बंगाल में राष्ट्रपति के पोटोकॉल मामले में हुई गड़बड़ी में दार्जिलिंग के डीएम को हटा दिया गया है। उन्हें नवान्न में प्रतिनिक्त हिल्स विभाग में किया है। उनके स्थान पर सुनील अग्रवाल को नियुक्त भी किया गया। पुलिस कमिश्नर को हटाने या उनके जगह किसी की नियुक्ति नहीं की गई है। केंद्र द्वारा उन्हें डेपुटेशन के लिए बुलाए जाने के कुछ ही घंटों के भीतर, नबन्ना ने दार्जिलिंग के ज़िलाधिकारी को उनके पद से हटा दिया। फिलहाल, 1994-बैच के WBCS अधिकारी सुनील अग्रवाल को ज़िलाधिकारी की ज़िम्मेदारियाँ सौंपी गई हैं। सुनील अग्रवाल अभी उत्तर बंगाल विकास विभाग में विशेष सचिव के पद पर कार्यरत हैं। गौरतलब है कि पिछले शनिवार, 7 मार्च को, सिलीगुड़ी में राष्ट्रपति के दौरे के स्थान को लेकर एक विवाद खड़ा हो गया था। राज्य सरकार पर राष्ट्रपति के प्रति "अशिष्टता" दिखाने के आरोप भी लगाए गए थे। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने खुद इस मामले पर नाराज़गी ज़ाहिर की थी। इसके बाद, राज्य सरकार ने अशिष्टता के आरोपों से इनकार किया; हालाँकि, इस मुद्दे को लेकर विवाद यहीं खत्म नहीं हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक कड़ा बयान जारी करते हुए कहा कि राष्ट्रपति का अपमान किया गया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इस घटना के संबंध में राज्य सरकार से एक रिपोर्ट मांगी। उस रिपोर्ट की जांच करने के बाद, केंद्र सरकार ने आज सिलीगुड़ी के पुलिस कमिश्नर सी. सुधाकर और दार्जिलिंग के ज़िलाधिकारी मनीष मिश्रा को डेपुटेशन के लिए दिल्ली बुलाया। इस घटनाक्रम के बाद, राज्य सरकार ने ज़िलाधिकारी मनीष मिश्रा को उनके पद से हटा दिया। अभी पुलिस कमिश्नर की नियुक्ति नहीं हो पाई है।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की पश्चिम बंगाल यात्रा पर प्रोटोकॉल उल्लंघन से देश में नई बहस शुरू हो गई है। हद तो तब हो गई जब सुरक्षा नियमों का भी उल्लंघन हुआ और न तो मुख्य सचिव पहुँचा और न ही डीजीपी। इसको लेकर केन्द्र ने राज्य के मुख्य सचिव से रिपोर्ट माँगी है। उपष्ट्रपति सीबी राधाकृष्णन, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह से लेकर विपक्ष के कई नेताओं ने नाराजगी जताई है। उपराष्ट्रपति ने कहा कि राष्ट्रपति को उनके पद की गरिमा और प्रोटोकॉल के मुताबिक सम्मान मिलना चाहिए। पीएम मोदी ने ममता सरकार पर सवाल उठाए वहीं मायावती ने राष्ट्रपति पद के राजनीतिकरण पर दुख जताया। उन्होंने कहा कि प्रोटोकॉल तोड़ना ‘अति दुर्भाग्यपूर्ण’ है। राष्ट्रपति का सम्मान और प्रोटोकॉल का ध्यान रखना बेहद जरूरी है। क्या है विवाद: राष्ट्रपति 9वें अंतरराष्ट्रीय संथाल कॉन्फ्रेंस में शामिल होने सिलीगुडी के फाँसीदेवा पहुँची थीं। प्रोटोकॉल के मुताबिक वहाँ उन्हें स्वागत करने के लिए मुख्यमंत्री या मुख्यमंत्री द्वारा नियुक्त मंत्री को होना चाहिए था, लेकिन कोई नहीं था। कार्यक्रम स्थल काफी छोटा था, जिससे कई संथाली लोग शामिल नहीं हो सके। राष्ट्रपति ने इस पर दुख जताया और कहा कि कार्यक्रम स्थल 5000 लोगों के लायक नहीं था। वहीं कार्यक्रम के बाद जब राष्ट्रपति मुर्मू एक दूसरे कार्यक्रम में शामिल होने विधाननगर मैदान पहुँची, तो उन्होंने कहा कि इतना बड़ा मैदान रहने के बावजूद अंतर्राष्ट्रीय संथाल सम्मेलन के लिए छोटी सी जगह क्यों चुनी गई। ममता बनर्जी का जवाब: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अपने संबोधन के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का भी जिक्र किया था और कहा था कि ममता बनर्जी उनकी छोटी बहन की तरह हैं और वह उन्हें छोटी बहन की तरह प्यार करती हैं। लेकिन नहीं पता कि अंतर्राष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस के लिए इतनी छोटी जगह क्यों दी गई? ऐसा लगा जैसे जल्दी बुलाकर भगाने की तैयारी थी। राष्ट्रपति मुर्मू की नाराजगी पर ममता बनर्जी कहाँ अपनी गलती मानने वाली थीं। उन्होंने राष्ट्रपति मुर्मू को बीजेपी का एजेंट तक कह डाला। इतना ही नहीं छोटी जगह दिए जाने पर कहा कि राष्ट्रपति बीजेपी की राजनीति में फँस गई है। राज्य सरकार न तो कार्यक्रम की आयोजक थी और न ही उन्हें कार्यक्रम और उसके आयोजक या फंडिंग के बारे में पता है। जब राष्ट्रपति राज्य में आती-जाती हैं तो उन्हें आधिकारिक सूचना मिलती है। ममता बनर्जी ने ये भी कहा कि वह राष्ट्रपति का सम्मान करती हैं लेकिन कोई 50बार आए तो हर बार कार्यक्रम में शामिल होना संभव नहीं है। चुनाव के वक्त तो कार्यक्रम में शामिल होना और भी मुश्किल है। ममता बनर्जी ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की साजिश रची जा रही है और बंगाल को बाँटने की कोशिश हो रही है। लेकिन ये बंगाल की राजनीति या केन्द्र की साजिश का मसला नहीं था। मुख्यमंत्री होकर धरने पर बैठीं ममता बनर्जी चाहती तो किसी मंत्री को राष्ट्रपति के स्वागत के लिए भेज सकती थीं। उनके कार्यक्रम स्थल में किसी तरह की सुविधा नहीं थी। राष्ट्रपति के लिए बनाए गए वॉशरूम में पानी तक उपलब्ध नहीं था। जहाँ से राष्ट्रपति मुर्मू का काफिला गुजरा, उस रास्ते में गंदगी थी और कचरे पड़े थे यानी राष्ट्रपति, जो देश की प्रथम नागरिक होने के साथ-साथ देश का सम्मान हैं, उनका इतना भी सम्मान नहीं किया गया कि कार्यक्रम स्थल की अच्छी व्यवस्था की जाती और रास्ते की कम से कम सफाई कराई जाती। इसके लिए स्थानीय प्रशासन से लेकर ममता सरकार तक जिम्मेदार है। राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के ऑफिस और उनसे जुड़े सभी इंतज़ाम ब्लू बुक के हिसाब से मैनेज किए जाते हैं, जिसे समय-समय पर केंद्रीय गृह मंत्रालय तैयार और अपडेट करता है और नंबर वाली (हर कॉपी का एक नंबर होता है) कॉपी संबंधित लोगों को भेजी जाती हैं। जमीनी स्तर पर, हर जिले में यह बुक जिला मजिस्ट्रेट और जिले के पुलिस हेड की कस्टडी में रखी जाती है।
राष्ट्रपति के लिए जरूरी प्रोटोकॉल: राष्ट्रपति की अगुवानी केवल औपचारिक शिष्टाचार नहीं है, बल्कि ‘वॉरंट ऑफ प्रेसिडेंट’ के तहत अनिवार्य प्रक्रिया होता है। यह न सिर्फ संवैधानिक तौर पर सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति का सम्मान है, बल्कि केन्द्र-राज्य संबंध की मजबूती का आधार भी है। राष्ट्रपति को रिसीव करने के भी नियम है, जिसे हर राज्य को पालन करना अनिवार्य है।
राष्ट्रपति जिस राज्य में जाते हैं या हवाई अड्डे पर उतरते हैं, तो उनके स्वागत के लिए राज्य के प्रथम नागरिक यानी राज्यपाल को अगुवानी के लिए मौजूद होना चाहिए। राज्यपाल के बाद मुख्यमंत्री की मौजूदगी जरूरी है। ये राज्य की ओर से राष्ट्रपति के सम्मान के लिए जरूरी माना जाता है, साथ ही ये संवैधानिक दायित्व भी है, क्योंकि मुख्यमंत्री चुनी हुई सरकार और जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं। अगर कोई मुख्यमंत्री बहुत जरूरी सरकारी कार्य या स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों की वजह से नहीं जा पा रहा हो, तो वह किसी कैबिनेट मंत्री को जिम्मेदारी सौंप सकता है, जो राष्ट्रपति के स्वागत के लिए पहुँचे। किसी मंत्री का वहाँ न होना प्रोटोकॉल का उल्लंघन है। इसके अलावा राज्य के प्रशासनिक ढाँचे का प्रतिनिधित्व करने वाले शीर्ष अधिकारी का तकनीकी रूप से वहाँ होना जरूरी है। इसलिए मुख्य सचिव और डीजीपी प्रोटोकॉल के तहत राष्ट्रपति के स्वागत के लिए रहते हैं। इनका काम न सिर्फ राष्ट्रपति का स्वागत करना है, बल्कि राज्य में उनकी सुरक्षा और प्रशासनिक समन्वय की जिम्मेदारी संभालना है। इसके अलावा स्थानीय सैन्य कमांडर और मेयर भी वहाँ मौजूद रहते हैं। राष्ट्रपति का स्वागत हल्के से झुक कर हाथ जोड़ कर किया जाता है। ये पूरी प्रक्रिया पहले से तय कार्यक्रम के मुताबिक होता है। इसमें राज्य बदलाव नहीं कर सकता। राष्ट्रपति की सुरक्षा जब तक वह उस राज्य में तरह तक राज्य सरकार के अधीन होती है। आम तौर पर वह राजभवन में ठहरते हैं और जहाँ कार्यक्रम होगा, वहाँ भी उन मानकों का पालन करना अनिवार्य होगा। उनके काफिले में ‘कारकेड’ यानी वाहनों का क्रम और उसकी सुरक्षा राज्य की पुलिस और खुफिया विभाग की जिम्मेदारी होती है। अगर राज्य इन नियमों की अवहेलना करना है, तो ये संवैधानिक पद का अपमान माना जाता है। अगर मुख्यमंत्री किसी कारणवश नहीं जा पा रही थी, तो वो किसी मंत्री को अपना नुमाइंदा बना कर राष्ट्रपति के स्वागत के लिए भेज सकती थीं। लेकिन राष्ट्रपति के स्वागत के लिए सिलीगुड़ी के मेयर ही मौजूद रहे। न तो मुख्य सचिव पहुँचे और न ही कोई मंत्री। यहाँ तक कि सुरक्षा की भी अवहेलना की गई और डीजीपी भी रिसीव करने नहीं पहुँचे।
ममता बनर्जी इसे प्रोटोकॉल का उल्लंघन नहीं मानतीं। उनका कहना है कि सिलीगुड़ी में आयोजित कार्यक्रम कोई सरकारी कार्यक्रम नहीं था और यह एक निजी संस्था इंटरनेशनल संथाल काउंसिल द्वारा आयोजित था। इसमें राष्ट्रपति आई थी।
मुख्यमंत्री के मुताबिक, राष्ट्रपति सचिवालय को लिखित और मौखिक तरीके से ये बता दिया गया था कि कार्यक्रम स्थल पर पर्याप्त व्यवस्थाएँ नहीं हैं, इसके बावजूद कार्यक्रम तय समय पर आयोजित किया गया। ममता बनर्जी ने मुख्य सचिव और डीजीपी की अनुपस्थिति पर कहा कि प्रोटोकॉल सूची राष्ट्रपति सचिवालय की ओर से तय की गई थी। इसमें सिलीगुड़ी नगर निगम के मेयर, दार्जिलिंग के डीएम और सिलीगुड़ी पुलिस आयुक्त मौजूद थे। ( बंगाल से अशोक झा की रिपोर्ट )
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