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खबर है तो छोटी सी। लेकिन इसका डाइमेंशन, इसका आधार फलक बहुत बड़ा है। खबर यह है कि एक अखबारनवीस हुआ करता था। हमने उसके साथ लंबा वक्फा गुजारा। हम एक ही पेशे में थे। एक ही कश्ती के मुसाफिर। समान रूप से कलमघिस्सू। हाशिये की ज़िंदगी जीने वाले और इस गुरूर में मदमस्त रहने वाले कि और कुछ हो चाहे भले न हो लेकिन हाशिया हर हाल में केंद्र से बड़ा होता है। हम कि जिन्हें हमने सिखाया- पढ़ाया, उन्हें अपने ही माथे पर मूतता देखने के अभ्यस्त और अभिशप्त। अब वह नहीं है। वह कब गया, यह भी किसी को ठीक ठीक नहीं पता। पता हो भी तो कैसे? वह तो मरा ही मिला बाथरूम में। किसी ने कहा कल। किसी ने कहा-और पहले। कोई बोला-अब यह जिरह की बात तो रही नहीं। मूल मामला यह है कि वह चला गया। वह जलेश्वर था। जलेश्वर उपाध्याय। नाम, पता, साकिन, तहसील, परगना, जिला, सूबा-सबको खारिज करता हुआ। वह कहीं का नहीं था और वह सबमें था। वह थोड़ा पटना में था, थोड़ा आगरे में, थोड़ा इलाहाबाद में, थोड़ा बनारस में और थोड़ा गोपालगंज (बिहार) में। वह जन संस्कृति मंच के नुक्कड़ नाट्यकर्म की लंबे समय तक धुरी और ज़रूरत रहा लेकिन क्या मज़ाल कि अखबार के डेस्क पर आप उसे ऐसी किसी भी चर्चा में शामिल कर लें और एक मिनट का भी वह अपना वक्त ऐसी किसी चर्चा को दे सके। इस मामले में वह उस्ताद था। काम का माने काम। नो गपशप, नो गॉसिप।
देर रात जब बनारस की सड़कें सुनसान हो जातीं तो हम अखबारनवीस अलग- अलग दिशाओं से, अलग अलग अखबारों से अपनी ड्यूटी से फारिग हो कर एक ठीहा पर लौटते। यह ठीहा हमारा खुद का सृजन था। हमीं उसके बाबर थे। हमीं उसके कोलंबस। वहां भोर तक गपशप चलती, हम तमाम खुराफातों और तमाम दुस्वप्नों की गिनती गिनाते। हम चर्चा करते कि कोई संपादक कितना बेवकूफ हो सकता है। हम लानतें भेजते कि हमारा जो संपादक है, उसे कंपनी निकाल दे तो कोई झाड़ू लगाने का काम भी न दे। हम वहां कितनी चाय पीते, कितने टोस्ट खाते, कितने का भुगतान कौन करता, कौन 'माला' उठाता, कौन भुगतान के पहले ही भाग खड़ा होता-यह तमाम चीजें हमारे लिए गौण थीं। असल बात थी रतजगा करना ताकि देर रात पत्नी और बच्चों की नींद में खलल न पड़े। हम पत्नी और बच्चों की दुनिया को महफूज रखने की चिंता में शहादत देने वाले लोग थे। हम खबरों की किसानी करते और खबरों के बहाने इस दुनिया को रहने लायक बनाने के सपने देखा करते थे। ठीहा पर ऐसी ही गलचौरन और लंतरानियों के बीच उसे लेनिन याद आते, ब्रेख्त याद आते, चेग्वारा याद आते, मायकोवस्की याद आते। और भी बहुत कुछ याद आता। लेकिन उसकी सुनता कोई नहीं। वैसे भी आप थके हों तो भारी भरकम तकरीर सुनना आपको नहीं रुचेगा और वह खाये-पीये लोगों का दर्शन समझने- समझाने को तैयार नहीं था।
बहरहाल, इस खबर का डाइमेंशन बनारस में हुई उसकी मौत में नहीं है। इस खबर का डाइमेंशन इस बात में है कि वह व्यवस्था और अपनों की 'दिलजोई' की भेंट चढ़ गया। उसका मरना मरना नहीं, आत्मभोज है। वह रोज़ थोड़ा थोड़ा मर रहा था और बरसों से मर रहा था। उसने तो मौत का 'इको सिस्टम' ही पलट डाला। वह जिस सूरते हाल में था, वह जीने की सूरत थी भी नहीं और उसके बहुसंख्य कारण थे। लेकिन वह तब भी था। अपना ही लहू पीते हुए। अपने को ही रोज- रोज चबाते हुए। वह थोड़ा अलग सांचे में ढला था। वह जलेश्वर था। उसकी विरल यादों को सौ सौ सलाम। उसके निजी जीवन प्रसंगों पर कुछ कहने का यह वक्त नहीं। काफी कुछ कहा जा चुका है इस बावत।
और अंत में : अब वह कहां मिलेगा? उसे दहकती हुई आग और ठहरे हुए पानी से उठती लपटों के बीच ढूंढना दोस्तो। वह सुना रहा होगा, जरूर सुना रहा होगा अपना कोई न कोई अफसाना। वह अफसाना जो किसी ने तवज्जो के साथ सुना नहीं । न किसी संपादक ने, न दोस्त-अहबाबों से खचाखच भरी उस दुनिया ने जहां से उसके होने का पता मिलता था। ( वरिष्ठ पत्रकार मिथिलेश कुमार सिंह की कलम से, उनके फेसबुक वॉल से साभार)
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