प्रतिपदा. इतिहास में इसी दिन से विक्रम संवत की शुरुआत हुई थी।।वर्ष प्रतिपदा के दिन ही संघ के संस्थापक डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार जी का जन्म हुआ था। संघ के सभी उत्सवों में से यह विशेष होता है और इस दिन सभी की उपस्थिति गणवेश में अनिवार्य होती है। इस उत्सव के दौरान डॉ हेडगेवार को याद किया जाता है और उनके सम्मान में सिर झुकाकर उन्हें ‘आद्य सरसंघचालक प्रणाम’ किया जाता है।यह प्रणाम वर्ष में सिर्फ एक बार होता है।यूं साल भर संघ भगवा ध्वज को ही प्रणाम करता है, लेकिन ये एक दिन डॉ हेडगेवार के नाम होता है। जब तक वो जीवित थे, ऐसी प्रथा नहीं थी. लेकिन गुरु गोलवलकर ने और फिर बाद में तीसरे सरसंघचालक बाला साहब देवरस ने भी जोर दिया कि केवल आद्य सरसंघचालक को ही इस तरह से सम्मान मिलने चाहिए कि उनकी भव्य समाधि बने, उनके चित्र लगें, हालांकि बालासाहब ने पहले और दूसरे सरसंघचालक के चित्रों को हर कार्यक्रम में भारत माता के चित्र के साथ लगाने के निर्देश दिए थे, तब से यही परम्परा बन गई है। इसी तरह वर्ष प्रतिपदा के दिन ‘आद्य सरसंघचालक प्रणाम’ की भी परम्परा है। अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से उनका जन्म 1 अप्रैल, 1889 को हुआ था पर संघ भारतीय पंचांग के हिसाब से चलता है और उसके अनुसार डॉ. हेडगेवार का जन्म वर्ष प्रतिपदा के दिन हुआ था। सुरुचि प्रकाशन ने इन 6 पर्वों को चुनने व मनाने को लेकर एक पुस्तिका ‘संघ उत्सव’ प्रकाशित की है, जिसमें गुरु गोलवलकर व बालासाहब देवरस के अलग अलग समय पर व्यक्त किए गए विचारों के जरिए ये बताया गया है कि संघ ने कोई भी उत्सव नया शुरू नहीं किया बल्कि ये आदिकाल से चले आ रहे सनातनी उत्सव ही हैं। इन 6 को चुनने की वजह उनको सीधे राष्ट्र भाव से जोड़ने का विचार था। उन उत्सवों को जानने पर ये विचार भी समझ आता है। वैसे भी इस दिन महाराज विक्रमादित्य ने हूणों को हराकर और राष्ट्र को विदेशी दासता से मुक्त कराकर इस दिन को विक्रम संवत के रूप में प्रतिष्ठित किया था। इसलिए भारतीय इतिहास के लिए ये गौरव का दिन है. ऐसा भी माना जाता है कि भगवान राम का राज्याभिषेक इसी दिन हुआ था। महर्षि दयानंद सरस्वती ने भी इसी दिन आर्यसमाज की स्थापना की थी। ( अशोक झा की रिपोर्ट )
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