- यह रूढ़िवादिता के बजाय प्रेम, उदारता, और दरगाह संस्कृति के माध्यम से हिंदू-मुस्लिम समुदायों को जोड़ने का करता है काम
- सूफी संत प्रेम, शांति और मानवता के संदेशों को लेकर आए, जिससे लोगों का दिल जीता
रमजान का पवित्र माह प्रारंभ होने वाला है। विश्व में इस्लाम को लेकर तरह तरह की बातें हो रही है। भारतीय इस्लाम, सूफीवाद और भक्ति परंपराओं के मिलन से उपजी एक अनूठी आध्यात्मिक और समन्वयवादी परंपरा है, जो गंगा-जमुनी तहजीब का प्रतिनिधित्व करती है। यह रूढ़िवादिता के बजाय प्रेम, उदारता, और दरगाह संस्कृति के माध्यम से हिंदू-मुस्लिम समुदायों को जोड़ती है, जो भक्ति और संगीत (कव्वाली) के मिश्रण से सांस्कृतिक सौहार्द को बढ़ावा देती है।
17 वीं शताब्दी में सूफी संत और कवि अजान फकीर के नाम से मशहूर हजरत शाह मीरन असम आए. अजान पीर के असम में रहने की अवधि का संकेत उनके एक जिकिर से मिलता है, जिसकी पुष्टि दो अन्य अहोम वृत्तांतों से होती है।किंवदंतियों का कहना है कि अजान फकीर अपने भाई शाह नवी के साथ बगदाद से असम आए थे और अंत में ऊपरी असम के वर्तमान शिवसागर शहर के पास सोरागुरी सापोरी में बस गए।एक अन्य किंवदंती के अनुसार, हजरत शाह मीरन को ‘अजान फकीर’ या अजान पीर (संत) नाम मिला, क्योंकि वह वही थे, जिन्होंने असमिया मुस्लिमों को मुस्लिम अनुष्ठान के हिस्से के रूप में ‘अजान’ सुनाना सिखाया था। भारतीय इस्लाम की मुख्य विशेषताएँ: सूफीवाद का प्रभाव: भारत में इस्लाम के प्रसार में सूफी संतों (जैसे ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती, निज़ामुद्दीन औलिया) ने प्रेम और भाईचारे का संदेश दिया, जिसने इस्लाम और भारतीय स्वदेशी परंपराओं के बीच एक पुल का काम किया।दरगाह संस्कृति: दरगाहें केवल इबादतगाह नहीं, बल्कि सांस्कृतिक केंद्र रही हैं, जहाँ हिंदू और मुसलमान दोनों अपनी मन्नतें लेकर आते हैं, जो जीवंत समन्वयवाद का प्रमाण है। सांस्कृतिक समन्वय (गंगा-जमुनी तहजीब): मध्यकालीन भारत में कला, साहित्य, संगीत और वेशभूषा में मिश्रित संस्कृति का विकास हुआ। आमिर खुसरो जैसे व्यक्तित्वों ने सूफीवाद को भारतीय रंग में ढाला।
उदारवादी दृष्टिकोण: भारतीय इस्लाम को अक्सर समावेशी और कट्टरता से दूर, कुरान की उदारवादी व्याख्या के रूप में देखा जाता है, जो बहुलवाद को स्वीकार करता है।
आध्यात्मिक अभिसरण: सूफीवाद के एकेश्वरवाद और भारतीय दर्शन के अद्वैतवाद ने मिलकर एक ऐसी आध्यात्मिकता को जन्म दिया, जो आत्मा की शुद्धि और ईश्वर से प्रेम पर केंद्रित है। भारतीय इस्लाम ने प्रेम और सहनशीलता के माध्यम से भारत की सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सूफीवाद ने इस्लाम को भारतीय समाज में व्यापक रूप से फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सूफी संत प्रेम, शांति और मानवता के संदेशों को लेकर आए, जिससे लोगों का दिल जीता। सूफीवाद ने स्थानीय रीति-रिवाजों और परंपराओं के साथ समन्वय स्थापित किया, जिससे इस्लाम को भारतीय समाज में स्वीकार्यता मिली।
ख्वजा मोइनुद्दीन चिश्ती: अजमेर शरीफ के ख्वजा मोइनुद्दीन चिश्ती ने भारत में सूफीवाद की नींव रखी।
निजामुद्दीन औलिया: दिल्ली के निजामुद्दीन औलिया ने भी सूफीवाद के प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
कबीर और रहीम: सूफीवाद के प्रभाव से कबीर और रहीम जैसे कवि भी प्रभावित हुए, जिन्होंने अपने लेखन में मानवता और प्रेम के संदेशों को प्रसारित किया। मुगल काल में परिवर्तन (16वीं - 18वीं शताब्दी): मुगल काल में इस्लाम का स्वरूप और अधिक विविध हो गया। मुगल शासकों ने इस्लाम को राज्य धर्म के रूप में बढ़ावा दिया, लेकिन उन्होंने अन्य धर्मों के प्रति भी सहिष्णुता दिखाई। मुगल काल में फारसी संस्कृति का प्रभाव बढ़ा, जिससे इस्लाम के आचरण में बदलाव आया।
फारसी संस्कृति: मुगल काल में फारसी भाषा और संस्कृति का प्रभाव बढ़ा, जिससे इस्लाम के रीति-रिवाजों में बदलाव आया।
धार्मिक सहिष्णुता: अकबर जैसे शासकों ने धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनाई, जिससे विभिन्न धर्मों के लोगों के बीच शांति और सद्भाव बना रहा। शिआ और सुन्नी विभाजन: मुगल काल में शिआ और सुन्नी मुसलमानों के बीच विभाजन भी देखने को मिला।ब्रिटिश शासनकाल में प्रभाव ( 19वीं - 20 वीं शताब्दी)ब्रिटिश शासनकाल में इस्लाम का स्वरूप और अधिक जटिल हो गया। ब्रिटिश सरकार ने इस्लाम को राजनीतिक रूप से कमजोर करने की कोशिश की, लेकिन इस्लाम ने अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान बनाए रखी। इस दौरान, मुस्लिम शिक्षा और समाज सुधार आंदोलनों का उदय हुआ।
अलीगढ़ आंदोलन: सर सैयद अहमद खान ने अलीगढ़ आंदोलन की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य मुसलमानों को आधुनिक शिक्षा प्रदान करना था। नदवातुल उलमा: नदवातुल उलमा ने मुसलमानों के धार्मिक और सामाजिक सुधारों पर ध्यान केंद्रित किया। राजनीतिक चेतना: ब्रिटिश शासनकाल में मुसलमानों में राजनीतिक चेतना बढ़ी, जिससे मुस्लिम लीग जैसे राजनीतिक संगठनों का उदय हुआ।स्वतंत्रता के बाद का स्वरूप (20वीं शताब्दी - वर्तमान): स्वतंत्रता के बाद, भारत में इस्लाम का स्वरूप और अधिक बहुआयामी हो गया है। भारत में मुसलमानों की आबादी दुनिया में तीसरी सबसे बड़ी है। स्वतंत्रता के बाद, मुसलमानों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, लेकिन उन्होंने अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान बनाए रखी है।
मुस्लिम पर्सनल लॉ: मुस्लिम पर्सनल लॉ मुसलमानों के पारिवारिक मामलों को नियंत्रित करता है। शिक्षा और रोजगार: मुसलमानों को शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। राजनीतिक प्रतिनिधित्व: मुसलमानों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व अभी भी कम है। (अशोक झा की रिपोर्ट)
#कव्वाली


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